Homeगुजरातपुरुषार्थ मात्र छोड़ दो, केवल शरण में रहो।।

पुरुषार्थ मात्र छोड़ दो, केवल शरण में रहो।।

पंचश्री में चक्षुश्री,मुखश्री,कर्णश्री,वचनश्री और मनश्री समाविष्ट है।।

पुरुषार्थ और प्रारब्ध से भी नहीं मिलता केवल अनुग्रह से मिलता है।।

अपने दायरे में हो इतनी वस्तुओं का विचार करो, भाव की यह भी एक युक्ति है।।

सुख और दुख अपनी इच्छा के बिना रह नहीं सकता ऐसी बुद्धि बनाओ।।

बिना स्वीकार सुख-दुख हमें परेशान नहीं कर सकता।।

इतना महत्व सुख दुख को मत दो,हम ही सुख और दुख पर अपना सिक्का लगाते हैं।।

श्री का मतलब निर्मलता और विमलता से जुड़ा है

सप्तगिरि पर्वतमाला पर बिराजमान भगवान व्यंकटेश तिरुपति बालाजी के सांनिध्य में तिरुमला(आंध्र प्रदेश) से चल रही रामकथा के दूसरे दिन आरंभ में ही एक प्रश्न आया कि:बापू!प्रारब्ध के कारण भले अभाव कम ना हो लेकिन ऐसा क्या पुरुषार्थ करें कि हमारा भाव कम ना हो?

बापू ने कहा कि पुरुषार्थ मात्र छोड़ दो, केवल शरण में रहो।। पुरुषार्थ अहंकार को जन्म देता है और अहंकार आते ही भाव का जन्म नहीं होगा।।एक क्षण भी आदमी कर्म किए बिना रह नहीं सकता। भाव के लिए पुरुषार्थ ना करो।।शास्त्रों में युक्तियां भी बताई है,भाव बढ़ाने की युक्ति।इसमें एक युक्ति है साधु संग।। पुरुषार्थ और प्रारब्ध से भी नहीं मिलता केवल अनुग्रह से मिलता है।।

शंकराचार्य ने प्राणायाम आदि युक्ति कही है।।अपने दायरे में हो इतनी वस्तुओं का विचार करो, भाव की यह भी एक युक्ति है।।हम अपनी सीमा में ही रहे।। इसके बहुत बाहर हम सोचते रहते हैं। हम व्हाइट हाउस,राष्ट्रपति भवन,क्रेमलिन हाउस का विचार करते हैं! अपनी सीमा का विचार करो।

दूसरा हमें जितने शब्दों की जरूरत है इतने शब्दों से ही खेलो। ज्यादा नहीं।।यदि आई लव यू कहना है तो केवल लव रखो!मेरा आई और तेरा यु भी निकाल दो।।

सुख और दुख अपनी इच्छा के बिना रह नहीं सकता ऐसी बुद्धि बनाओ।। बिना स्वीकार सुख-दुख हमें परेशान नहीं कर सकता।। इतना महत्व सुख दुख को मत दो,हम ही सुख और दुख पर अपना सिक्का लगाते हैं।।गीता जी कहती हैं दोनों में सम बुद्धि रखो।।भक्ति परक शास्त्रों का स्वाध्याय करने से भाव की वृद्धि होती है।।पांडुरंग दादा ने भाव फेरी भक्ति फेरी की,जो भाव संवर्धन की यात्रा है यह भी युक्ति है।।कथा में रुचि जागेगी तो भाव संवर्धन होगा श्रीपति शब्द हमने उठाया है। यहां पंचश्री है:एक चक्षु श्री,एक वचन श्री,एक कर्ण श्री,एक मुख श्री और एक है मन श्री।श्री  का मतलब निर्मलता और विमलता से जुड़ा है।।श्री का अर्थ हम पैसा करते हैं इसमें इतनी निर्मलता नहीं,उसे धन कहो श्री मत कहो।। निर्मलता विमलता श्री से जुड़ा है। जीस मन में कपट,छल छिद्र न हो वह निर्मल मन है।।श्री ऐश्वर्य वाचक शब्द है।लेकिन वहां भी रजोगुण दिखने लगता है।।

चक्षु श्री का महत्व है निर्दोष असंग आंखें। ताजा जन्मे हुए बालक जैसी!आंख को निर्मल रखने का उपाय है:

गुरु पद रज मृदु मंजुल अंजन।

नयन अमिय द्गग दोष बिभंजन।।

कर्ण श्री- शुभ वास्तु ही सुनना वह कर्ण श्री कर्ण वैभव है।।वाच्य श्री,शब्द श्री- वहां तो बहुत ध्यान रखना पड़ता है। केवल वाक् विलास नहीं। जो बोले सो हो जाए वह वाणी का वैभव है।।

यह पांचो श्री का पति है परमात्मा इसलिए हमने श्रीपति पंक्ति उठाई है।।जो ज्ञान धाम है,असुरारी है उसे भी श्रीपति कहते हैं।।

माया के दो प्रकार कहे हैं:विद्या और अविद्या।। भक्तों के ऊपर भगवान माया का प्रयोग करते हैं तब विद्या माया का प्रयोग करते हैं जो सर्जन करती है। अविद्या माया भवकुट में अंधकार में डाल देती है।। ज्ञानदीप और भक्ति मनी के बीच का अंतर बापू ने विस्तार से बताएं।।

और कथा के प्रवाह में जाते हुए आगे सिताराम जी की वंदना के बाद एक बडा प्रकरण नाम वंदना,रामनाम वंदना का गाया गया।।रामनाम ही मंत्र भी है और स्वयं श्रीराम भी अपने नाम का पार नहि पा सकेंगे

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