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भागवती कथा की परम भूमि शुक्रताल से कथा ने लिया विराम,अगली-९७८ वीं रामकथा किल्लारी(महाराष्ट्र) से २३ मे से गुंजेगी।।

*फूल को फॉलो करना है तो मूल को फॉलो करना चाहिए।।*

*परमात्मा कृपा करें इसका एकमात्र फल है हमारी सभी इच्छा खत्म हो जाए।।*

*प्रेमपात्र केवल परमात्मा या अपने बुद्धपुरुष को बनाओ।।*

*संसार में यथा विनिमय विनियोग करना है तो स्विकार करना सीखो,जितना स्विकार करो उसमें संतुष्ट रहो और हो सके तो संसार में रहकर एकांत में रहो।।*

*बहुत लोगों से मिलने से राग-द्वेष बढ़ेगा ।।*

*हर एक दोष हमने निर्मित किए हैं।*

*दोष के जितने खिलौने हैं इसके क्रिएटर हम हैं,और उसका रॉ-मटेरियल मोह है।।*

*मधर्स-डे पर सब को शुभेच्छा दी गइ।।*

 

*सुक सनकादि भगत मुनि नारद।*

*जे मुनिबर बिग्यान बिसारद।।*

*-बालकॉंड दोहा-१७,चौपाई-५*

*सुक सनकादि सिध्ध मुनि जोगी।*

*नाम प्रसाद ब्रह्मसुख भोगी।।*

*-बालकॉंड दोहा-२५,चौपाइ-२*

*पूंछिहुं रामकथा अति पावनि।*

*सुक सनकादि संभु मन भावनि।।*

*-उत्तरकॉंड दोहा-१२२,चौपाइ-५*

इन बीज पंक्तियों का गायन करते हुए परम पावनी अवधूत शिरोमणि की भूमि से रामकथा के समापन विराम के दिन उपसंहारक संवाद करते हुए बापु ने

आरंभ में बताया कि आज मातृदिन-मदर्स डे है।हम कितने भाग्यवान है नव दिन पांच माता की गोद में थे।।गंगा माता,कथा माता:

*जिन के श्रवण समुद्र समाना।*

*कथा तुम्हारी सुभग सरि नाना।।*

तीसरी भागवती गंगा माता,चौथी परीक्षित की वाणी माता और पांचवी हमारी भारत माता।।

शुकदेव जन्म से मौन है।।फूल को फॉलो करना है तो मूल को फॉलो करना चाहिए।।सत्य,प्रेम और करुणा को फॉलो करना।।प्रत्येक फूल को तीन पीड़ा होनी चाहिए:एक-मैं समझ में कोई काम में आया कि नहीं?दो-मेरे प्रेमपात्र को सही में मैंने प्रेम दिया कि नहीं,केवल मेरा हेतु सधा या मेरा मनोरथ ही पूरा किया! और तीसरी पीड़ा-परमात्मा ने मुझे मनुष्य बनाया और खुद को जान नहीं पाया? मैं कौन हूं वह जान नहीं पाया इसकी भी हमें पीड़ा होनी चाहिए।।

परमात्मा कृपा करें इसका एकमात्र फल है हमारी सभी इच्छा खत्म हो जाए।।शास्त्रों के आधार पर साध्वीय प्रमाण केवट पर कृपा नहीं कृपा सिंधु,कृपा का समुद्र उडेर दिया।।कृपा के परम सिक्के को हम गलत अर्थ में खत्म कर देते हैं।।

प्रेमपात्र केवल परमात्मा या अपने बुद्धपुरुष को बनाओ।।संसार में यथा विनिमय विनियोग करना है तो स्विकार करना सीखो,जितना स्विकार करो उसमें संतुष्ट रहो और हो सके तो संसार में रहकर एकांत में रहो।।बहुत लोगों से मिलने से राग-द्वेष बढ़ेगा ।।हर एक दोष हमने निर्मित किए हैं।दोष के जितने खिलौने हैं इसके क्रिएटर हम हैं,और उसका रो मटेरियल मोह है।।

सही विषारद वह है वि के बाद जिनके पास शारद है शारद का मतलब विवेक,विनय और शील।।

मदर्स डे पर गंगा से लेकर अमृत मॉं तक ले जाता ये मुण्डकोपनिषद का मंत्र,मातृदेवो भव कह के कहा।

मंत्र,श्लोक ये है:

*यथा नद्यः स्यन्दमानाः समुद्रेऽस्तं*

*गच्छन्ति नामरूपे विहाय।*

*तथा विद्वान् नामरूपाद्विमुक्तः*

*परात्परं पुरुषमुपैति दिव्यम्॥*

*-मुण्डकोपनिषद् ३.२.८*

*स यो ह वै तत् परमं ब्रह्म वेद,ब्रह्मैव भवति।*

*नास्याब्रह्मवित्कुले भवति।*

*तरति शोकं,तरति पाप्मानं,गुहाग्रन्थिभ्यो* *विमुक्तोऽमृतो भवति॥*

*-मुण्डकोपनिषद् ३.२.९*

(यथा नद्यः स्यन्दमानाः (जैसे बहती हुई नदियां): जिस प्रकार नदियां अपने प्रवाह में आगे बढ़ती हैं।समुद्रेऽस्तं गच्छन्ति (समुद्र में विलीन हो जाती हैं): समुद्र में मिलकर अपना अस्तित्व खो देती हैं।नामरूपे विहाय (नाम और रूप त्यागकर):गंगा, यमुना जैसी पहचान त्यागकर सिर्फ समुद्र बन जाती हैं।तथा विद्वान् (वैसे ही ज्ञानी):इसी प्रकार, आत्मज्ञान प्राप्त किया हुआ व्यक्ति।नामरूपाद्विमुक्तः(नाम-रूप से मुक्त होकर): अहंकार,शरीर,इन्द्रिय और दुनियावी पहचान से मुक्त होकर।परात्परं पुरुषमुपैति दिव्यम् (परमपुरुष दिव्य को प्राप्त होता है):सर्वोच्च,दिव्य ब्रह्म में विलीन होकर मोक्ष प्राप्त करता है।

सरल अर्थ:जिस प्रकार बहती हुई नदियाँ अपने नाम और रूप (पहचान) को छोड़कर समुद्र में समा जाती हैं,उसी प्रकार परमात्मा को जानने वाला ज्ञानी पुरुष नाम और रूप से मुक्त होकर परम ब्रह्म में विलीन हो जाता है।यह मोक्ष की स्थिति का वर्णन करता है।)

साधु के घर का तोता राम-राम बोलेगा और असाधु के घर का सूडा गिन-गिन के गालियां देता है। जिनके गले में गुरु के नाम का काला धागा(माला) है वो राम-राम बोलेगा।।

कथा प्रवाह में राम-रावण के युद्ध के बाद सीता जी को लेकर अयोध्या में भगवान राम के ललाट पर राजतिलक किया गया।।चारों घाट पर कथा विराम हुई। रामचरितमानस का सार सत्य,प्रेम और करुणा का गान करके तुलसी जी का आत्म निवेदन-पायो परम विश्राम-कह कर पूरे आयोजन पर बापू ने अपनी प्रसन्नता व्यक्त की।।

तीर्थ की परिभाषा के चार रूप नव(नया) या नव तीर्थ की परिभाषा करते हुए कहा:

१-जहां सरिता हो,सरोवर या जलाशय हो।।२-जहां सनातन धर्म के कोई देवी देवता का मंदिर हो।३-वन वृक्ष,पेड़ पौधे हो।४-जहां पर्वत हो।५-जहां स्वच्छता और भीतरी पवित्रता हो।।६-जहां शास्त्र का अध्ययन हो रहा हो।भजनानंदी साधु रहता हो।७- जहां साधना ज्यादा होती हो।८-सिद्धि और शुद्धि भी हो।९-जो रोज निति-नूतन हो।।

ऐसे की एक शुकतीर्थ को इस कथा का सु-फल अर्पण करके कथा को विराम दिया गया।।

अगली,क्रम में ९७८ वीं रामकथा अधिक मास में किल्लारी(लातुर से ४४ किमी) महाराष्ट्र से प्रवाहित होगी।।

ये कथा विशिष्ट युं है की लातुर में जब भूकंप आया था तब बापु की कथा ने ये भूमि को संवारा था।।तलगाजरडा में बापु सेवित राम,लखन जानकी जी की खडी़ मूर्तियां थी वो बापु के द्वारा किल्लारी राम मंदिर को अर्पित की गइ थी।।

फिर आज की बैठी मूर्तियां तलगाजरडा में स्थापित हूइ।।

बापु का पारिवारिक रिश्ता भी लातूर से जूडा़ हुआ है।।

३३ साल बाद बापु फिर यहां पधार रहे है।।

ये रामकथा का जीवंत प्रसारण आस्था टीवी चैनल और चित्रकूटधाम तलगाजरडा यु-ट्युब चैनल के माध्यम से २३ से ३१ मे के दरमियान अपने नियत नियमित समय पर होगा।।

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