Homeगुजरातहर एक वस्तु में, हर एक घटना में यथा योग्य विनियोग साधक...

हर एक वस्तु में, हर एक घटना में यथा योग्य विनियोग साधक के लिए जरूरी है।।

प्रवचन से आत्मा नहीं मिलती,लेकिन मेरा विनय है रामकथा से आत्मा मिलती है।।

कथा प्रवचन नहीं, वचन है।।

मन बुद्धि चित् से कथा सुनते हो वह तप है।।

“सामान्य लोगों के मनोरंजन के लिए साधु को अपना स्तर छोड़कर नीचे नहीं आना चाहिए।।”

मन,बुद्धि,चित्त और अहंकार चारों के सही विनियोग से ही अंतःकरण में परमात्मा प्रकट हो जाता हैं।।

मेरे श्रोताओं में गर्भस्थ,वर्गस्थ और स्वर्गस्थ है।।

सत्य है वहां स्पर्धा कैसी!स्पर्धा सत्ता में होती है।।

जो शुष्क नहीं वह शुक है।।

मैं ‘पक्षी’ हूं,विपक्षी नहीं हूं।।

 

शुक्रताल की दिव्य और सेव्य भूमि पर चल रही रामकथा शनिवार को आठवें दिन में आइ।

शुक तीर्थ की प्रगट,अप्रगट,अर्ध प्रगट चेतनाओं को प्रणाम करते बापू ने भागवत का एक अद्भुत श्लोक कहा जहां लिखा है:सत्यं परम धीमहि।

हर एक वस्तु में,हर एक घटना में यथा योग्य विनियोग साधक के लिए जरूरी है।।यह विनियोग की बात मैं गहराई से जाते हुए बापू ने कहा विनियोग विषयी के लिए जरूरी नहीं।विषयी की बात यथायोग्य नहीं मानी जाती और सिद्ध लोग विनियोग से ऊपर उठ गए हैं।।

यथायोग्य विनियोग का अर्थ होता है:देश,काल, प्रसंग और पात्र।।

जैसे गंगा के तट पर भागवत का विनियोग हुआ तो यहां देश गंगा तट है,काल सात दिन है,पात्र परीक्षित है और प्रसंग भागवत धर्म है।।यह चारों का यथायोग्य विनियोग हुआ है।।

रामकथा में कैलाश के शिखर पर भगवान शंकर पार्वती को कथा सुना रहे हैं।तो देश है-कैलाश।काल सुसमय,अवसर जानकर एक पल है।।पात्र है पार्वती और प्रसंग रामचरितमानस है।।यहां यथायोग्य विनियोग हुआ है।।

और एक पीठ प्रयाग की जहां काल है माघ मकर गत माघ महीने का स्नान। पात्र भारद्वाज है और विषय प्रसंग राम तत्व के बारे में।।

जीवन के कर्मयोग में भी विनियोग का सूत्र मिलता है।।

पतंजलि जिसे ओशो आंतर जगत के वैज्ञानिक मानते थे वह पतंजलि ने विनियोग की कला दिखाते हुए कर्म योग के बारे में कहा है:तप: स्वाध्याय ईश्वर प्रणिधानामी कर्म योग:- इतना छोटा सूत्र है।।

जहां पहला है:तप।।

यहां भी श्रोता वक्ता दोनों का तप है।।

प्रवचन से आत्मा नहीं मिलती,लेकिन मेरा विनय है रामकथा से आत्मा मिलती है।।

वचन,प्रवचन,एकवचन,द्विवचन,बहुवचन-यह कथा संवाद-द्विवचन है।खुद बोले (एकोक्ति) एक वचन है शास्त्रों में महिमा वचन का है।।कथा प्रवचन नहीं, वचन है।।

मन बुद्धि चित् से कथा सुनते हो वह तप है।।

फिर स्वाध्याय-मानस की चौपाई,भागवत के मंत्र, उपनिषद के श्लोक,गीता के श्लोक को गाना और देखना यह स्वाध्याय है।।

और ईश्वर के नाम या मंत्र का निरंतर जप यह ईश्वर प्रणिधानामी है।।

संगीत में चार वस्तु का विनियोग है:ताल,लय,सूर और स्वर।।

सामान्य लोगों के मनोरंजन के लिए साधु को अपना स्तर छोड़कर नीचे नहीं आना चाहिए।।

क्रिकेट में भी बोलर बैट्समैन विकेटकीपर का विनियोग है।।

मन,बुद्धि,चित्त और अहंकार चारों के सही विनियोग से ही अंतःकरण में परमात्मा प्रकट हो जाता हैं।।

मेरे श्रोताओं में गर्भस्थ,वर्गस्थ और स्वर्गस्थ है।।

हमें लेनदेन आती है,विनिमय नहीं आता।।यदि सही विनिमय-विनियोग हो जाये तो चार वस्तु मिलेगी:

एक-स्पर्धा मिट जाएगी और श्रद्धा प्रकट हो जाती है दूसरा दाह-इर्षा मिट जाएगी,तीसरा तिरस्कार का भाव मिट जाता है और चौथा अहंकार मिट जाता है।।

सत्य है वहां स्पर्धा कैसी!स्पर्धा सत्ता में होती है।।

जो शुष्क नहीं वह शुक है,जो हरा भरा है।।

मैं ‘पक्षी’ हूं विपक्षी नहीं हूं।। किसी से मेरा विरोध नहीं है।।

अरण्य कांड में अत्रि और अनसूया की स्तुति करके कुंभज के मार्गदर्शन पर पंचवटी में जब राम लक्ष्मण और जानकी ने निवास किया,लक्ष्मण जी ने पांच प्रश्न पूछे और राम लक्ष्मण का संवाद हुआ।।जहां माया,ज्ञान,वैराग्य,जीव ईश्वर की छोटे से छोटी लेकिन बहुत सटीक व्याख्या बताई गई।।

फिर किष्किंधा कांड और सुंदरकांड में हनुमान जी, वाली,सुग्रीव और विभीषण आदि पात्रों का प्रवेश और शबरी की को गति देकर जब सीता का हरण हुआ चार टुकड़ी चार दिशाओं में जाती है।।

हनुमान जी ने सीता खोज का अभियान शुरू किया सीता की खोज करके वापस लौटे और राम अपनी सेना सहित लंका के तट पर आकर सेतुबंध रामेश्वर की स्थापना करते हैं।।

कल इस रामकथा का आखिरी,विराम का दिन है।।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Must Read