
शबरी आश्रम, कर्नाटक: कर्नाटक के पवित्र शबरी आश्रम में पूज्य मोरारी बापू की ऐतिहासिक रामयात्रा का चौथा दिवस भक्ति, श्रद्धा और आत्मचिंतन से ओतप्रोत रहा। बापू ने माँ शबरी की पवित्र धरती को प्रणाम करते हुए कहा कि शबरी माता धैर्य, प्रतीक्षा और गुरु-वचन के प्रति अटूट आस्था की प्रतीक हैं। उन्होंने कहा कि शबरी की विनम्रता और प्रतीक्षा हमें यह सिखाती है कि सच्ची भक्ति किसी रूप, जाति या स्थिति की मोहताज नहीं है, वह हृदय की पवित्रता से जन्म लेती है।
पूज्य बापू ने रामचरितमानस के उस भाव का उल्लेख करते हुए कहा कि जहाँ भी “स”या“श”सेप्रारंभहोनेवालेनामआतेहैं, वहाँ माता स्वरूपा शक्ति का संचार सक्रिय होता है। बापू ने कहा, “संग सती जगजननी भवानी, पूजे ऋषि अखिलेश्वर जानी।”जगजननीभवानीकाकन्यारूप, सती स्वरूप, रामचरितमानस के आरंभिक प्रसंगों में प्रकट होता है।
बापू ने कहा कि इस मातृ शक्ति से हमें एक गहन शिक्षा मिलती है कि केवल बुद्धि पर्याप्त नहीं है। “केवलबुद्धिभौतिकविकासदेसकतीहै, परंतु आध्यात्मिकता में मनुष्य को असफल कर देती है।”
बापू ने आदि शंकराचार्य जी का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्होंने उत्तर, दक्षिण, पूर्व और पश्चिम, इन चारों दिशाओं में पीठों की स्थापना कर राष्ट्र को एक सूत्र में पिरोया। उसी प्रकार, आज रेलमार्गों ने भी भारत की एकता को सशक्त बनाया है। बापू ने मुस्कुराते हुए कहा, “रेलवे भी राष्ट्र को जोड़ने का कार्य कर रही है।”
अपने प्रवचन में बापू ने माँ शबरी और भगवान श्रीराम के दिव्य मिलन का मार्मिक वर्णन किया। बापू ने कहा कि शबरी माता धैर्य और प्रतीक्षा की प्रतीक हैं। उन्होंने गुरु के वचनों के प्रति अटूट भक्ति और आज्ञा के प्रति अपार श्रद्धा दिखाई। मातंग ऋषि ने उन्हें कहा था कि तुम्हें अयोध्या जाने की आवश्यकता नहीं है; श्रीराम स्वयं यहाँ आएंगे। माँ शबरी ने अपने गुरु के वचन को जीवन का सत्य मानकर प्रतीक्षा की और वही श्रद्धा उन्हें श्रीराम तक ले गई। बापू ने बताया कि जब राम शबरी कुटी में पहुँचे, तो माँ शबरी ने पहले गुरु के चरण देखे जो गुरु-कृपा का चमत्कार था।
बापू ने कहा कि शबरी ने श्रीराम को उसी प्रकार देखा, जैसे माता कौशल्या ने देखा था। कौशल्या की विनम्रता और भावनाएँ माँ शबरी में प्रतिबिंबित होती हैं। शबरी स्वयं को एक निम्न जाति की, अल्पबुद्धि, संस्कारहीन और मूर्ख स्त्री मानती थीं, परंतु उनका प्रेम और भक्ति उन्हें महान बनाते हैं।
आज की कथा में बापू ने नवधा भक्ति के नौ स्वरूपों का भी सुंदर रूप से विवेचन किया। पहला, संतों का संग अर्थात आत्मसाक्षात्कार, दूसरा, भगवान की कथा और प्रसंगों का मनन, तीसरा, गुरु के चरणों की सेवा कर अहंकार का त्याग, चौथा, दंभ छोड़कर भगवान के गुणों का गुणगान, पांचवा, दृढ़ श्रद्धा से मंत्रों का जप, छठा, उत्तम स्वभाव और चरित्र का पालन, सातवां, संतों को स्वयं से श्रेष्ठ मानना, आठवां, जो कुछ मिले उसमें संतोष रखना और स्वप्न में भी दूसरों के दोष न देखना, और नौवां, सरलता और सभी के प्रति कपटरहित व्यवहार रखना। पूज्य बापू ने कहा कि इन नौ रूपों में भक्ति का सम्पूर्ण सार निहित है, जो साधक को ईश्वर के साक्षात्कार की ओर ले जाता है।
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25 अक्टूबर को चित्रकूट के अत्रि मुनि आश्रम से प्रारंभ हुई यह ऐतिहासिक रामयात्रारामेश्वरम्, कोलंबो और अन्य स्थानों पर जाएगी और अंततः 4 नवम्बर को अयोध्या में सम्पन्न होगी। यह केवल यात्रा नहीं, बल्कि सनातन धर्म की महिमा, भारतीय एकता और रामराज्य के अमर संदेश का उत्सव है। इस 11-दिवसीय यात्रा में पूज्य मोरारी बापू और उनके साथ लगभग 411 श्रद्धालु 8,000 किलोमीटर की दूरी तय कर रहे हैं। यात्रा के लिए 22 कोच की विशेष ट्रेन की व्यवस्था की गई है, जबकि रामेश्वरम् से कोलंबो और अयोध्या की यात्रा वायु मार्ग से होगी। इस सत्य, प्रेम और करुणा की यात्रा में यात्रा, निवास और भोजन सेवा और प्रसाद के रूप में प्रदान किये जा रहे हैं, ताकि हर कोई जुड़ सके और प्रभु स्मरण में सहभागी बन सके।

