Homeगुजरातरमणीय स्वर्गभूमि दाओस-स्विट्झरलेन्ड से ९६० वीं रामकथा का आरंभ हुआ।।

रमणीय स्वर्गभूमि दाओस-स्विट्झरलेन्ड से ९६० वीं रामकथा का आरंभ हुआ।।

जितने भी द्वंद है सब का स्विकार करना महामंत्र है।।

मानस स्विकार का शास्त्र है।।

सभी सोपन विशेष पंक्तियों से भरे है।।

अपनी इच्छा से प्रतिकूल घटना घटे तो नियति समझना,हमसे कुछ अच्छा हो जाए तो निमित्त समझना और कल्पना से बाहर हो जाए तो नेति समझना।।

क्या ठीक है,इससे बेहतर किसके साथ क्या ठीक है वह साधु सोचता है।।

हनुमान जी ने शिक्षा सूर्य से ली है,दीक्षा राम ने दी है और भीक्षामॉं जानकी ने दी है।।

आज के जगत में आगे शास्त्र और पीछे शस्त्र खड़ा है।।

ऊपर से शास्त्र नीचे शस्त्र दिखते हैं।।

शास्त्र के नाम पर,तथाकथित विचारधारा के नाम पर सनातन धर्म के बारे में बहुत गलत हो रहा है।।

धरती का स्वर्ग हो वैसे मनमोहन आलप्स पहाड़ियों के बीच में घिरा स्वीट्झरलेन्डवकादाओस और दाओसकॉन्ग्रेसहॉल में जहां अब तक औरत का मंच बना रहता था अब सत्य प्रेम और करुणा धाम का मंच पहली बार मिल रहा है ऐसा कहते हुए मनोरथी परिवार के सुनिलभाइ ने बिल्कुल कम शब्दों में अपनी खुशी और बापू ने कथा प्रदान की उन पर आभार का भाव जतायें।।

भारत से आए गुरु शरणानंद जी ने अपनी खुशी व्यक्त की और कहा कि धरती का यह स्वर्ग है तो दावोस को हम देवोस- देवों का आवास भी कह सकते हैं और कथा श्रवण करने का सौभाग्य मिला यह बात कर कहा कि जैसे अपनी भावना होगी ऐसे वाइब्स यहां से हमें मिलेंगे।।

मनमोह और खुशनुमा वातावरण में मोरारि बापू द्वारा 960वीं रामकथा का आरंभ हुआ।।

महामंत्रजोइजपतमहेसू।

कासीमुकुति हेतु उपदेसू।।

बालकॉंड दोहा-१९

मंत्र महामनिबिषयब्याल के।

मेटत कठिन कुअंक भाल के।।

बालकॉंड दोहा-३२

बापू ने इन बीज पंक्तियों के साथ कथा के आरंभ पर कहा कि परमात्मा की अहेतु असीम कृपा से रमणीय देश में कथा लेकर आना हुआ।।

और अपने संतों के साथ ब्रजभूमि रमण रेती धाम से करुणा लेकर स्वामी शरणानंद जी आए वह भी खुशी की बात है।। सभी को प्रणाम करते हुए बताया कि यहां की धर्ममयी काम मयी अर्थ और मोक्ष मयी प्रगट-अप्रगट सभी चेतनाओं को प्रणाम।।कथा के विषय के बारे में बताते हुए कहा कि गुरु पूर्णिमा के बाद दो-चार दिन तलगाजरडा में रहे ऐसे ही स्वाभाविक संवाद होते रहे।तब एक बात उठी की सूत्र विचार मंत्र के रूप में ग्रंथ के रूप में कोई विशेष नियम या व्रत के रूप में कौन सा मंत्र प्रधान है?इस समय मन में गुरु कृपा से निर्णय आया कि इस बार की कथा में मानस महामंत्र पर संवाद रचे।।

गत साल नॉर्वे की कथा में मानस मंत्राष्टक लिया था इस बार मानस महामंत्र की छाया में राम कथा को केंद्र में रखते हुए,अन्य ग्रंथों का आशीर्वाद लेते हुए साधु संतों के आशीर्वाद प्राप्त करके जो कुछ गुरु कृपा से प्राप्त हुआ हम मिलकर संवाद रचेंगे।। यह दोनों पंक्ति नॉर्वे की कथा में भी उठाई गई थी और गुरु शरणानंद जी ने सिंदूर ऑपरेशन को याद किया दोनों पंक्ति बालकांड की है।। सभी सोपनोमेंं विशेष पंक्तियां हैं और एक-एक सोपान में क्या है वह बताते हुए कहा कि:

बालकांडमंत्रात्मक कांड है।। इसमें मंत्र की बड़ी महिमा है।।प्रथमसोपानमंत्रात्मक है। नाम वंदना में बृहद रूप में राम नाम मंत्र का महिमा और वंदन हुआ है।। दूसरा सोपानसत्यात्मक है। सत्य के लिए जो घटना घटी।।सत्य के समान कोई धर्म नहीं। स्पष्ट है सत्य के समान,दया के समान,पर हित के समान कोई धर्म नहीं है।।तीसरासोपानअरण्यकांडसूत्रात्मक है।। सूत्र ही सूत्र है।चौथासोपानस्नेहात्मक है।। प्रभु का स्नेह सभी पर बरसा है।। पांचवासोपानसुंदरकांडसेवात्मक है। सेवा धर्म से भरा है।

यह भी बताया कि क्या ठीक है इससे बेहतर है किसके साथ क्या ठीक है वह साधु सोचता है।। बापू ने यह भी याद किया कि अभी अमेरिका में पांच हजार लोगों ने भगवद गीता का पाठ किया वहां केवल भारतीय नहीं विदेशी भी है।। राम की सीता कभी खो सकती है क्या! वह भिन्न हो सकती नहीं।।लेकिन हनुमान जी सीता खोज करने गए हनुमान जी ने शिक्षा सूर्य से ली है।। दीक्षा राम ने दी है।अपने आप को सेवक समझना सचराचार के सभी को स्वामी समझना ऐसी अनन्यता की दीक्षा दी है।। और अनन्यता की परीक्षा के रूप में लंका भेजे गए।।भिक्षामॉं जानकी ने दी है।।सीता खोज के लिए लंका गए सीट नंबर लंका में आया था! छठा सोपान लंका कांड शस्त्रात्मक है।। पीछे छिपा भाव शास्त्र है।। शस्त्र के माध्यम से शास्त्र समझाया जा रहा है।।

आज के जगत में आगे शास्त्र और पीछे शस्त्र खड़ा है।ऊपर से शास्त्र नीचे शस्त्र दिखते हैं।। शास्त्र के नाम पर तथाकथित विचारधारा के नाम पर सनातन धर्म के बारे में बहुत गलत हो रहा है।

शास्त्र मारने के लिए नहीं तारने के लिए है।।उत्तरकॉंडस्मरणात्मक है। निरंतर स्मरण है।। वंदना प्रकरण में भी यह पंक्ति है।।रामचरितमानस स्वयं महामंत्र है।।

यहां पंक्ति में लिखा है काशी में जो जो प्राण छोड़ते हैं उसकी मुक्ति के हेतु शिव निरंतर राम नाम का उपदेश करते हैं।।मंत्र कई रूप में है। हम महामंत्र की परिक्रमा करेंगे।। मंत्र के प्रकार है। लेकिन जीवन के लिए सबसे महामंत्रहै:स्विकार।। जितने भी द्वंद है सब का स्वीकार करना महामंत्र है।। मानस स्विकार का शास्त्र है।। यदि यह हम सीख ले तो मन पर ना बोझ रहेगा ना भार रहेगा।। रामचरितमानस के तमाम पात्र स्विकार का महामंत्र लिए बैठे हैं।।राज मिले! वन मिले! सब का स्वीकार।। कृष्ण अर्जुन को कहते हैं तुं युद्ध का भी स्वीकार कर।। हर एक व्यक्ति में कम या ज्यादा मात्रा में साधु बैठा है।। सब में ब्रह्म को समान रूप में देखना यह मानस सीखाता है।। स्विकार में सहजता है अस्विकार में ऊर्जा खर्च करनी पड़ती है अध्यात्म जगत में स्विकार शांत होता है।।

अनेक मंत्र में एक है नाम मंत्र।। जाप और संकीर्तन किया जाता है।।शिवजी राम के नाम को मंत्र बुद्धि से जपते हैं। दूसरा मंत्र,तीसरा लघु मंत्र।। सूक्ष्म छोटा।।फिरमहामंत्र।।एक गोप्य गुप्त मंत्र।। एक है बीज मंत्र।। एक है वेद मंत्र और लोक मंत्र के रूप में साबर मंत्र।। गुरु मंत्र। परम मंत्र और मंत्रराज भी है। एक बार स्विकार करके देखो फिर देखो चमत्कार! लेकिन अहंकार स्विकार करने नहीं देता।।

अपनी इच्छा से प्रतिकूल घटना घटे तो नियति समझना।। हमसे कुछ अच्छा हो जाए तो निमित्त समझना और कल्पना से बाहर हो जाए तो नेति समझना।। जो साधक नियति,निमित्त और नेति का महिमा समझ लेगा वह हल्का-फुल्का रहेगा।।

फिर प्रवाही, पवित्र परंपरा में सद ग्रंथ का महिमा में ग्रंथ के सात सोपान,पहले सोपान के सात मंत्र और वहां विविध वंदना।पांचसोरठे में पंच देवों की वंदना गुरु वंदना और हनुमत वंदना तक कथा को लेते हुए बताया कि हनुमान सकल गुण निधान है। सकल का मतलब नव गुण है हनुमान में।। यह नव गुण खरे उतरे वह मंगल मूर्ति है।।जहां अभय,अजर,अमर, विश्वास,वैराग्य,ज्ञान,सेवा,अनन्य भाव और यह नव न हो तो सिर्फ नव-नवीन ताजा तरोंजा रहे ऐसा कहकर आज की कथा को विराम दिया गया।।

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