
राम राम रटनेवाला राम का दर्शन न कर पाये मगर कभी खुद राम बन जाता है।।
राम मनुष्य के रुप में ब्रह्म है।।
मेरी बातों को मन से,बुद्धि से,चित से सुने,मगर अहंकार मुक्त होकर सुने।।
चित् का निरोध करके नहीं चित्त को प्रबोध करके सुनना।।
राम ब्रह्म है वैसे रामकथा भी ब्रह्म है,रामनाम भी ब्रह्म है।।
रामनाम भी सुंदर है,सूजान है,रामनाम कृपा निधान है,रामनाम अनाथ पर प्रीति करने वाला है,नाम निर्वाण पद देता है।।
ओशो की प्रबुध्ध चेतनामयी भूमि जबलपुर से बह रही रामकथा के पांचवे दिन ओशो को,ओशो दिक्षीत संन्यासीओं को संतो महंतो की चेतनाओं को प्रणाम करते हुए बापु ने बताया कि कैलास आश्रम ञषिकेश जहां मेरे दादा-गुरु के संसारी भाइ,मेरे चाचा दादा संन्यास लेकर ब्रह्मलीन विद्यानंदगिरि जी ने आश्रम में १२ मुख्य उपनिषदो का अध्ययन किया करवाया उन पर विष्णुदेवानंद गिरि जी ने टीका लिखी है।।मैं जब छोटा था तो मुजे बहूत नजदीक पडते छू लेने वाले मंत्रों ऐसे निकट पडते १८ मंत्र लिखकर नोट बनाइ थी,इन में से एक मंत्र का गान किया,करवाया:
स यो ह वै तत् परमं ब्रह्मवेद ब्रह्मैव भवति
नास्या ब्रह्मवित कूले भवति तर्तिशोक
तर्तिपाप्मान गुहाग्रंथिभ्यो विमुक्तो अमृतो भवति
विष्णुदादा कहते है: जो इस ब्रह्म को जान लेता है वो ब्रह्म हो जाता है।।
जैसे राम राम रटनेवाला राम का दर्शन न कर पाये मगर कभी खुद राम बन जाता है।।राम मनुष्य के रुप में ब्रह्म है।।
रामचरित मानस सुनने की एक शर्त अरण्य कॉंड में जब लक्षमण जी ने राम से पांच प्रश्न पूछे तब राम ने समाधान देते हुए कहा था के लक्ष्मण मेरी बातों को पूरे अंतःकरण से मत सुनना,चूक जाओगे।। मेरी बातों को मन से,बुद्धि से,चित से सुने,मगर अहंकार मुक्त होकर सुन।।जो बुद्धि से पर तत्व ब्रह्म को तर्क मुक्त,बुद्धि मुक्त करके जाने।। चित् का निरोध करके नहीं चित्त को प्रबोध करके सुनना।।निरोध में थोडी आक्रमकता दिखती है। उपनिषद की ऊंचाई तक कोई पहुंच नहीं पाया।चांद,सितारे,सोम,सूर्य गौरी शंकर शिखर भी नीचे है।।मुझे अत्यंत निकट पडते ऐसे मंत्रों के नोट बना ही थी यह मंत्र का गा करवाया सच्चे दिल के आंगन में राम निराकार है और दशरथ के आंगन में हो सगुण है
जो सजर सुख गया वो हरा हो कैसे।
मैं पयगंबर तो नहि मेरा कहा हो कैसे।।
जीसे मैं जान नहि पाया उसे खुदा कहुं कैसे।
जीस को मैने जान लिया वो खुदा हो कैसे।।
अखंड ब्रहम जानने में नहीं आएगा, जितना जाने उसी पर आनंद करो।।उसका नाम,रूप या लीला या धाम जो समझ में आए उसमें आनंद करो।। ब्रह्म को जानने वाले कुल में कोई ब्रह्म को नहीं जानता ऐसा नहीं होगा।।घर में एक व्यक्ति एक दिया जलता है तो चोर प्रवेश नहीं करता।।ऐसी घटना जिसके जीवन में बनती है वहां कभी शोक नहीं रहता।।
जब मैं संगीत के बिना कथा करता था 60 साल पहले कभी छोटे गांव देवली डकाना में ओशो का आचार्य रजनीश नाम था तब मैं बातें करता था।।
लाओत्से का परिचय ओशो से हुआ और व्यास पीठने ओशो का थोड़ा परिचय दुनिया को दिया! ऐसे ब्रह्म को जानने वाले मृत्यु शोक नहीं बनता।।वह पाप से मुक्त हो जाता है।। ऐसे हृदय की गुफा में बैठकर ग्रंथि निवारण करते हैं विमुक्त होते ही वह अमृत की प्राप्ति कर लेता है।। यह मेरे दादाजी के टिप्पणी है।।
राम ब्रह्म है वैसे रामकथा भी ब्रह्म है, रामनाम भी ब्रह्म है।।रामनाम भी सुंदर है, सूजान है, सार को पकड़ लेने वाले को रामनाम कृपा निधान है, राम नाम अनाथ पर प्रीति करने वाला है।।नाम निर्वाण पद देता है।।
फिर बापू ने गुजराती दोहे और छंद पर व्यास पीठ से उतर कर नृत्य और रास किया और पूरा पंडाल बापू के नृत्य के साथ रास में झूम उठा।।इस ब्रह्म को जान लेता है वो ब्रह्म हो जाता है।।
राम राम रटनेवाला राम का दर्शन न कर पाये मगर कभी खुद राम बन जाता है।।
राम मनुष्य के रुप में ब्रह्म है।।
मेरी बातों को मन से,बुद्धि से,चित से सुने,मगर अहंकार मुक्त होकर सुने।।
चित् का निरोध करके नहीं चित्त को प्रबोध करके सुनना।।
राम ब्रह्म है वैसे रामकथा भी ब्रह्म है,रामनाम भी ब्रह्म है।।
रामनाम भी सुंदर है,सूजान है,रामनाम कृपा निधान है,रामनाम अनाथ पर प्रीति करने वाला है,नाम निर्वाण पद देता है।।
ओशो की प्रबुध्ध चेतनामयी भूमि जबलपुर से बह रही रामकथा के पांचवे दिन ओशो को,ओशो दिक्षीत संन्यासीओं को संतो महंतो की चेतनाओं को प्रणाम करते हुए बापु ने बताया कि कैलास आश्रम ञषिकेश जहां मेरे दादा-गुरु के संसारी भाइ,मेरे चाचा दादा संन्यास लेकर ब्रह्मलीन विद्यानंदगिरि जी ने आश्रम में १२ मुख्य उपनिषदो का अध्ययन किया करवाया उन पर विष्णुदेवानंद गिरि जी ने टीका लिखी है।।मैं जब छोटा था तो मुजे बहूत नजदीक पडते छू लेने वाले मंत्रों ऐसे निकट पडते १८ मंत्र लिखकर नोट बनाइ थी,इन में से एक मंत्र का गान किया,करवाया:
स यो ह वै तत् परमं ब्रह्मवेद ब्रह्मैव भवति
नास्या ब्रह्मवित कूले भवति तर्तिशोक
तर्तिपाप्मान गुहाग्रंथिभ्यो विमुक्तो अमृतो भवति
विष्णुदादा कहते है: जो इस ब्रह्म को जान लेता है वो ब्रह्म हो जाता है।।
जैसे राम राम रटनेवाला राम का दर्शन न कर पाये मगर कभी खुद राम बन जाता है।।राम मनुष्य के रुप में ब्रह्म है।।
रामचरित मानस सुनने की एक शर्त अरण्य कॉंड में जब लक्षमण जी ने राम से पांच प्रश्न पूछे तब राम ने समाधान देते हुए कहा था के लक्ष्मण मेरी बातों को पूरे अंतःकरण से मत सुनना,चूक जाओगे।। मेरी बातों को मन से,बुद्धि से,चित से सुने,मगर अहंकार मुक्त होकर सुन।।जो बुद्धि से पर तत्व ब्रह्म को तर्क मुक्त,बुद्धि मुक्त करके जाने।। चित् का निरोध करके नहीं चित्त को प्रबोध करके सुनना।।निरोध में थोडी आक्रमकता दिखती है। उपनिषद की ऊंचाई तक कोई पहुंच नहीं पाया।चांद,सितारे,सोम,सूर्य गौरी शंकर शिखर भी नीचे है।।मुझे अत्यंत निकट पडते ऐसे मंत्रों के नोट बना ही थी यह मंत्र का गा करवाया सच्चे दिल के आंगन में राम निराकार है और दशरथ के आंगन में हो सगुण है
जो सजर सुख गया वो हरा हो कैसे।
मैं पयगंबर तो नहि मेरा कहा हो कैसे।।
जीसे मैं जान नहि पाया उसे खुदा कहुं कैसे।
जीस को मैने जान लिया वो खुदा हो कैसे।।
अखंड ब्रहम जानने में नहीं आएगा, जितना जाने उसी पर आनंद करो।।उसका नाम,रूप या लीला या धाम जो समझ में आए उसमें आनंद करो।। ब्रह्म को जानने वाले कुल में कोई ब्रह्म को नहीं जानता ऐसा नहीं होगा।।घर में एक व्यक्ति एक दिया जलता है तो चोर प्रवेश नहीं करता।।ऐसी घटना जिसके जीवन में बनती है वहां कभी शोक नहीं रहता।।
जब मैं संगीत के बिना कथा करता था 60 साल पहले कभी छोटे गांव देवली डकाना में ओशो का आचार्य रजनीश नाम था तब मैं बातें करता था।।
लाओत्से का परिचय ओशो से हुआ और व्यास पीठने ओशो का थोड़ा परिचय दुनिया को दिया! ऐसे ब्रह्म को जानने वाले मृत्यु शोक नहीं बनता।।वह पाप से मुक्त हो जाता है।। ऐसे हृदय की गुफा में बैठकर ग्रंथि निवारण करते हैं विमुक्त होते ही वह अमृत की प्राप्ति कर लेता है।। यह मेरे दादाजी के टिप्पणी है।।
राम ब्रह्म है वैसे रामकथा भी ब्रह्म है, रामनाम भी ब्रह्म है।।रामनाम भी सुंदर है, सूजान है, सार को पकड़ लेने वाले को रामनाम कृपा निधान है, राम नाम अनाथ पर प्रीति करने वाला है।।नाम निर्वाण पद देता है।।
फिर बापू ने गुजराती दोहे और छंद पर व्यास पीठ से उतर कर नृत्य और रास किया और पूरा पंडाल बापू के नृत्य के साथ रास में झूम उठा।।
=============

