हम नर से नरोत्तम और नरोत्तम से नारायण बन सकते हैं,यदि सात मर्यादा का पालन करेंगे तो।।
मेरे से रहा नहीं जाता इसलिए मैं कथा करता हूं।। हो सके तो यहां हार्वर्ड में अगली कथा का प्रयत्न चल रहा है।।
मानस हमारा पालक है।।
मैं भी पालक बनुं,शोषक न बानुं यह कोशिश कर रहा हूं।।
हम कुछ छिपाते हैं वह कपट है।
हमारे में नहीं वह दिखाते हैं वह दंभ है और जो दोनों खेल करवाती है वह माया है।।
निर्गुण में ब्रह्मानंद है और सगुण में परमानंद मिलता है।।
बड़े लोगों का डर भी निडर बनाता हैं यह जल्दी ना समझ में आए ऐसा अद्भुत सूत्र है।।
दक्षिण अमरीकी आर्कान्सा के नयन रम्य लिटलरॉक से प्रवाहित रामकथा का सांतवा दिन।।
रोज की तरह नरेशभाइ ने कल की कथा का अंग्रेजी सार संवाद सुनाया।।हररोज छोटी बडी अनेक जिग्यासायें को अपने कथा संवाद में पिरोते हुए बापु ने आरंभ में गुजराती के हास्य कलाकार जगदीश भाई त्रिवेदी की भी उपस्थित रही।।आज अमेरिका का स्वतंत्र दिन 4जुलाई।।बापू ने कहा कि आप सभी को,यहां की जनता को, मिस्टर प्रेसिडेंट ट्रंप साहब को सबको बहुत-बहुत बधाई हो।।
पूछा गया था कि हमारे लिए कौन सा मार्ग आप बताएंगे?बापू ने कहा कि मुझे कोई मार्ग नहीं दिखाना,लेकिन मुझे एक ही बात कहती है सात कुमारग से बच जाना वहीं मार्गीपना है।। और वेदव्यास ने वह सात कुमारग दिखाए हैं।। यह जीव साधक हम सात मर्यादा का उल्लंघन न करें तो हम मार्गी है,सही मार्गी है,राही है,पथिक है, यात्री है।। धीरे-धीरे सात वस्तु छोड़ते जाएंगे फिर जहां चले वहां मार्ग ही मार्ग है।।
पहला है-द्युत-जुहा: पूरा महाभारत मद्य और द्युत के कारण महासंघर्ष के गर्त में चला गया।। आप कसीनों खेलते हैं मैं कोई प्रतिबंध लगाने नहीं आया हूं।। हम नर से नरोत्तम और नरोत्तम से नारायण बन सकते हैं। यदि सात मर्यादा का पालन करेंगे तो सरस्वती और व्यास कृपा भी हमारे पर उतरेगी।। जीवन की मंजिल तब सिद्ध होगी।।
दूसरा- शराब: नशीली चीजों का सेवन न करें।।मेरे कहने से आप बंद करने वाले भी नहीं। लेकिन धीरे-धीरे कम करें।। मैं कोई अच्छी पिला दुं(रामकथा) तो आपकी यह वस्तु छूट जाए।।मानस से अच्छा कौन है? हर कथा से मुझे पूरा संतोष होता है और मनोरथियों भी तुरंत अगली कथा मांगते हैं उन्हें भी संतोष होता है।। मेरे से रहा नहीं जाता इसलिए मैं कथा करता हूं।। और हो सके तो यहां हार्वर्ड में अगली कथा का प्रयत्न चल रहा है।।
सामने हो तो इशारा करो।
चला जाए तो पुकारा करो।।
जगत में प्रत्येक व्यक्ति की खुशियां और गम भिन्न-भिन्न है।। बिल्कुल करीब होने पर भी न समझ सके तो वह अंधा है या तो अंधेरे में है।। मानस हमारा पालक है।।मैं भी पालक बनुं,शोषक न बानुं यह कोशिश कर रहा हूं।। हमें कपट दंभ और माया परेशान करते है।।
हम कुछ छिपाते हैं वह कपट है। हमारे में नहीं वह दिखाते हैं वह दंभ है और जो दोनों खेल करवाती है वह माया है।।
जिनके कपट दंभ नहीं माया।
तिनके हृदय बसहूंरघुराया।।
जिनको याद करके हम रो सके वह हमारा पलक है वह रोना भी प्रसन्नता ही है।।नेटवर्क करते हैं वह भी जुआ ही है।।
तीसरा है:शिकार- शिकार का व्यापक अर्थ हैवहत्या।। शिकार केवल शस्त्रों से ही नहीं, वाणी से भी होता है। मानसिक मलीनता से भी होता है। आंखों से भी होता है।।सौंदर्य, प्रतिष्ठा, संपत्ति का शिकार भी हम करते हैं।।किसीकातेजोवध करना किसी के चरित्र का हनन करना, किसी के प्रतिष्ठा तोड़ने की चाल करना भी शिकार है।।
-चौथा अकारण संघर्ष: संघर्ष ऊर्जा खत्म करता है। शीतल चंदन के कास्ट भी संघर्ष करते हैं तो जल जाते हैं।।
पांचवा- कोई भी स्त्री का अपमान।। छठ्ठा- अप्रिय सत्य।। सातवां है-कुसंग।। यह सात कुमारग से बचे तो हम मार्गी है।।
पूछा गया तरकग्य, मर्मज्ञ और सर्वज्ञ में क्या फर्क है तरकग्य बुद्धि प्रदान होता है,मर्मज्ञ वह है जो भजनानंदी है और हार्दिक है और सर्वज्ञ है जो परम तत्व को पा गया है।।
जनकपुरी में राम लक्ष्मण आए। सीता भक्ति है भगवान हमेशा भक्ति के भवन में निवास करते हैं।। आम्रकुंज में, सुंदर सदन में,जनकपुर में फिर आगे जाकर पुष्प वाटिका में,रंगभूमि में,विवाह मंडप में, कोहबर लीला में और सिया के साथ अयोध्या में जाते हैं।।नगर दर्शन के लिए निकले। जनकपुरी देखने जाते हैं और ब्रह्मानंद को ही मानने वाले लोगों को परमानंद देते हैं।।निर्गुण में ब्रह्मानंद है और सगुण में परमानंद मिलता है।। बड़े लोगों से डरने से भी निडर हो जाते हैं यह जल्दी ना समझ में आए ऐसा अद्भुत सूत्र है।।
राम लक्ष्मण गुरु के चरण सेवा करते हैं लेकिन मैं यह प्रसंग ज्यादा नहीं कहता क्योंकि वहां घेलछा और व्यक्ति पूजा का डर है। चरण के साथ जुड़ी सब चीज अद्भुत है।।चरण रज,चरण प्रक्षालन,चरणामृत चरण सेवा और चरण पादुका का महिमा है। लेकिन व्यक्ति पूजा शोषण और कली प्रभाव का डर लगता है। पराग पारसमणी है।।
इस पवित्र रज के कारण सब कुछ मिलता है। त्रिभुवनदास दादा की सबसे ज्यादा आग्या मैंने मानी और आग्या सेवा की।।शत प्रतिशत अनुसरण किया दादा की हर प्रकार की सेवा सावित्री मॉं ने की और चरण सेवा गांव के माधा बाबर ने की।।
मानस में दो बाटिकाहै:जनक की पुष्प वाटिका और रावण की अशोक वाटिका। साम्य भी बहुत है जनक का विदेहनगर है, रावण का देहनगर है। जनक की विद्यावान की और रावण की विद्वान की।। जनक की वाटिका में फल नहीं है फूल है। क्योंकि फल की आकांक्षा नहीं करते ऐसा कर्म करते हैं।।रावण की अशोक वाटिका में फल ही है फूल नहीं है। भोगवादी को फल में ही इच्छा है। वह मासूमियत नहीं वहां कोई महक नहीं है।।
राम लक्ष्मण गुरु पूजा के लिए और सीता गौरी पूजा के लिए बाग में आए।। फिर धनुष्य भंग का प्रसंग चारों भाइयों का विवाह संपन्न होने के बाद अयोध्या से गुरु विश्वामित्र विदा लेते हैं और बालकांड का समापन होता है।।

