
सत्व गुण विष्णु में मिल जाए तो सार्थक हो जाता है।।
हमसे रिश्ता टूट कर परम में जुड़ जाए तो सार्थक होता है।।
क्रोध भगवान शंकर में मिल जाए।।
शिव समष्टि का अहंकार है।।
व्यक्तिगत सामान्य अहंकार वैश्विक अहंकार में मिल जाए वो ही जीव और शिव का मिलन है।।
ज्ञान हंस है,विचार राजहंस है,वैराग्य परमहंस है।। ज्ञान का तिनका गणपति के चरणों में,विचार विष्णु के चरण में और तमोगुण शिव के चरण में रखना चाहिए।।
समझ का समर्पण में परिवर्तन हो जाना वैराग्य है।।
अरण्य कांड की पंक्ति का गान करके छठ्ठे दिन की कथा का आरंभ करते हुए बापू ने कहा तीनों गुणों को त्यागा जा सकता है? और वह भी तिनके की तरह? हां यह संभावना है।।
और तुलसी जी ने तीन गुण को वात पित्त और कफ की तरह बताया है।। जो सब में होते हैं।भागवत कहता है गुण ही गुण में बर्तन करते हैं।।वात कफ और पित्त आरोग्य संहिताओं ने बहुत जरूरी भी कहा है।।काम वात है ,कफ लोभ अपार है और क्रोध पित्त कहा गया है।। शरीर अस्वस्थ तब होता है जब तीनों में से कोई गुण प्रकोप बढ़ता है। सम्यक रूप में तीनों जरूरी है।।तिनके की तरह त्यागना मतलब मुक्त कैसे हो! थोड़ी बुराई है,थोड़ी गंदगी है गंदगी वाला नाला गंगाजल में न जाए वह ध्यान रखना है।।रजोगुण कोई परम के गुण में मिल जाए। सत्व गुण विष्णु का है। गुण का एक अर्थ रस्सी है रस्सी बंधन में डालती है।। सत्व गुण विष्णु में मिल जाए तो सार्थक हो जाता है।। हमसे रिश्ता टूट कर परम में जुड़ जाए तो सार्थक होता है।। क्रोध भगवान शंकर में मिल जाए। तमोगुण में अहंकार भी आता है।।शिव समष्टि का अहंकार है।।व्यक्तिगत सामान्य अहंकार वैश्विक अहंकार में मिल जाए। एक अर्थ में जीव का शिव में मिल जाना। पिंड का ब्रह्मांड में मिल जाना है।।
ज्ञान विचार और वैराग्य तीनों हंस है।।ज्ञान केवल हंस है। वह क्षीर निर को भी अलग करता है। विचार राजहंस है।सब पर राज करता है।।वैराग्य परमहंस है ज्ञान का तिनका गणपति के चरणों में,विचार विष्णु के चरण में और तमोगुण शिव के चरण में रखना चाहिए।।
बड़े-बड़े शास्त्रग्य लोग भी अंत में बहुत परेशान दिखते हैं।। गुरु के बिना ज्ञान नहीं और ज्ञान के बिना वैराग्य नहीं!
बापू ने कहा कि आज रूपियों से आदमी रुई कि गांसडी की तरह बिकता और खरीदा जा सकता है। शब्द भी खरीदने जा सकते हैं! समझ का समर्पण में परिवर्तन हो जाना वैराग्य है।।
जगतगुरु शंकराचार्य ने एक श्लोक लिखा:
गच्छनंतिष्ठनंउपविशनंशयानो वानप्रस्थ या पि
वा यथेच्छ च वसेत् विद्वान आत्माराम सदा विरागमुनि
अपनी इच्छा हो वहां रहते हैं, जो अपनी इच्छा हो तो यात्रा करता है, गति करता है,अपनी इच्छा के अनुसार बैठता है,उठना है,शयन करता है।अपनी इच्छा हो वहां विश्राम करता है ऐसे आत्मारामी को सदा विराग मुनि कहते हैं।।
आसक्ति से खेद नहीं और विरक्ति का मोद नहीं वह बैरागी है।। निरंतर आनंद के रस में बैरागी अपनी मस्ती में रहता है।। कलम मलम और चलम की आज जरूरत है।।
अयोध्या कांड के मंगलाचरण में शिव जी का स्मरण करते हुए तुलसीदास जी लिखते है शिव के भाल पर चंद्र की शोभा पहले मंत्र में।। राम का दूसरे मंत्र में और तिसरे मंत्र में सीताराम की वंदना करते हैं।। अयोध्या कांड युवानी का कांड ह।। और वहां श्री गुरु चरण सरोज रज- दोहा से शुरू किया है।।
राम विवाह करके अयोध्या आए तो मानो अयोध्या में सब रिद्धि-सिद्धि की नदियां बहने लगी! सुख की बारिश हुई! अति सुख दुख का कारण बनता है। हरेक प्रकार का सुख हरेक व्यक्ति में आने से वनवास प्रकट होता है।।आज की कथा रामनामरुपी सोमरस एवं राम के रुप,लीला,धाम को अर्पित की गइ।।

