Homeगुजरातमैं और मेरी तन्हाई नहीं, मैं और मेरा कन्हाई-होना चाहिए।।

मैं और मेरी तन्हाई नहीं, मैं और मेरा कन्हाई-होना चाहिए।।

स्मरण मरण को मार देता है।।

बाल्यावस्था में शिक्षा और युवानी में संयम प्राप्त किया तो बुढ़ापा अत्यंत प्रिय होगा।।

कुछ लोग मानते हैं जीवन कष्ट है,कुछ मानते हैं जीवन दुष्ट है,कई लोगों को जीवन भ्रष्ट और कई को नष्ट लगता है,लेकिन मेरे लिए इष्ट है।।

जीवन की साधना की पीठिका मृत्युलोक है।

मृत्युलोक में हमारी मां प्रकट हुई है इसलिए अनेक स्वर्ग से वह ऊपर है।।

केरलम्-केरल की पवित्र भूमि कोच्चि में चल रही नव दिवसीय रामकथा रविवार को दूसरे दिन में प्रवेश कर रही है तब बहुत सी बातें पूछी गई थी। मराठी का अभंग जो मृत्यु लोक का महिमा गान करता है और गुजराती में भी एक दोहा लिखा है, मृत्यु लोक के बारे में:

स्वर्ग थी पण सोहामणुं मानव ने मृत्यु लोक।

त्रण वस्तु अळखामणी:जरा,मरण विजोग।।

बापू ने कहा कि यहां रचनाकार को थोड़ी सी निराशा दिखती है।लेकिन देश,काल और पात्र बदल चुका है,तब कहू जरा-बुढ़ापा भी वंदनीय हो जाता है बाल्यावस्था में शिक्षा और युवानी में संयम प्राप्त किया तो बुढ़ापा अत्यंत प्रिय होगा।।थोड़ा दृष्टिकोण बदलना होगा।।

स्वामी सत्य वेदांत जी ने ओशो का एक प्रवचन जहां ओशो ने एक कल्पना कथा कही है।।बुद्ध,लाओत्से और कन्फ्यूशियस,वैसे वह समकालीन नहीं होंगे, लेकिन कल्पना में तीनों स्वर्ग में गए और वहां स्वर्ग में एक अप्सरा प्याली में कुछ लक्ष्य रस लेकर आई।। सबसे पहले लाओत्सु को देती है।लाओत्सु ने दो घूंट पिया और कहा कि बहुत मधुर और स्वादु है। फिर भगवान बुद्ध को दिया गया।बुद्ध ने कहा कि यह कटु है ऐसा कहकर छोड़ दिया।।कन्फ्युसियस को दिया गया उसने कहा कि यह बेस्वाद है। इस बात का अर्थ यही है की लाओत्से प्रकृति प्रेमी सौंदर्य के आशिक थे।।बापू ने बताया मेरे लिए मृत्यु लोक मधुर है।जगत इतना सुंदर तो जगदीश कितना सुंदर होगा!रचना इतनी सुंदर है तो रचनाकार की सुंदरता को अहोभाव से देखने की कोशिश करनी होगी।हमेंसीखाने के लिए बुद्ध ने जीवन को दुखदायक बताया है।।

कुछ लोग मानते हैं जीवन कष्ट है,कुछ मानते हैं जीवन दुष्ट है।कई लोगों को जीवन भ्रष्ट और कई को नष्ट लगता है।लेकिन मैं मानता हूं जीवन मेरे लिए इष्ट है।जीवन की साधना की पीठिका मृत्युलोक है। मृत्युलोक में निरंतर प्रसन्न रहने के कोई उपाय है? आठों प्रहर आनंद में रहने के लिए शंकराचार्य जी ने इसका जवाब दिया है।।

बापू ने कहा कि स्वर्ग का सच्चा मलिक सुरगुरु- बृहस्पति है।लेकिनसुरगुरु ने इंद्र आदि को रोका नहीं इसलिए आलोचना भी हुई है।सुरगुरु सुरेश से ऊपर है।।पाताल-नागलोक का मालिक शुक्राचार्य है और मृत्युलोक का कोई मालिक नहीं,एकमात्र मलिक सद्गुरु है।।

खासकर के युवा पीढी,जो थोड़ी सी बात पर डिप्रैस हो जाते हैं उनके लिए शंकराचार्य जी ने पांच वस्तु बताई नित्य आनंद में रहने के लिए कहा:

नित्यमेकांतसेवी:हमेशा एकांत का सेवन करना होगा।एकांत का भोग नहीं,सेवन करना चाहिए। हम एकांत भोगते हैं।।शत्रुहितौपदेशो:दूसरों के कल्याण की बात उन्हें एक बार कहनी चाहिए।। बापू ने कहा कि मैं और मेरी तन्हाई नहीं,मैं और मेरा कन्हाई- होना चाहिए।।स्वल्पद्राविहार:बहुत कम निद्रा और विहार करना चाहिए।।अनुनियमशीलै:अपने स्वभाव और नियम से चलना होगा और भजनयुक्तकालै: समय पर भजन स्वाध्याय करना होगा।।

स्मरण मरण को मार देता है।स्मर का मतलब कामदेव है और रण का मतलब संघर्ष है। दोनों से बचना है तो स्मरण करो,जो कामावेग और संघर्ष से हमें बचाता है।।

मृत्यु लोक के फायदे हैं।मरण है इसलिए जीवन है। बिना अश्रु कोई आश्रय करता नहीं।शंकराचार्य जी ने कहा जगत मिथ्या है,लेकिन वशिष्ठ भगवान राम जी को एक रूपक सुनाते हैं:तीन राजकुमार थे लेकिन दो का अभी जन्म नहीं हुआ तीसरा गर्भ में नहीं आया था! तीन वृक्ष के नीचे बैठे थे जो कभी पनपा ही नहीं और एक का बीज भी नहीं बोया था! वह वृक्ष से तीन फल मिले। दो फल काटे नहीं जा सकते और एक में रस ही नहीं था! इसका मतलब यह जगत माया है।लेकिन माया को सीता कहा है। तो माया को मातृ रूप से देखें तो मृत्युलोक की माया भी फायदा कारक है।।

मृत्यु लोक प्रकृति से सभरहै।जितनेसदग्रंथ आए पृथ्वी पर आए हैं।।स्वर्ग में संपन्नता है लेकिन प्रपन्नता और प्रसन्नता नहीं।।मृत्युलोक में ही परमात्मा के अवतार हुए हैं।।

कथा प्रवाह में हनुमान जी की बात करते हुए कहा की हनुमान जी का विशेष परिचय वाल्मीकि में बहुत मिलता है।हनुमान बंदर नहीं अति सुंदर और प्रज्ञा वान है।हनुमान की प्रवृत्ति अति सुंदर है।यदि बंदर होता तो सब कुछ तोड़ देता,हनुमान ने सेतु बनवाया है।।वह कुछ छीपाता नहीं,खोज करता है। बंदर की पूंछ होती है लेकिन हनुमान पूछने योग्य है उसे केवल बंदर ना समझे वह अति सुंदर है।।

भगवान राम के त्रिभुवन के अवतार कार्य में जिन-जिन ने सहयोग किया वह सब की वंदना करते हुए तुलसी जी ने सीताराम जी की वंदना की और फिर नाम महिमा,नाम वंदना का बहुत बड़ा प्रकरण विस्तार से किया है।।वह वंदना का गान हुआ।

मृत्युलोक में हमारी मां प्रकट हुई है इसलिए अनेक स्वर्ग से वह ऊपर है।।शास्त्र अनुसार कलियुग का प्रधान साधन भगवान का नाम है।।हरि नाम की महिमा का वंदन और गायन हुआ और आज की कथा को विराम दिया गया।।

== समाप्त ==

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Must Read