
कथा की फलश्रुति की मल छूटे,मल तो छूटता है लेकिन अभी मूल नहीं छूटता।।
मृत्यु है इसीलिए जीवन जीने जैसा यह लोक है।।
जहां मृत्यु नहीं वहां पतन है।।
पतन से मृत्यु कई गुना बेहतर है।।
मृत्यु के बिना जीवन का सही रूप और स्वाद नहीं मिलता।।
जीवन का स्वाद लेने के लिए मृत्यु अनिवार्य है।।
अठारह पुराणों का सार निचोड़ कर प्रकृति पुराण निकालना चाहिए।।
प्राचीन परंपराओं, औपनिवेशक इतिहास (कॉलोनियल इतिहास)और सांस्कृतिक विविधताओं से समृद्ध,जीन्हे ‘अरब सागर की रानी’ कहते हैं ऐसे कोच्चि के लुलु बोलगट्टी इंटरनेशनल कन्वेंशन सेंटर, बोलगट्टी आइलैंड,मुलवुकाड कोची-एर्नाकुलम केरल से शनिवार शाम मोरारि बापू के श्रीमुख से क्रम में ९७९ वीं रामकथा का आरंभ हुआ।।
कथा के आरंभ में मनोरथी रमाबेन जसाणी परिवार की दो बेटियां द्वारा स्वागत भाव विधि हुआ।।
अतिसय देखि धर्म कै ग्लानि।
परम सभीत धरा अकुलानी।।
धेनु रुप धरि ह्रदय बिचारी।
गइ तहां जहं सुर मुनि झारी।।
हरिहउं सकल भूमि गरुआइ।
निर्भय होहु देव समुदाइ।।
-बालकॉंड
बापू ने इन बीज पंक्तियों को उठाते और गायन करते हुए कथा के पहले दिन बताया कि परमात्मा की असीम और अहेतु कृपा से इस सुंदर नगरी में राम कथा का गायन करने के भाग्यवान बने हैं।तलगाजरडी प्रसन्नता व्यक्त करते हुए बापू ने कहा कि जसाणी परिवार की दो बेटियों ने अपना भाव प्रकट किया।।
पहली बार दरिया पार की कथा केन्या में हुई थी। जो देश के बाहर सबसे पहले कथा थी।तब से जसाणी परिवार व्यास पीठ से जुड़ा है।और यह माता ने बहुत काम किया है बहुत परिवारों की बहन और बेटियों को व्यास पीठ से जोड़ दिया है।सबको साधुवाद देते हुए बापू ने कहा कोच्चि की इस कथा आज से ५० साल पहले हुई थी तब दो समय कथा चलती थी।
यह भूमि जगतगुरु आदि शंकराचार्य की है।कोची एयरपोर्ट से कालडी १० किलोमीटर दूरी पर है।। वैदिक सनातन परंपरा के एक ज्योतिर्धर की यह शांकरी भूमि है।।
इस बार मानस मृत्यु लोक पर बोलने की बात करते हुए बापू ने कहा स्वर्ग के प्रलोभन बहुत दिए गए। नर्क का भय हमें सताये जा रहा है,लेकिन मृत्यु लोक की बात कोई नहीं करता।।
मानस स्वर्ग पर एक कथा हुई है।
इतनी कथा के बाद निंदा,द्वेष इर्षा ना छूटे तो हम नर्क में ही जी रहे हैं! इतने साल की कथा की फलश्रुति क्या?प्रारंभिक फलश्रुति मल छूटे।मल तो छूटता है लेकिन अभी मूल नहीं छूटता।। इतनी कथाओं के बाद यह विनम्र प्रयास है मल छूटे अच्छी बात है लेकिन मूल मिटे।। फिर कुछ कुंपले अंकुरित ना हो।।
पृथ्वी लोक को मृत्युलोक कहते हैं।।यहां मृत्यु है इसीलिए जीवन जीने जैसा यह लोक है।।जहां मृत्यु नहीं वहां पतन है।।पतन से मृत्यु कई गुना बेहतर है यह बड़ा महिमावंत लोक है।।
मृत्यु के बिना जीवन का सही रूप और स्वाद नहीं मिलता।।ओशो ने एक शिविर की थी में मृत्यु सिखाता हूं।।जीवन का स्वाद लेने के लिए मृत्यु अनिवार्य है।।
उपनिषद में मृत्यु से अमृत की तरफ जाने की बात करी यह बचने के लिए नहीं लेकिन महामृत्यु में प्रवेश के लिए कहा गया है।।जितने भी शुभ विचार सत्संग और शिविर हुए सभी मृत्यु लोक में ही हुआ है।।गंगा यहां वही है,स्वर्ग में नहीं।।यह धरा पृथ्वी लोक बहुत महिमावंत है।। तुलसी जी ने स्वर्ग लोक की बात इतनी नहीं उठाई।।तुलसी धरा के प्रेमी है। उपदेश में पर मन मुकुर सुधारी-होता है।तुलसी ने निज मन मुकुर को सुधारने की बात की है।।
वैसे १४ लोक है।ग्रंथ कहते हैं अनंत ब्रह्मांड है। लेकिन ज्यादातर यहां त्रिभुवन:स्वर्ग पृथ्वी और पाताल है।।यह मध्यम मार्ग है। महादेव पृथ्वी पर मृत्यु लोक में रहते हैं।।महादेव एनआरआई नहीं है! मानस मृत्यु कथा सिडनी में की है।।रामायण काल कुछ लोग जो मरना नहीं चाहते थे इनमें रावण भी शामिल था।। मृत्यु लोक में रहकर मरना नहीं यह बिल्कुल अज्ञानता का उद्घोष है।।
बापू ने कहा कि मुझे ऊपर देखना का सिखाने वाले पांच शिखर है:कैलाश,गिरनार,आबू,कामदगिरि चित्रकूट और गोवर्धन।।
जो मरना सीख जाता है वह जीवन को पा लेता है गंगा की महिमा मृत्यु लोक में हुई।।जीना आ जाए तो मृत्युलोक अमृतलोक हो जाए।।
अठारह पुराणों का सार निचोड़ कर प्रकृति पुराण निकालना चाहिए।।
फिर कथा के क्रम में ग्रंथ महात्म्य में सात कांड का यह सोपान वाला रामचरितमानस ग्रंथ और पहले सोपान के सात मंत्र।।फिर विधि-विध वंदनाओं का गायन करते हुए गुरु वंदना का गायन हुआ।।
पवित्र प्रवाही और परोपकारी परंपरा में हनुमंत वंदना का गायन करके आज की कथा को विराम दिया गया।।
== समाप्त ==

