Homeगुजरातप्रेम मार्ग की यात्रा शून्य से शुरू होती है।।

प्रेम मार्ग की यात्रा शून्य से शुरू होती है।।

बिना शून्य हुए बिना रिक्त हुए,बिना खाली हुए प्रेम मार्ग की यात्रा संभव नहीं है।।

प्रेम मार्ग के मार्गीओं को साधु पुरुष का साथ लेकर चलना चाहिए।।

आराम ही है राम है।।

दृढ़ आश्रय की छत्री रखो।।

गुजराती हमारा धर्म है, हिंदी हमारा अर्थ है,अंग्रेजी काम है संस्कृत हमारा मोक्ष है।।

लिटल रॉक(अमरिका) के स्टेट कन्वेशन सेन्टर आर्कान्सा के सुंदर हॉल में चल रही रामकथा का मंगलवार का चौथा दिन।आज व्यासपीठ की वंदना के लिए लिटल रोक के ७३ वें मेयर ऑफ़ अमेरिका आए।।उन्होंने यहां की लोकल इंडियन कम्युनिटी को बहुत भारी सपोर्ट किया है और अमेरिकी उच्चारण में ‘जय सियाराम’ कहा तब पूरा हॉल तालियों से गूंज उठा।। एकता और विकास के बारे में अपनी कामना के शब्द रखें।।

आज विशेष प्रसन्नता की बात थी देश के समर्थ भागवत कथाकार जिग्नेश दादा भी आए और साथ में गुजराती के युवा लेखक जय वसवाड़ा की भी उपस्थित थी।।

बहुत सी बातें जिज्ञासा के रूप में आती है। लेकिन कबीर साहब का मार्ग बडा वैश्विक मार्ग है। कोई समझ ना पाए या पूर्वग्रह से ना माने तो हम क्या जिद करें! कबीर साधक भाई बहन ने अपने प्रश्न पूछे वहीं से कथा का आरंभ करते हुए बापू ने कहा कि पूछा गया है प्रेम मार्ग के मार्गीओं की पथयात्रा कहां से आरंभ होती है?

यदि हमारा मार्ग प्रेम मार्ग है, जैसे भरत जी, तो प्रेम मार्ग की यात्रा शून्य से शुरू होती है।। बिना शून्य हुए बिना रिक्त हुए,बिना खाली हुए प्रेम मार्ग की यात्रा संभव नहीं है।। प्रेम मार्ग के पथिक जलालुद्दीन रूमी भी कहते हैं की प्रेम मार्ग की यात्रा शून्य से शुरू होती है।।

लौकिक यात्रा शून्य से नहीं होती।। हमारे पास बैग थेले पैसे सब कुछ होता है और यात्रा पूरी होती है तो सब खाली हो जाता है।। लेकिन प्रेम मार्ग की यात्रा उलटी गंगा है। जब तक हम खाली ना हो जाए। इसलिए कबीर का एक पद है:इ रे मारग मारे जोवा कबीर कहे…. कबीर ने अपनी कबीरी आंखों से देखा होगा और पाया भी होगा।।किसी भी पुरुषार्थ प्रारब्ध या अनुग्रह से जो स्थिति हमें प्राप्त हुई इसका लेश मात्र अहंकार ना हो वह शून्यता है। वहां से यात्रा शुरू होती है वह प्रेम की होती है।।

एक भाई ने दरवाजे से कहा कि आपका बहुत धन्यवाद! दरवाजे ने कहा कि किस बात पर धन्यवाद! बताया कि हमें रोशनी प्राप्त हुई। दीवार होती तो रोशनी नहीं मिलती। दरवाजे ने कहा कि यह रोशनी मेरी नहीं सूर्य की है। यह प्रेम यात्रा का कदम है।। रोशनी आपको तब मिलती है जब मैं हट गया हूं। मध्य में अपूर्ण है आखिर में पूर्णता आती है कबीर साहब ने रिक्तता, खालीपना पर बहुत बल दिया है।। प्रेम मार्ग की प्रस्थान त्रयि क्या है? आरंभ शून्य, अर्धविराम और पूर्णविराम।

रामचरितमानस के मार्ग में आदि में प्रेम मध्य में प्रेम आखिर में प्रेम दिखता है।।

कुंद इंदू सम देह उमा रमन करुणा अयन।

जाहि दीन पर नेह….

यह प्रेम है। प्रेम मार्ग के मार्गी के लिए संबल भाता कौन सा है? मानस ने जवाब दिया है: जे श्रद्धा संबल रहित… श्रद्धा का संबल।। श्रद्धा गुनातित होनी चाहिए।। राजसी, तामसी और सात्विक श्रद्धा भी ठीक नहीं।।

प्रेम मार्ग के मार्गी को किसका साथ लेना चाहिए? साधु पुरुष का साथ लेकर चलना चाहिए।। साधु के संग मुश्किल होगी।क्योंकि मीरा कहती है:

साधु संग बैठ बैठ लोक लाज खोई…. साधु के विचार साधु के स्वभाव के साथ यात्रा करनी चाहिए प्रेम मार्गियों का विश्राम कहां है? कोई विश्राम नहीं।। जैसे हमारे पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल जी ने कहा आराम हराम है। वहां हराम शब्द खटकता है।।आराम ही है राम है।। इसलिए गांधी की समाधि पर है राम है।।

एक शेर कहते हुए बापू ने कहा:

लगती नहीं है गर्मी सर्दी,

पहन के देखो मजनू की वर्दी।

खाली बर्तन बजने लगे थे।

मैंने सब में मिट्टी भर दी!

मैं तो खुद ही मरने को था।

चारागरों ने जल्दी कर दी!

इस मार्ग के मार्ग को परम विश्राम मिलता है, पूर्ण विश्राम नहीं मिलता।। प्रेम मार्गियों का लक्ष्य सिद्धि नहीं शुध्धि होना चाहिए।।प्रेम में लाभ की नहीं शुभ की गुंजाइश है। रास्ते में कोई दो राहा आ जाए तो किस मार्ग पर जाना? साधु जो राह पर मुड़े उसी राह पर चलना।। अवरोध आए तो कौन सा फानस रखना? बापू ने कहा फानुस छोड़ दो, मानस रखना भाव आवेश में कौन सी छतरी रखनी चाहिए? दृढ़ आश्रय की।।भरोसो दृढ इन चरणन केरो…

बापू ने अमेरिकी वासीओं को कहा कि कितना भी अंग्रेजी पढ़ो घर में गुजराती ही बोले।। गुजराती हमारा धर्म है। हिंदी हमारा अर्थ है। अंग्रेजी काम है संस्कृत हमारा मोक्ष है।।

अति हरि कृपा का भौतिक सूत्र समझते हुए बताया कि परमात्मा ने मनुष्य देह दिया वह कृपा है। लेकिन जिसे पथारी में लेटते ही नींद आ जाए वह अति हरि कृपा है।।

महाभारत में विदुर धृतराष्ट्र संवाद में नींद ना आने के चार कारण कहे: बड़ा बलवान शत्रु मंडरा रहा है, चोरी करने की वृति है, लौकिक अलौकिक प्यार हो गया है उसे नींद नहीं आती।।

अच्छी सी भूख लगे वह अती हरि कृपा है। जो भी कपड़े पहने अच्छे ही लगे वह अती हरि कृपा है।। जहां जाए रास्ता मिल जाए,जगह मिल जाए।। रामचरितमानस में व से शुरू होते हैं उनकी विशिष्ट महिमा है जैसे वाल्मीकि,व्यास,वशिष्ठ ,विश्वामित्र, वैदेही,विदेह राज, विभीषण आदि।।

ज्ञान मार्ग भक्ति मार्ग कर्म मार्ग में विघ्न है। हमारे गुजरात के फूलछाब अखबार में जयदेव भाई मांकड मार्गी का मार्ग कोलम भी लिखते हैं।।

अध्यात्म यात्रा में पांच काल विघ्न करते हैं। जिनमें व्यवहार काल, हर्ष काल, शोक काल, विपत्ति काल और विदाई काल है। स्वामी सच्चिदानंद जी का यह सूत्र है।।

कथा के चार घाट का रूपक समजा कर भारद्वाज के आश्रम में माघ महीने में कल्पवास के लिए कुंभ लगा। वहां प्रयाग में यज्ञ बल्कय नाम के मुनि आए और जब जाने की बेला आई भारद्वाज ने पैर पकड़ लिए और पूछा कि एक बड़ा संशय है कि राम कौन है?जिन्हें अविनाशी शिव भी संतत जाप करते हैं? और वहां से राम कथा से पहले शिव कथा का आरंभ होता है।।

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