
चित्रकूट, मध्य प्रदेश। जहां-जहां श्री रघुनाथजी के चरण पड़ते हैं, वहां-वहां पवित्रता का विस्तार होता है। इसी भाव के साथ पूज्य मोरारी बापू की ऐतिहासिक और आध्यात्मिक मानस रामयात्रा का शुभारंभ चित्रकूट पर्वत की पावन भूमि से हुआ। यह बापू की 966वीं रामकथा है, जिसका प्रारंभ अरण्यकांड की पंक्तियों के साथ हुआ।
चित्रकूट के उन पर्वतों पर, जहां भरतजी ने पांच दिन तक श्रीराम से मिलन की प्रार्थना की थी, कथा की मंगल शुरुआत हुई। बापू ने इसे केवल यात्रा नहीं, बल्कि एक अंतर्मन की यात्रा कहा। उन्होंने कहा कि यह सहज यात्रा है। जैसे नदी बिना सोचे बहती है, सूर्य बिना संकल्प के उदय होता है, और वायु बिना मुहूर्त के प्रवाहित होती है, वैसे ही यह यात्रा भी सहजता का प्रतीक है।
बापू ने अपने पूर्व यात्राओं का स्मरण करते हुए कहा कि मानसरोवर, राक्षसताल, कैलास, और भूशुण्डि सरोवर जैसी कठिन यात्राओं के बाद अब यह रामयात्रा भी प्रभु और गुरु की विशेष कृपा का प्रसाद है। द्वादश ज्योतिर्लिंग यात्रा, वृज चौरासी, और अयोध्या से नंदीग्राम जैसी यात्राओं के बाद यह एक नया अध्याय है।
उन्होंने हृदय से कहा कि इस यात्रा की प्रेरणा और सहयोग उन्हें श्रीनाथजी की कृपा और श्री मदनलाल पालीवालजी के सहयोग से मिला है। बापू ने बताया कि यह बाह्य यात्रा के साथ-साथ एक आध्यात्मिक अंतर्यात्रा भी है। मन की गहराइयों में उतरने की एक साधना।
कथा के प्रारंभ में बापू ने अरण्यकांड के प्रसंगों का स्मरण कराया जहां भगवान श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण ने अत्रि ऋषि और उनकी पत्नी अनसूया के आश्रम में समय बिताया था। अत्रि, जो त्रिगुणातीत हैं, और अनसूया, जो असूया (ईर्ष्या) से रहित हैं, दोनों आदर्श गृहस्थ जीवन के प्रतीक हैं।
भगवान जानते थे कि चित्रकूट में अधिक समय तक रहने से लोगों को अब उनके अवतार कार्य का बोध होने लगा है, जिससे वहाँ भीड़ बढ़ती जा रही है। यह सोचकर प्रभु ने सभी मुनियों से विदा ली और आगे प्रस्थान किया। अरण्यकांड में तीन प्रमुख प्रसंग हैं। जयंत प्रसंग, अत्रि मुनि का अनुष्ठान, मंदाकिनी गंगा का प्राकट्य, और सीता को नारी धर्म का उपदेश। इन सभी चरित्रों का बापू ने अत्यंत विशद और भावपूर्ण रूप में गायन कर श्रोताओं को समझाया।
जब भगवान राम अपने हाथों से पुष्प चुनकर सीता के केशों में वेणी सजाते हैं, उसी समय इंद्रपुत्र जयंत काग के रूप में आकर माता सीता के चरण पर प्रहार करता है। इस पूरे प्रसंग का बापू ने विस्तार से वर्णन किया। साथ ही उन्होंने कहा, “दुर्गुण रूपी हथौड़ी सदा कीलों की खोज में रहती है, पर यदि साधना की दीवार मजबूत होगी, तो कील भी मुड़ जाएगी।”
साधु की सरल व्याख्या करते हुए बापू ने कहा कि, “सामने वाला आपको असाधु कहे, यह होने न दे वही सच्चा साधु है।”उन्होंनेयहभीकहाकिईश्वरकीकृपासेसाधुमिलसकतेहैं, परंतु साधु की कृपा से ही ईश्वर का साक्षात्कार होता है।
कथा के अंत में बापू ने सात कांडों का महत्त्व, प्रत्येक कांड के प्रमुख मंत्र, और गुरु वंदना तथा हनुमंत वंदना का सामूहिक गान किया। इसके साथ ही कथा का प्रथम दिवस संपन्न हुआ, और घोषणा की गई कि अगले दिन कथा अगस्त्य मुनि आश्रम में आगे बढ़ेगी।
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रामयात्रा का विशेष स्वरूप
यह 11-दिवसीय रामयात्रा केवल ऐतिहासिक नहीं, बल्कि गहन आध्यात्मिक अनुभव है। श्रीराम के वनवास मार्ग का अनुसरण करती यह यात्रा अत्रि मुनि आश्रम, पंचवटी, शबरी आश्रम, ऋषिमुख पर्वत, परवरशन पर्वत, रामेश्वरम, कोलंबो और अयोध्या सहित नौ प्रमुख स्थलों पर रामकथा के साथ आगे बढ़ेगी।
400 से ज़्यादा श्रद्धालु इस यात्रा में बापू के साथ 8,000 किलोमीटर की दूरी तय करेंगे। विशेष 22 कोच वाली ट्रेन के साथ-साथ कुछ यात्राएं हवाई मार्ग से होंगी।
बापू ने कहा कि यह यात्रा किसी लाभ के लिए नहीं, बल्कि जन-कल्याण और शांति की कामना के लिए है। “यहएकप्रकारकासमुद्रमंथनहैजिससेअमृतभीनिकलेगाऔरविषभी, किंतु उद्देश्य केवल शुभ का है।”
इस प्रकार, चित्रकूट से प्रारंभ हुई यह 11 दिवस की दिव्य मानस रामयात्रा केवल कथा नहीं, बल्कि सत्य, प्रेम और करुणा के माध्यम से मानवता के हृदय को जोड़ने का एक आध्यात्मिक प्रयत्न है।
दिव्य रामयात्रा के प्रति चारों ओर से उत्साह और उमंग की लहर उमड़ रही है।

