
उसे कथा मत सुनाओ जो भीतर से शांत नहीं है।
किसी भी प्रकार की अभिलाषा है तब तक जीव शांत नहीं है।।
राग-द्वेष,ज्ञान का घमंड शांत नहीं रहने देता।
कथामृत केवल मृत्युलोक में है।।
साधु बार-बार मृत्युलोक में परमात्मा के परित्राण के लिए आते हैं।।
केरलम की प्राकृतिक वैभव से भरी भूमि पर कोचि में चल रही रामकथा सोमवार को तिसरे दिन में प्रवेश कर रही है तब ये मंत्र का गान करवा के पाठशाला का वातावरण बना:
वेदान्तेपरमंगुह्यंपुराकल्पेप्रचोदितम्।
नाप्रशान्तायदातव्यंनापुत्रायाशिष्यायवा पुनः॥
पुराकल्पेवेदान्तेप्रचोदितंपरमंगुह्यम् *अप्रशान्ताय
वाअपुत्रायअशिष्यायवा पुनः न दातव्यम्॥
-श्वेताश्वतरोपनिषद
भगवान राम साकेत में रहते हैं लेकिन पढ़ने के लिए आश्रम और पाठशाला में पढना है तो ब्रह्म को भी मृत्यु लोक में आना पड़ता है।यहां श्लोक में बताया है कि जटिल गुह्य,गोप्या रहस्य से भरा हुआ,सभी वस्तु का निचोड़ जैसा कोई प्रकरण जब उठाया जाए तब जो अंदर से शांत नहीं है उसे यह बात ना कहीं जाए।।जो शांत-प्रशांत चित से सुने उसे ही दी जाए।
हम तीन-चार घंटे कथा में होते हैं तब चारों युग की यात्रा होती है।।ध्यान सतयुग का प्रथम साधन माना गया।जब मंगलाचरण चलता है तो आधे घंटे तक सतयुग है।।फिर कथा शुरू होती है, विषय प्रवेश होता है तब कथा त्रेतायुग बन जाती है। त्रेता का साधन है-यज्ञ। इसलिए कथा को हम ज्ञान यज्ञ,प्रेम यज्ञ कहते हैं।। कथा में शांत,हास्य,वीर,श्रृंगार आदि रस यह परमात्मा की षोडोपचार पूजा द्वापर युग दिखाती है।।और आखिर कथा पूरी होती है तब कलयुग का प्रथम साधन-नाम,हरिनाम भगवान की कथा चारों युग की यात्रा कराती है।।
उसे कथा मत सुनाओ जो भीतर से शांत नहीं है। भीतर से शांत होने की बड़ी व्याख्या हो सकती है। किसी भी प्रकार की अभिलाषा है तब तक जीव शांत नहीं है।।राग-द्वेष,ज्ञान का घमंड शांत नहीं रहने देता।ज्ञान भी बंधन है।ऐसाशिवसूत्र का सूत्र है लेकिन मानस कहता है ज्ञान मुक्ति देने वाला है! तो ज्ञान का अहंकार बंधन है।।
परम रहस्य अशांत को नहीं दिया जाता।अपने पुत्र को ही कहना,शिष्य को कहना।।शास्त्र की संतान बनकर सुनना।।
सभी शास्त्र में कुछ अपेक्षा रखी है कि यह किसे कहना चाहिए किसे नहीं।दादाजी मुझे कहते थे शांत बनकर सुनना वो आज पता चलता है कि यह क्यों कहा था।हर लम्हा बहुत महत्व का है।।जैसा भाव इष्ट देव में हुआ ऐसा ही गुरु में ईश्वर परक भाव रख कर सुनना तब प्रकाश होगा।।
कथामृत केवल मृत्युलोक में है। इंद्र स्वर्ग का अमृत लेकर शुकदेव जी के पास सौदा करने आए। शिव शिवलोक छोड़कर कैलाश में बैठते हैं।।विष्णु वैकुंठ को छोड़कर सीधा वृंदावन में आते हैं।तुलसी कहते हैं वृंदावन ही वैकुंठ है।तुलसी धरा के प्रेमी है। राम अयोध्या में आए तो साकेत से पूरा टुकड़ा लेकर आए।।मृत्युलोक का अमृत है भगवत कथा,हरि कथा,सदकथा।।
मृत्यु लोक सागर है,भवसागर है।।
गितावली रामायण में लंका कांड में पांच बात लिखी है: कइं लोगों ने समुद्र का खनन किया।।कई लोगों ने बांधा है।।कोई ने लांघा है।।कई लोगों ने समुद्र का मंथन किया और कई लोगों ने समुद्र का पान किया है।।
मृत्यु लोक के सागर में यह पांच वस्तु सीख जाए तो अगाध सागर से उगर जाएंगे।।
सगर पुत्रों ने सागर का खनन किया है।नल नील ने बांधा है।हनुमान ने सागर को लांघा और सूर-असुरों ने मिलकर मंथन किया।कुंभज ने पिया है। मंथन से १४ रत्न निकलते हैं।।संसार सागर के मंथन से सात रत्न निकलते हैं ।।
पहला रत्न है:शांति।।मृत्यु से कैसे शांति? जो मरा है उसे शांति मिलती है।।दूसरा रत्न है प्राप्ति। मुक्ति की प्राप्ति।। निर्वाण,मोक्ष या तो नए शरीर की प्राप्ति होती है।। मुक्त होने में क्या फायदा? रस पीने का ही फायदा है।।साकर बन जाने से नहीं साकर का स्वाद लेने से स्वाद आएगा।।तीसरा रत्न है आत्म ज्योति प्राप्त होती है।।चौथाधृति-धीरज आती है।।अनासक्ति मिलती है। मृतदेह को कोई आसक्ति नहीं होती,अपेक्षा नहीं होती।।
मृत्यु का खनन करने का मतलब है गहराई में जाना है।। मृत्यु संसार को लांघना है।।मृत्यु रूपी समुद्र के रस को पीना है।।
स्वर्ग में सूर,पाताल में असुर,धरती पर मानव केंद्र में है।।
इसलिए कुछ निर्णय करना,कुछ खोज करना,रस प्राप्ति करना इसलिए यह कथा है।।
साधु बार-बार मृत्यु लोक में क्यों जाता है?परमात्मा के परित्राण के लिए आते हैं।।
कथा ऊपर से कैसे नीचे उतर कर आई वह आध्यात्मिक इतिहास कहते हुए शिव से भुसुंडी के पास फिर गरुड के पास,वहां से याग्यवल्क्य से होती हुइभरद्वाज और बार बार सुनकर तुलसी के पास आइ।।
मान सरोवर के रूपक से कथा को चार घाट बताते हुए भरद्वाज और याज्ञवल्क्य कुंभ के मेंले में मिलते हैं और वहां दोनों के बीच संवाद होता है और कथा शुरू होती है।।
== समाप्त ==

