पूर्ण को पूर्ण से भर दो तो फिर पूर्ण बाकी रहता है!
पूर्ण को खाली कर दो तो शून्य हो जाता है और शून्य को भर दो तो वह पूर्ण हो जाता है।
कथा सिद्धांत नहीं स्वभाव है।।
स्वभाव ही अध्यात्म है।।
भगवान उसे कहते हैं जिसमें छ प्रकार के ऐश्वर्य है।।
ईश्वर शब्द सबसे पहले भगवान शंकर को लागू करता है।
ईश्वर महादेव है।।
लखीसराय-बिहार में चल रही रामकथा आज सातवें दिन में प्रवेश कर गयी।।विलंबित स्तुतिगान के बाद कथादौर को पकडते हुए बापु ने आरंभ में बापू ने बताया कि मैं जहां ठहरा हूं मेरे कमरे में मेरी कुटिया में एक प्रयोग किया।मेरे पास खदिरादीवटी की एक डिब्बी है। पूरी डिब्बी में से गोलियां निकाल के एक पात्र में भर दी तो डिब्बी शून्य हो गई।फिर भी वह डिब्बी में वायु भरा है।।फिर सब गोलियां इस डिब्बी में डाल दी तो फिर वह पूर्ण हो गई।।और ऐसे वही प्रयोग पानी की बोतल लेकर व्यासपीठ पर भी बापू ने दिखाया और कहा कि हमारे वेद का सूत्र पूर्णमद पूर्णमिद पूर्णात पूर्ण मुद्च्यते पूर्णश्य पूर्ण मेवा व शिष्यते-यह हमें समझ में आता है।।
पुर्ण से पुर्ण निकाल दो तो बाकी पूर्ण बचता है और पूर्ण को पूर्ण से भर दो तो फिर पूर्ण बाकी रहता है! पूर्ण को खाली कर दो तो शून्य हो जाता है और शून्य को भर दो तो वह पूर्ण हो जाता है।
वैसे कथा पूर्ण है।। पूरी हो जाती है तब भी अवकाश रहता है वह पूर्ण होता है।।
कथा सिद्धांत नहीं स्वभाव है।। और स्वभाव ही अध्यात्म है।।हर एक धर्म के अपने सिद्धांत होते हैं अध्यात्म में कोई सिद्धांत नहीं होता। अध्यात्म द्वैत और अद्वैत दोनों को मानता भी है और दोनों को छोड़ भी सकता है।।भगवान उसे कहते हैं जिसमें छ प्रकार के ऐश्वर्या है।। लेकिन ईश्वर शब्द सबसे पहले भगवान शंकर को लागू करता है। ईश्वर महादेव है ऐसा कह सकते हैं।।अभिमान होना चाहिए।मैं किसी का हूं। मैं रघुपति का सेवक हूं यह अभिमान रहना चाहिए लेकिन अहंकार नहीं होना चाहिए।। अहंकार एक बहुत बड़ा रोग है।।
श्रृंगी ने पांच प्रकार की साधना की है। एक है-पृथ्वी की साधना।। पृथ्वी अचल है,अनंत है और सहनशीलता का गुण है।। सत्य से भरी है। दूसरी आकाश की साधना की है।। आकाश के तीन रूप बापू ने बताये।वो शांत भी है अनंत है असंग है। तीसरी साधना अग्नि की की है।। अग्नि की सबसे बड़ी साधना श्रृंगी ऋषि ने की और इसलिए अग्नि से ही खीर का प्रसाद प्रकट होता है।। यहां जब सूंगी ऋषि की मूर्ति का प्रतिष्ठान होने वाला है तब सदा वहां अग्नि प्रकट रहे ऐसा कुछ होना चाहिए। लेकिन यह करना मुश्किल भी लगता है।।
चौथी पानी की साधना की। हमारे मदन मोहन मालवीय जी ने विदेशियों को कहा कि आप नदी को पानी समझते हैं हमारे लिए यह वह सिर्फ पानी नहीं माता है।। एक वायु है-ऑक्सीजन जो दहन पोषक है। दूसरा वायु है-हाइड्रोजन जो दहनशील है।।लेकिन दोनों को मिलाकर जो बनता है- पानी वह दहन शामक है। दोनों का गुण नष्ट होता है।।
पांचवी साधना वायु की की है। वायु का गुण ऊपर जाने का है।
संक्षिप्त में अयोध्या कांड में भगवान राम का वनवास का प्रसंग और राम के विरह में दशरथ की मृत्यु और फिर भारत और राम का मिलन और राम के द्वारा भरत को पादूका दे गई। पादुका से भरत अयोध्या का राज चलाते हैं। और भरत के गुण का वर्णन करके अयोध्या कांड का समापन हुआ और आखिर में पूरे पंडाल को रास रचाकर आज विराम हुआ।।
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