
दुनिया की सभी सात्विक कलाएं तलगाजरडा की भूमि में प्रतिष्ठित हो, सम्मानित हो और वंदना हो:बापु।।
वाल्मीकि ने बींब-राम को,छाया-सीता को और प्रतिबिंब को भी आश्रय दिया।।
मंत्र भी बहुत प्रकार के होते हैं:धारक मंत्र,तारक मंत्र मारक मंत्र(तंत्र में प्रायोजित),बारक मंत्र (बार एक), वारक मंत्र और भारक मंत्र(जो बोज-भार रूप लगता है)।।
वाल्मीकि जी ने यह गायत्री मंत्र का ही विस्तार किया है।
कथा सुनने से दोष,दुख संताप मिटने चाहिए।।
महाराष्ट्र के लातुर जिले के औसा तालुका के किल्लारी में चल रहा रामकथा यग्य बुधवार को जब पांचवे दिन में प्रवेश कर रहा है तब महाराष्ट्र की सभी चेतनाओं,साधु संतों को प्रणाम करते हुए वारकरि दिव्य धारा के साधक,गायकों,वादकों के प्रति अपना प्यार जताते हुए बापू ने गत शाम वारकरि संप्रदाय के महाराज श्री द्वारा किया गया चक्रीय भजन को याद करते हुए बताया कि गीता का श्लोक याद आ गया!जहां कीरिट-मुकुट,वीणा- गदा,चक्र यह चक्रीय भजन नहीं सुदर्शन चक्रीय भजन है।।गीता के ११वें अध्याय में लिखा है वो सब याद आ गया और यह परंपरा दीर्घकालीन रहे ये भाव रखते हुए बापु ने बताया की दुनिया की सभी सात्विक कलाएं तलगाजरडा की भूमि में प्रतिष्ठित हो,सम्मानित हो और वंदना हो ऐसा अपना भाव जताते हुए बापू ने कहा की रामकृष्णहरि-जो तुकाराम जी को सपने में मिला हुआ मंत्र है।।
मंत्र भी बहुत प्रकार के होते हैं:धारक मंत्र,तारक मंत्र मारक मंत्र(तंत्र में प्रायोजित),राम मंत्र बारक मंत्र (बार एक) और वारकरि का वारक मंत्र और भारक मंत्र(जो बोज-भार रूप लगता है)।।
साथ ही एक प्रश्न के ऊपर संवाद करते हुए कहा कि पूछा गया है राम का वनवास १४ साल हुआ तो अयोध्या की कोइ व्यक्ति वन में गई कि नहीं?भरत जी पादुका लेकर लौट आए।बाद कुछ समय राम के साथ जो खेलते थे,कुमार अवस्था में,सम व्यस्क थे सख्य भाव से रहते थे वह लोग जब राम बहुत दुखी होते थे,वन में चले जाते थे और दूर से चित्रकूट में तीनों को देखकर,दरवाजे से झांकी करके रोते हुए वापस लौट जाते थे।।जो प्रेम करते हैं उसकी यही दशा होती है।।
हिंदी में कहावत जैसा सूत्र आ गया मैं और मेरी तन्हाई…लेकिन अध्यात्म जगत में मैं और मेरा कन्हाई मेरा कृष्ण..
राम के साथ खेलते थे वह कभी जाते थे। निषाद राज गुह को कहा गया था रोज भगवान ने क्या किया वह एक-एक दिन पत्र लिखकर अयोध्या में भेजते थे।।गृह राज ने यह नियम निभाया।
राम वनवास के बाद कौशल्या अपने राज भवन में शयन कक्षा में नहीं गई।राम जो छोटे-छोटे धनुष बाण से खेलते थे वह अपने सिरहाने के पास रखती थी और निहारती रहती थी!
राम का धनुष शस्त्र नहीं।जगत सुन ले! दिखता है वही अर्थ न लो।एक्स-रे लो!शस्त्र के पीछे राम का संदेश क्या है? गीता में श्री कृष्ण कहते हैं शस्त्रधारियों में राम में हूं।।संयम नियम राम के बाण है।।किसी को मार दिया वह लीला मात्र है। बाकी यह शास्त्र है।
रोज पत्र आता था।कौशल्या पत्र पढ़कर रघुकुल गुरु वशिष्ठ को भेजती थी।हर समाज को चाहिए अपने कुल की हर बात अपने कुल गुरु को मालूम हो। वशिष्ठ पढ़ते तो उनकी आंख में आंसू आ जाते थे वशिष्ठ पुरोहित कर्म करने वाले नहीं थे लेकिन कहा गया था तुम जहां पुरोहित बनोगे वहां ब्रह्म राम जन्म धारण करेंगे।।रघुकुल गुरु यह पत्र लेकर घर-घर जाते थे।।आज भी गांव में गोर बापा घर घर जाकर समाचार देते हैं।
राझी है हम जिसमें तेरी रजा है।
सीता के अपहरण और युद्ध की खबर भी आ गई लेकिन कोई गया नहीं है।।सीता जी को वाल्मीकि के आश्रम में भेजने के बाद भी कोई अयोध्या वासी नहीं गया।।स्नेह,दया,सत्य,जानकी तक सब छोड़ दूंगा लेकिन मैं लोक आराधना नहीं छोडूंगा ऐसा कहने वाले राम तो नहीं जाते। लक्ष्मण और भरत भी नहीं गए!वशिष्ठ जब सकते थे!यजमान की पुत्रवधू है और जानते थे जगदंबा पराम्बा है।सुमंत भी नहीं जा सकते? केवल एक व्यक्ति गई वह है:शत्रुघ्न।।
लव कुश का जन्म हुआ तब दैव योग से शत्रुघ्न वहां है।।गीतावली के ३४वें पद में यह प्रमाण मिलता है। गीतावली के उत्तर खंड का अंतिम पद पूरा रामचरितमानस है।।
लव-कुश के जन्म पर शुभ दिन शुभ घड़ी ऋषि पत्नियां गाति बजाती है।भवन और आश्रम में आनंद छाया है। लव कुश का जन्म हुआ है उसी दिन शत्रुघ्न विधि बस वहां आए।।परिवार में सबसे छोटे को बड़े की बहुत याद आती है।
वाल्मीकि रामायण घर-घर में नहीं पहुंचा क्योंकि वह संस्कृत में है।।आदि में तो वही है।ज्यादातर विद्वानों के पास रहा है। वह मूल का है लेकिन पर्ण का प्रचार होता है मूल धरती में ही रहते हैं। कालखंड राम से पहले का है,फिर राम आए हैं। राम के काल का सब विद्वानों के अपने मत है। यह आदिकाल का है।। हमारे गुजरात के रणछोड़ दास जी महाराज के पास कोई जाते तो रोग मिट जाता था।तब वह कहते थे कि मेरे पास वही आते हैं जिसका रोग परमात्मा मिटाना चाहते हैं,लेकिन परमात्मा साधु को मुझे जश देने के लिए मेरे पास भेजते हैं।।
वाल्मीकि ने बींब-राम को आश्रय दिया,छाया-सीता को आश्रय दिया और प्रतिबिंब को भी आश्रय दिया पहला श्लोक ओम से शुरू होता है।
फिर हर हजार वें श्लोक से भूर भुव: स्वह: से शुरू होता है और १०० श्लोक में यह गायत्री मंत्र आता है (ओम भूर भुव: स्वह:) वाल्मीकि जी ने यह गायत्री का ही विस्तार किया है।
वाल्मीकि को बहुत आनंद आता है।लेकिन एक पीड़ा भी शुरू होती है की ग्रंथ तो बन गया लेकिन गाएगा कौन?कुश बड़ा और लव छोटा है।दोनों ८ साल के हो गए और लव कुश के हृदय में रामायण के शब्द,बिटवीन द लाइंस,सब कुछ समझा दिया। गुजराती में कहते हैं मारी तिजोरी मां अढळक नाणा पण मारे कुची कोने सोंपवी…
यह बच्चे गायेंगे लेकिन सुनेंगे कौन?श्रोता कौन होगा?अपने हाथों से वाल्मीकि ने एक पत्र लिखा और वन में ऋषि मुनियों सभी के आश्रमों में भेजा गया कि आओ रामकथा का गायन हो रहा है।।
और रामकथा का प्रथम श्रोता साधु ही है।ऋषि मुनि साधना छोड़कर आए।।पूरा आश्रम भर गया लव और कुश ने ऐसा गाया कि जैसे प्रत्यक्ष दर्शन हो।
धर्मसभा से भी साधुसभा ज्यादा अच्छा शब्द लगता है।
कथा सुनने से दोष,दुख संताप मिटने चाहिए। मानस कहता है हमारे दोष,दारिद्र और संताप मिट जाते हैं।।
विश्व पूज्य आदमी हो लेकिन उनसे सत्य ना मिले तो नहीं सुनना चाहिए।।
वाल्मीकि जी का पहला प्रयोग सफल हुआ फिर वाल्मीकि जी एक और मनोरथ हुआ यह कथा यदि बालकों के द्वारा अयोध्या में गाई जाए।
अयोध्या में राजा राम यज्ञ कर रहे हैं यही अवसर है वाल्मीकि जी ने लव कुश को वहां भेजने का निर्णय किया।।सरस्वती से दीक्षित दो विणा दोनों को दी गई और यह भी कहा गया कि अयोध्या में किसी के घर भोजन मत लेना और कोई पूछे तो माता का नाम मत बनाना।यही कहना कि वाल्मीकि का शिष्य हूं।।
और दोनों भाई अयोध्या की ओर जा रहे हैं।
फिर बापू ने वारकरि संप्रदाय का वह मंत्र का कीर्तन किया और खुद भाव में आकर व्यास पीठ से नीचे उतरकर सभी के साथ भाव कीर्तन में जुड़े और पूरा पंडाल भाव मग्न होकर बापू के साथ कीर्तन में नाच उठा।।

