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परम तत्व,जो परम है वह माता भी बन सकता है और बाप भी बन सकता है।।

परम सत्य सामने आता है तब छोटा सत्य बलिदान दे देता है।।
उषा,जागृति,संध्या,निशा और निंद्रा प्रकृति का मातृपंचक है।।
ईश्वर मिल जाए तो भी यग्य दान और तप छोड़ना नहीं चाहिए।।

घाटकोपर के अत्रे मेदान से बह रही रामकथा धारा सातवें दिन में पहुंची।।
रोज तेजी से बहता दान प्रवाह और अनेक संतो महंतो एवं कला उपासको की हाजरी के बीच कथा का आरंभ करते हुए बापू ने कहा कि हमने अपने राष्ट्र को भी मा कहा है।बाप भी कहा है। वंदे मातरम कहकर माता के रूप में बंकिम बाबू ने वंदन किया। लेकिन राष्ट्र पिता भी है। हमारे राष्ट्र पुरुष और बहुत बड़े समझदार दिवंगत अटल बिहारी वाजपेई जी ने हमारे देश को राष्ट्र पुरुष कहकर उनके मस्तक, कंधे कटी भाग और चरण क्या है वह छबि पेश की है।। बहुधा मां कभी बाप नहीं बन सकती और बाप कभी मॉं नहीं बन सकता।। लेकिन परम तत्व,राष्ट्र,ईष्ट,देव गुरु,इष्टशास्त्र।। जो परम है वह माता भी बन सकता है और बाप भी बन सकता है।। परम सत्य सामने आता है तब छोटा सत्य बलिदान दे देता है।। इसीलिए परम पवित्र,परम पावन,परम करुणा,परम प्रेम,परम तीर्थ,परम मंत्र,परम सूत्र,परम ग्रंथ जो ज्यादा अर्थदाई है।।परम है वह हमारा मॉं भी है और बाप भी है। हमारा राष्ट्र परम है इसलिए कहा है त्वमेव माता च पिता त्वमेव,त्वमेव बंधु च सखा त्वमेव हम परमात्मा को कहते हैं।।परमात्मा हमारे लिए सब कुछ है।।परम बुद्धपुरुष मिल जाए तो समझना हमें मां बाप भगिनी भाई और सखा मिल गया है।। प्रकृति में भी एक मातृ पंचक है।।

जहां पहले है:उषा।। उषा तत्व माता है।ओशो जिसे अमृत बेला कहते हैं।।अपने आखिरी बार सूर्य कब देखा?हम सब भागे जा रहे हैं।।

एक साल के बाद बोरीवली में कथा का मनोरथ बापू ने जाहिर किया।।
बापू ने बताया मन,बुद्धि,चित्त को रखना और अहंकार को ओवरटेक करना।।
जागृति हमारी माता है।। उपनिषद कहता है उत्तिष्ठत जागृत प्राप्य वरानिबोधोत: उपनिषद का यह मंत्र विवेकानंद जी ने जीवन मंत्र बना दिया।। तीसरी संध्या माता है।संध्या के समय ईश्वर गुणगान करना चाहिए।।कवि दाद ने संध्या पर पद लिखे हैं निशा हमारी माता है।।
और निद्रा भी हमारी माता है। जो दिन भर की थकान को उतार देती है।।

दूसरा एक मातृ पंचक राम माता,लक्ष्मण माता, भरत माता,हनुमंत माता और सीता माता का भी है बालकांड में तीन बार प्रकट शब्द आया जो यज्ञ दान और तप की ओर संकेत करता है ।।यह तीनों बुद्धिमान की बुद्धि को बार-बार शुद्ध करता है।

इसलिए ईश्वर मिल जाए तो भी यग्य दान और तप छोड़ना नहीं चाहिए।।
राम प्रागट्य के बाद एक महिने का दिन हुआ।चारों राजकुमारों का नामकरण संस्कार किया गया।।

नामकरन कर अवसर जानी।
भूप बोलि पठए मुनि ग्यानी।।
जो आनंद सिधु सुख रासि।
सिकरते तै त्रैलोक सुपासी।।
सो सुख धाम राम अस नामा।
अखिल लोक दायक बिश्रामा
विद्याभ्यास और चुडामणि संस्कार हुए।।

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