
हनुमान जी में सोलह रस है।।
भागवत ग्रंथब्रह्म है।।
जितनी मात्रा में विचारों का प्रदूषण फैल रहा है उतनी मात्रा में विवेक नहीं आ रहा है।।
गुरु प्रसाद के लिए गुरुद्वार जाना पड़ेगा,यह हाट पर बिकता नहीं।।
भारत का शीश गौरव से उन्मत कर दे ऐसी पलों का साक्षी अमेरिका में बोस्टन स्थित हार्वर्ड युनिवर्सिटी का ओडीयन्स है जहां रामकथा धारा के चौथे दिन मंगलवार को बहुश्रृत विद्वान वक्ताओं के प्रवचनों की शृंखला में डॉ.अश्विन कुमार राजगोर ने अपना भाव व्यक्त किया।।
अश्विन कुमार कृष्ण शंकर दादा जी के कृपापात्र रहे है जिन्होंने अध्ययन अध्यापन के लिए ३३ साल भागवत विद्यापीठ-सोला में बिताए।। वेद अध्ययन के लिए बापू के हस्तों सम्मानित हुए हैं और हमारे पूर्व प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई के हाथों से अवार्ड भी प्राप्त किया है।।सात ग्रंथ भी प्रकाशित हुए हैं।
आज अश्विन कुमार ने बापू शब्द का मतलब समझाया। मां और पिता दोनों का वात्सल्य देने वाले बापू है ऐसा बताया।श्रीमद् भागवत के तीसरे स्कंद में २१-२२-२३ श्लोक में गृहस्थाश्रम के बारे में जहां देवहूति और कदर्म ऋषि का संवाद है।। देव को आहुति करें वह देवहूति।। चार आश्रम की बात हुई है।लेकिन गृहस्थाश्रम को धन्य कहा है क्योंकि वानप्रस्थाश्रम में भी हम सेवा ही करते हैं।सेवा के लिए गृहस्थाश्रम श्रेष्ठ कहा है। गृहस्थ की सर्वोपरिता वाल्मीकि रामायण में बताई गई है।यह दोनों की दांपत्य उपासना साधना से भगवान आए और नव कन्या रूपी नवधा भक्ति आई।।कदर्म रिषी के तप से सिद्धियां पाई,देवहूति ने सेवा वृत्ति से सिद्धियां प्राप्त की।।जब तक साधु की सेवा नहीं तब तक गृहस्थाश्रम दिव्य नहीं बनता।। गृहस्थाश्रम का महिमा गान किया गया।।
बापू ने बताया कि एक धर्मगुरु के नाम से जुड़ा विश्वविद्यालय में एक सद्गुरु रूपी ग्रंथ लेकर
तलगाजरडा आया है।
सद्गुरु ज्ञान बिराग जोग के।
बिबूध बैद भव भीम रोग के।।
सद्गुरु रूपी सदग्रंथ रामचरितमानस लेकर हम बैठे हैं।सभी आचार्यों को नमन करते हुए बापू ने कहा कि बहुत सी जिज्ञासाएं आई है।आप सवाल करते हैं मैं संवाद करता हूं।।
एक सवाल था:घर में,घट में,परिवार और समाज में शांति नहीं है।यह सब का प्रश्न है।।बापू ने कहा एक छोटा सा सूत्र है:हमारे घर से दो वस्तु निकल जाए तो शांति कायम निवास करेगी। यह है:राग और द्वेष। तुलसी जी ने वैराग्य सांदिपनी और बर्वे रामायण में इसका उत्तर लिखा है।जहां लिखा है:
सोई पंडित सोई पारखी सोई संत सुजान।
सोई सूर सचित सोइ सुभट्ट प्रमान।।
सोई ज्ञानी सोई गुणि जन सोई दाता ध्यानी।
तुलसी जा के चित भई राग द्वेष की हानि।।
जिनके चित्त से राग द्वेष मिट जाए वही पंडित, विद्वान,पूज्य,प्रणाम करने योग्य,शूरवीर,सचेत और सुभट्ट है।।
राग द्वेष की अगिनी बुझानी।
काम क्रोध वासना नसानी।
तुलसी जब शांति ग्रह आई।
तब उरहीउर फिरी दुहाई।।
राग द्वेष को दूर करें या गुरु प्रसाद पाए तो हमारे घर शांति मिलती है।।
दूसरा प्रश्न यह है कि कृष्ण भगवान की सोलह कला तो राम की कितनी?शंकर की,हनुमान जी की कितनी कला है?शंकर सकल कलागुणधाम है।।राम भी पूर्णावतार है।।हनुमान जी में सोलह रस है। हनुमान चालीसा पर १० कथा हुई,एक बाकी है,जब करेंगे तब यह प्रवाह चलेगा।।कला अरसिक भी हो सकती है।।साहित्य के नव रस और भोजन के छ रस में से एक मधुर रस मिलाकर दस रस हुए।। बाकी के छह रस में एक-मौनरस है।।साधना के बाद मिलता फल है-मौन जो एक रस है।।तुलसी ने विवेक विचार शब्द प्रतिपादित किया है वह बात भी बापू ने बताई।विचार अलंकार-श्रृंगार है।मगर श्रृंगार कहां पहनना है वह विवेक होना चाहिए।
अक्षर ब्रह्म,शब्द ब्रह्म,पद भी ब्रह्म और छंद भी ब्रह्म है।रस भी ब्रह्म है।सदग्रंथ भी ब्रह्म है।भागवत ग्रंथब्रह्म है।। जितनी मात्रा में विचारों का प्रदूषण फैल रहा है उतनी मात्रा में विवेक नहीं आ रहा है।क्यों? बिनु सत्संग बिबेक न होही।
और एक रस कथारस- जो हनुमान जी में दिखता है एक रस-सेवा रस।फिर सख्य रस,नृत्य रस और वात्सल्य रस मिलाकर हनुमान जी में सोलह रस है। बापू ने कहा की शंकराचार्य जी,तुकाराम जी,नानक, मीरा,नरसिंह मेहता सबसे प्रसाद पाकर गुरु प्रसादाष्टक बनाया है।गुरु प्रसाद के लिए गुरुद्वार जाना पड़ेगा,यह हाट पर बिकता नहीं।गुरुद्वार से गुरु प्रसाद में शिक्षा,ज्ञान की दीक्षा मिलती है।गुरु प्रतीक्षा करवाता है,समीक्षा भी होती है और फिर परीक्षा होती है।।

