Homeगुजरातअपने-अपने स्वभाव का भी ऐश्वर्या होना चाहिए।।

अपने-अपने स्वभाव का भी ऐश्वर्या होना चाहिए।।

धन का,रूप का,पद,प्रतिष्ठा का प्रभाव हमारा ऐश्वर्य बन गया है।।

किसी प्रभाव का भी एक दशक होता है।।

प्रभाव कायमी नहीं है स्वभाव शाश्वत है।

रामकथा स्वभाव पर काम करती है।

प्रभाव को कभी ऐश्वर्य मत समझना,सरलता ही हमारा ऐश्वर्य है।।

ञुष्यशृंग पर्वत और आश्रम की छांव में बह रही रामकथा पांचवे दिन में पहुंची।बापु ने यहां की बहुविध चेतनाओं को प्रणाम करते हुए कल संक्षिप्त में थोड़ा ज्यादा समय लेकर बापू ने राम जन्म करवाया था।।

आज बापू ने कहा कि श्रृंगी ऋषि के बारे में और भी प्रश्न पूछे गए हैं।श्रृंगी का एक संबंध हिरण के श्रृंग से है। हमारे यहां हिरण का शिंग और सांप की केंचुए बहुत पवित्र मानी गई है।।

जैसे अभाव का ऐश्वर्या है वैसे अपने-अपने स्वभाव का भी ऐश्वर्या होना चाहिए।।कोई कहे जाकर कि हमारा स्वभाव अच्छा नहीं तो सत्संग करके स्वभाव में सुधार हो सकता है।बाकी दुनिया की कोई ताकत हमारा स्वभाव सुधार नहीं सकती।।प्रभाव हमारा ऐश्वर्य बन गया है। धन का,रूप का,पद,प्रतिष्ठा  का प्रभाव हमारा ऐश्वर्य बन गया है।।किसी प्रभाव का भी एक दशक होता है।लेकिन प्रभाव कायमी नहीं है स्वभाव शाश्वत है। रामकथा स्वभाव पर काम करती है। प्रभाव को कभी ऐश्वर्य मत समझना,सरलता ही हमारा ऐश्वर्य है।।

गोस्वामी जी ने किस साधु कहे वेशधारी साधु की भी निंदा मत करना। कोई वेश का, वाणी का, शब्द का,स्वभाव का भी साधु है।।स्वभाव का सरल हो सबल हो फिर भी जिसकी आंखें सजल हो उसे साधु कहते हैं।

सरल सुभाउ न मन कुटीलाई

जथा लाभ संतोष सदा आई।।

बापू ने आज एक बात बताई यहां फेक वीडियो और आधुनिक टेक्नोलॉजी के जमाने में बहुत कुछ गलत वायरल होता है।।मैं इतने दिनों से यहां हूं फिर भी एक वीडियो वायरल हो रहा है जहां में किसी अस्पताल में किसी की खबर पूछ रहा हूं। किसी का समाधान करवा रहा हूं! ऐसी ऐसी बहुत बातें फैलाई जा रही है जो बिल्कुल गलत है। ऐसी गलत बातें हो सके तो झूठी खबरें वायरल मत करना।

जो सत्य से विभक्त ना हो वो भक्त है।।और सत्य परमात्मा है। प्रेम परमात्मा है। करुणा भी परमात्मा है। किसे कथा नहीं सुनाना वह भी बात की।

रामकथा के वो ही अधिकारी।

जिनके सत संगति अति प्यारी।।

श्रृंगी का मतलब एक ऐसा ऋषि जहां तप, साधना, एकांत शिखरस्त थे और ऊपर हिरण का शिंग भी लग गया।।ना ब्रह्मर्सी ना वे राजर्षि।सबसे आगे और शांता के बारे में भी विध विध अभिप्राय आए है।।

श्वेताश्वेतरोपनिषद उपनिषद के इस मंत्र जीन पर दादा विष्णुदेवानंद गिरिजी की टीका है:

समेशुचौ शर्कराविहि बहुबालुका विवर्जीते

शब्द जलाशयादिभि मनोनकुले न तो

चक्षुपीडने गुहानिवाता शपणेही प्रयोजेत

इस मंत्र में श्रृंगी का आश्रम कैसा था वह सूत्रों से हम समझे।। जहां बहुत ऊंचाई ना हो, बहुत नीचा भी ना हो। समान भूमि हो। चित् की भूमिका भी समान कही है। पवित्र भूमि हो। कंकरों से मुक्त जमीन होनी चाहिए। जहां ज्यादा बालू रेत नहीं होनी चाहिए। ज्यादा कोलाहल नहीं होना चाहिए।।निकट में पनघट नहीं होना चाहिए। मन को अनुकूलन होना चाहिए। आंख में जलन ना देती ऐसी हवा बहती हो ऐसा आश्रम कहा गया है।।

और प्रमाण भी लिखे हैं जहां सुबह-सुबह कोहरा दिखे और अर्क यानी कि सूर्य का दर्शन हो।।अनिल वायु मिले और अनल अग्नि भी मिले। और शाम को  नक्षत्र का दर्शन होने लगे। मौसम ना हो तो भी बिजली चौंध जाए।स्फटिक में उजाला दिखे। चंद्र की शीतलता आने लगे इतने रूप हमें जहां से मिले वह भूमि श्रृंगी के आश्रम की भूमि मानी जाएगी। और हर आश्रम ऐसा होना चाहिए फिर राम कथा के प्रवाह में राम जन्म के बाद अयोध्या में एक महीने तक उत्सव रहे यानी कि सूर्य एक मास का हुआ।।

नामकरण और विद्या संस्कार के बाद विश्वामित्र राम और लक्षमण को यग्यरक्षा के लिये लेने आये और रास्ते में एक ही बान से ताडका के प्राण हरी लिन्हा।।

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