
हमारे लिए तो गुरु ही उपाय है।।
प्राप्ति कर्म नहीं है,ना विशेषण,न संज्ञा है,न कृदंत है,ना सर्वनाम है,यह केवल भाव दशा है।।
अध्यात्म में बिभत्स रस निंदा रस है।।
जिसको पूरे जगत को प्रेम करने की वृत्ति के सिवा कोई वृत्ति ना हो वह साधु है।।
प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष कभी भी निंदा रस जिसमें ना हो वह साधु है।।
हिंदू बिंदु भी है और सिंधु भी है।।
धनलक्ष्मी,गृहलक्ष्मी,पृथ्विलक्ष्मी,वैकुंठलक्ष्मी और शुभलक्ष्मी-ये पंचलक्ष्मी है।।
वेंकटेश लक्ष्मीपति बालाजी की परम भूमि तिरुमला से प्रवाहित रामकथा के चौथे दिन पर पूछा गया था कि गुरुवार को प्रभु वेंकटेश भगवान की आंखें खुलती है इसका मतलब बताओ!
बापू ने कहा कि यहां के पंडित और भक्त लोग इसका मतलब कह पाएंगे।लेकिन गुरुवार का मेरा मतलब है गुरुद्वार। गुरुद्वार जाने से हमारी आंखें खुल जाती है।। शरणागति केवल अधिकारी विशेषण है,उपाय तो केवल लक्ष्मी नारायण है- ऐसा वाक्य यहां के भयंकर मठ में लिखा हुआ।।
बापू ने कहा प्रकृति को विशेषण मानना उपाय नहीं माना लेकिन हम तो अधिकारी तक भी नहीं पहुंच पाते हैं! हमारे लिए तो गुरु ही उपाय है।। प्राप्ति कर्म नहीं है, ना विशेषण,न संज्ञा है। न कृदंत है, ना सर्वनाम है, यह केवल भाव दशा है।।
बैठे सोह काम रिपु कैसे।
धरे सरीर शांत रसु जैसे।।
यह पंक्ति में सभी रसों का दर्शन करवाते आखिर में शांत रस दिखाया है।।नरसिंह जिसे प्रेम रस कहे, मीरा भक्ति रस कहे,दुनिया में वह निंदा का रस है साहित्य में एक बिभत्स रस भी है।अंगद और रावण के संवाद में वह रस दिखता है।। अध्यात्म में बिभत्स रस निंदा रस है।
संतो सांकेतिक भाषा में बोलते हैं। भवभूति संकेत करते हैं कि साधु कौन है। जिसको पूरे जगत को प्रेम करने की वृत्ति के सिवा कोई वृत्ति ना हो वह साधु है।।
बांग्लादेश की दशा के बारे में बापू ने बताया कि राम कृष्ण परमहंस का जन्म स्थान कामारपुकुर की दशा तो उस वक्त बापू ने कहा हिंदू बिंदु भी है और सिंधु भी है।।विनय मधुर है वह साधु।वाणी में संयम हो वह साधु। जिसकी बुत्ति विश्व की प्रकृति को कल्याण में ही रत रखती हो वह साधु। प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष कभी भी निंदा रस जिसमें ना हो वह साधु है।। ऐसे साधु किसी को बाधा नहीं बनते।
बापू ने बताया मैं आपका आदर्श बनना नहीं चाहता यथार्थ बनना चाहता हूं।। यहां एक पंक्ति लिखी है राम रमापति- मतलब है लक्ष्मीपति है।। रमापति का एक मतलब विष्णु भी होता है। श्री का अर्थ भी लक्ष्मी हो सकता है। लक्ष्मी के पांच रूप है।एक है- धनलक्ष्मी। लेकिन धन को ही लक्ष्मी समझ लेना इतना ऊंचाई नहीं है।
बहुत परिश्रम के बाद पैसे कमाने के बाद परमार्थ के लिए बिल्कुल सरलता से सदुपयोग में आए वह लक्ष्मी है और बहुत सरलता से कमाई हुई लक्ष्मी उपयोग करते वक्त बहुत परिश्रम पड़े वह धन है। धन मिट सकता है,लक्ष्मी मिट्टी नहीं सकती। सुलक्षणा नारी मातृ रूप वह भी लक्ष्मी है।। और उसे हम गृह लक्ष्मी कहते हैं। हर मातृ स्वरूप गृह लक्ष्मी है। तीसरी पृथ्वी लक्ष्मी, देवी संपदा से हरी भरी।।चौथी बैकुंठ लक्ष्मी जो निरंतर बैकुंठ में निवास करती है, या तो क्षीर सिंधु में भी निवास करती है। पांचवी शुभ लक्ष्मी है,लाभ लक्ष्मी नहीं है संस्कार की उच्च विचार की लक्ष्मी उच्च प्रकार के सुव्रतों की लक्ष्मी यह शुभ लक्ष्मी है।। यह पाच लक्ष्मी के रूप है। किसी बुद्ध पुरुष में हर वस्तु शुभ दिखे तो वह भी शुभलक्ष्मी है।।
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