
- कथा चित्त का विरोध करके भी मत सुनिये।।
- चित्तवृत्ति को अनुरोध करें कि तुं कथा सुन!
- पादरी-साधु के नाम की युनिवर्सिटी में मार्गी साधु की कथा होनी ही चाहिए,यह नियति है।।
- ज्ञान का मार्ग धारा मार्ग है,कर्म का मार्ग धोरी मार्ग है और भक्ति का मार्ग धीरज-धीर मार्ग है।।
- परम गुरु का प्रसाद हमें सब कुछ देता है-जानना और पाना दोनों प्रदान करता है।।
विश्व विख्यात हार्वर्ड यूनिवर्सिटी बोस्टन के आंगन में चल रही रामकथा के दूसरे दिन लंडन से आए हुए एक युवक ने पूछा था की कथा कैसे सुननी चाहिए? वहां से कथा का आरंभ करते हुए बापू ने कहा: कथा चित्त का निरोध करके मत सुनिए।चित्त का निरोध करके योग हो सकता है।कथा चित्रवृत्ति का विरोध करके भी मत सुनिएगा। गोस्वामी जी ने कहा है साधक का चित्त चित्रकूट है। चित्त को हटा देंगे तो अहंकार ही बचेगा।। मेरा काम आप तक पहुंचना है चित्त वृत्ति को अनुरोध करें कि तुं कथा सुन! कथा मन को बोध देती है बुद्धि को अव्यभिचारिणी बनाती है।। चित्त सबसे ज्यादा बडा रिसीवर है,बहुत संग्रह करता है।।
रामचरितमानस में प्रसाद शब्द आया वह पूरा स्वाध्याय भी सार्थक करते हुए बापू ने कहा कि राम प्रसाद,शिव प्रसाद,हरि प्रसाद,इश प्रसाद,मम प्रसाद शंभू प्रसाद,मुनी प्रसाद,गुरु प्रसाद तीन बार,मात प्रसाद,प्रभु प्रसाद,तव प्रसाद-कुल मिलाकर ३३-३४ बार प्रसाद शब्द आया है।।
ऐसा कौन गुरु जिसके प्रसाद से सब जानने में आ जाता है? गुरु प्रसाद से सब जानकारी आ जाती है और सभी विद्या पाई जाती है।।जानना और पाना अलग बात है।।
यह विश्वविद्यालय की स्थापना जॉन हार्वर्ड नाम के पादरी यानी कि साधु ने की है। पादरी साधु के नाम की युनिवर्सिटी में मार्गी साधु की कथा होनी ही चाहिए,यह नियति है।।
गुरुओं की यादि में गुरु सप्तक बताते हुए बापू ने कहा:एक है-धर्म गुरु। सत्य जहां से मिले स्वीकार करना चाहिए,हम स्वीकार नहीं कर पाए क्योंकि खिड़कियां बंद रखी है। हम ज्यादातर धर्म का पूजन करते हैं,सेवन नहीं करते।।दूसरा है वर्म गुरु।। वर्म का मतलब है-रक्षक।।
कवच अभेद बिप्र गुरु पूजा।
एहि सम बिजय उपाय न दूजा।।
ओशो को सुमित्रानंदन पंत जी ने १२ महानुभावों के नाम की यादि देकर प्रश्न पूछा था कि इनमें आपके लिए कौन महद है।।फिर कहा इनमें से चार निकाल दीजिए।ऐसा करते-करते निकालते गए।ओशो ने राम को भी निकाल दिए! राम को क्यों निकाला? ओशो ने कहा कि राम की कोई मौलिक देन नहीं है। कृष्ण की मौलिक देन भगवद गीता है।।लेकिन मुझे कहना है राम की मौलिक देन धर्मरथ है।।
एक गुरु नर्म गुरु है।नर्म का मतलब है-आनंद।नर्म दे वही नर्मद है।।इसी जीवन में आठों प्रहर आनंद करना हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है।।तीसरा गुरु कर्म गुरु।हमें काम में जोड़ दे।।ज्ञान का मार्ग धारा मार्ग है,कर्म का मार्ग धोरी मार्ग है और भक्ति का मार्ग धीरज-धीर मार्ग है।। पांचवा मर्म गुरु है, शास्त्र का मर्म समझा दे,रहस्य खोलते हैं।।और एक है चर्म गुरु।।देहवादी गुरु,विदेहवादी नहीं।।एक है शर्म गुरु- संकोची होते हैं,आश्रित भूल करें फिर भी डांटता नहीं है।और सबसे ऊपर है एक परम गुरु।।परम गुरु का प्रसाद हमें सब कुछ देता है।।जानना और पाना दोनों प्रदान करता है।।
चित्रकूट में भरत जी और राम दोनों भाई में परम प्रेम है।। राम कहे तुं जो कहे तो मैं पिता की आज्ञा छोड़ दूं।भरत कहता है आपका मन प्रसन्न हो ऐसा करो।। बीज पंक्ति का पूर्वापार संबंध दिखाते हुए बापू ने कहा तब राम कहते हैं:तुं वन में रहे और मैं घर में रहूं फिर भी हमारा रक्षक कोई गुरु है। हमारी रक्षा गुरु करता है।।
फिर कथा क्रम में वंदना प्रकरण के बाद लीला क्षेत्र में जो दो है वैसे एक ही है,अभिन्न है वो सीताराम जी की वंदना में पहले सीता जी की वंदना की।।फिर नाम वंदना का बड़ा प्रकरण ७२ पंक्ति और नव दोहों में नाम महाराज का महिमा गान हुआ है।।
सतयुग का स्वभाव है-ध्यान प्रधान।त्रेता युग यज्ञ प्रधान है।द्वापर युग में सेवा और पूजा प्रधान है लेकिन कलयुग में ज्ञान,यज्ञ,सेवा पूजा सुलभ नहीं है कलयुग में केवल नाम से सब कुछ मिलता है।।राम महामंत्र है लेकिन आपका स्वाभाविक भाव जिसमें है वह नाम बोलो।।ऐसे महामंत्र की वंदना का गान करके आज की कथा को विराम दिया गया।।
कथा के आरंभ में वैष्णवाचार्य यदुनाथ गोस्वामी जी का एक वक्तव्य हुआ।।यदुनाथ जी ने अलग-अलग अमृत कहां है वह बात बताते हुए कथा अमृत मोरारी बापू जैसे वक्ताओं से मिलता है वह बात बताई।।
इसी श्रृंखला में कल सुबह कथा से पहले भागवताचार्य और गीता उपासक भुपेन्द्र भाई पंड्या जी का वक्तव्य रहेगा।।
आज से-१६ अगस्त से २२ अगस्त तक शाम को विशेष उपक्रम होंगे और विशेष संगोष्टियां यहां के स्थानिक समय शाम ५:३० से ७:३० तक होंगे।।
यह तीन दिन हार्वर्ड यूनिवर्सिटी और अमेरिका की और यूनिवर्सिटियों के अकादमिक टॉक होंगे।।
१९ तारीख को विशेष आनंददायक दिन है।।जहां तुलसी जन्मोत्सव में बापू के शुद्ध और शुभ हस्तों से अवार्ड प्रदान किए जाएंगे।।
वाल्मीकि अवार्ड सेल्क साधरलैंड गोल्डमैन और प्रोफेसर रॉबर्ट पी गोल्डमैन और प्रोफेसर मडुओका फुकुओका-जापान को वाल्मीकि अवार्ड प्रदान होगा तीन व्यास एवोर्ड में एक देवी चित्रलेखा जी-वृंदावन धाम,दूसरा डॉक्टर अश्विनभाई कांतिभाई राजगोर- अमेरिका और तीसरा प्रोफेसर जॉन स्कैटर्ड हाउली- अमेरिका को दिए जाएंगे।।
दो तुलसी एवोर्ड प्रदान होंगे जिनमें एक पीयुषभाई मेहता-युके और दूसरा प्रोफेसर रुपर्ट स्नेइल-ग्रीक को प्रदान होगा।।रत्नावली अवार्ड प्रोफेसर डायेना जी-हार्वर्ड युनिवर्सिटी-बोस्टन को प्रदान किया जाएगा।।
तीन दिन १६ से १८ अगस्त तक विदेश में बसे स्कॉलर्स अपनी बात रखेंगे।।और २०-२१-२२ अगस्त को भारत के कथा गायकों और विद्वानों जीवनदर्शी अध्यात्म केंद्रीय दर्शन पेश करेंगे।।

