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भक्ति के मार्ग पर निरन्तर बढ़ती हुई तृषा का नाम ही तृप्ति है!

— मेरा जन्म किसी को परेशान करने के लिए नहीं हुआ!

– अपने पूर्वनिर्धारित कर्मों के परिणामों को ईश्वरेच्छा मानकर, उन्हें उदासीनता से स्वीकार करें।

– राम का स्मरण सत्य है, राम का गायन प्रेम है, राम की कथा का श्रवण करुणा है।

“मानस सिन्दूर” कथा के आज के अंतिम दिन के आरंभ में पूज्य बापू ने बताया कि पहलगाम की घटना ने हमारी बहन- बेटियों के सौभाग्य का सिन्दूर मिटा दिया, जिसके बाद एक सफल प्रयोग के रूप में “ऑपरेशन सिन्दूर” किया गया, उसी से मुझे इस कथा को गाने की प्रेरणा मिली, जो आज नौवें दिन संपन्न हो रही है।

रामचरित मानस के प्रत्येक चरण में सिन्दूर का प्रत्यक्ष- अप्रत्यक्ष उल्लेख है। बालकाण्ड में शिव-पार्वती विवाह के प्रसंग में तुलसीदासजी ने सिन्दूर का उल्लेख “बंदन बन्दी” शब्द से किया है। कथा की केन्द्रीय पंक्ति में रामजी सीताजी की मांग में सिन्दूर दान करते हैं। अयोध्याकाण्ड में भगवती सीता माता भगवान राम के साथ पतिव्रता धर्म का पालन करने के लिए चौदह वर्ष के लिए वन में चली जाती हैं, ये माता सीता के सिन्दूरी समर्पण का ही उल्लेख है। अरण्यकाण्ड में  सती शिरोमणि भगवती अनसूया की कथा है। अत्रि आश्रम में माता अनसूया सीताजी को सौभाग्यवती स्त्री के कर्तव्य- पातिव्रत्य का उपदेश देती हैं। इस प्रकार वहां भी सिन्दूर का अप्रत्यक्ष उल्लेख है। किष्किन्धा काण्ड में कपिराज वालि की धर्मपत्नी- जो हमारे शास्त्रों में सती की सूची में सम्मिलित हैं- सती तारा की समज, उसके चिन्तन में प्रकट होती है। अपने सुहाग के सिन्दूर की रक्षा के लिए तारा चिन्तित हैं। वह वालि कहती है कि – “सुग्रीव जिससे मिलकर तुम से द्वन्द्व युद्ध करने आया है, वह राम और लक्ष्मण काल को भी जीत सकते है।” तारा वालि को द्वंद्व युद्ध करने जाने से रोकना चाहती है। वालि भी राम के बल के बारे में जानता है। वह कहता है कि – “राम समदर्शी है। यदि मैं उनके हाथों मरूंगा, तो सुहागी हो जाउंगा।” – इस प्रकार वहां भी सिंदूर का चिंतन दिखाई देता है।

सुंदर कांड में सीता माता तो है ही, बल्कि राम चरण में जिसकी रति है, ऐसी ज्ञानी स्त्री त्रिजटा भी है। वह राम की भक्ति से कृत कृत्य है। भक्ति ही भक्त को सुहागी बनाती है। इस प्रकार त्रिजटा की भक्ति को यहां सिंदूर के रूप में इंगित किया गया है।

लंका कांड में दशानन रावण की धर्मपत्नी मंदोदरी सती हैं। वह रावण से कहती हैं कि “सीता को राम को वापस सौंप दो, ताकि मेरा सौभाग्य अखंड रहें।” – यहां भी मंदोदरी को सिंदूर की चिंता हैं। उत्तर कांड में अर्धनारीश्वर भगवान शिव, अपनी मांग भक्ति से भर देने की झंखना करते है।  इस प्रकार सातों कांडों में सिंदूर के दर्शन का वर्णन करके पूज्य बापू ने कथा के क्रम में प्रवेश करते हुए लंका कांड के बाद की कथा को भुसंडीजी के न्याय से आगे बढ़ाया गया। भगवान राम पुष्पक विमान में बैठकर लंका से अयोध्या के लिए प्रस्थान करते हैं। यह यंत्रमय नहीं, बल्कि मंत्रमय विमान था!

बापू ने इस अवसर पर भागवतजी के संदर्भ को याद करते हुए कहा कि जब भगवान कृष्ण ने गिरिराज को उठाया, तो जैसे जैसे व्रजवासी गिरिराज की शरण में आने लगे, ऐसे ऐसे गिरिराज का विस्तार होने लगा। इसी प्रकार पुष्पक विमान में भी ऐसी व्यवस्था थी कि यात्रियों की संख्या के अनुसार उसे छोटा या बड़ा किया जा सकता था। भगवान राम विमान से सीता को लंका की युद्धभूमि के दर्शन कराते हैं। रावण और कुंभकर्ण को निर्वाण दिया गया है, वहां भगवान कहते हैं कि “रावण और कुंभकर्ण यहीं मारे गए हैं।”

उन्हें किसने मारा, इसका उल्लेख वे नहीं करते। सीताजी कहती हैं कि “युद्ध में सभी ने कुछ न कुछ पराक्रम किया है, तो आपने मेरे लिए क्या किया?” तब भगवान राम सीताजी को सेतुबंध का दर्शन कराते हैं और कहते हैं कि मैंने “सेतुबंध” किया ! परमात्मा हमेशा जोड़ने का काम करता है, तोड़ने का नहीं! सेतु बनाकर शिव की स्थापना की गई है – मतलब परमात्मा कल्याण की स्थापना करता है। परमात्मा कर्म तो करता है, लेकिन उसमें कोई कर्तापना  नहीं होता। बापू ने कहा कि उपनिषदों ने दुनिया को ऐसे विचार दिए हैं, जो अन्यत्र नहीं मिलते। १०८ उपनिषदों में से “सर्वसार उपनिषद” में केवल २०-२१ मंत्र हैं। लेकिन बुद्धत्व प्राप्त महापुरुषों के लिए एक श्लोक अति उत्तम है, जिसमें भगवान कहते हैं –

“मैं शरीर नहीं हूँ। माता-पिता के कारण ही मेरा जन्म हुआ है, इसलिए मेरी मृत्यु नहीं है। मैं जीवन नहीं हूँ, तो मुझे भूख-प्यास कैसी ? मैं चित्त नहीं हूँ, तो मुझे शो-मोह कैसा? मैं कर्ता नहीं हूँ, तो बंधन क्या?

यहाँ भगवान राम कहते हैं कि

“मैंने किसी को नहीं मारा, मैंने संगम बनाया है-मैंने प्रयाग रचा है।”

बापू ने सूत्रपात करते हुए कहा कि – “दुनिया में अनेक प्रयोग होते हैं, लेकिन प्रयाग नहीं बनता।”

इसके बाद विमान गुहराज निषाद की नगरी में आता है। वहाँ से भगवान राम हनुमानजी  द्वारा भरतजी को अपने आगमन का संदेश भेजते है। भगवान राम गुह, केवट आदि के साथ अयोध्या आते हैं और जन्मभूमि को प्रणाम करते हैं। राम-भरत का मिलन होता है, वशिष्ठजी को प्रणाम करने के बाद अयोध्या की प्रेमातुर  प्रजा को भगवान की व्यापकत्व का दर्शन कराते है। अपनी ऐश्वर्य लीला के माध्यम से अयोध्या के प्रत्येक निवासी से व्यक्तिगत रूप से मिलते हैं। फिर कैकेयी माता के भवन में जाते हैं और उनका संकोच दूर करते हैं। सभी माताएं अपने पुत्रों की आरती उतारती हैं और वशिष्ठजी ब्राह्मणों की सलाह पर उसी समय भगवान राम को दिव्य सिंहासन पर बिठाकर राम राज्य की स्थापना करते हैं। विश्व को राम राज्य अर्थात सत्य, प्रेम और करुणा का राज्य प्राप्त होता है।

इस समय ब्रह्मभवन से चारों वेद आकर राम की स्तुति करते हैं। भगवान शिव अपने मूल रूप में आकर राम से भक्ति की मांग करते है। गोस्वामीजी ने यहां दिव्य रामराज्य का वर्णन किया है। कुछ समय पश्चात भगवान राम सभी को अपने अपने स्थान पर विदा करते है। श्री हनुमानजी का राम के चरणों के सिवा और कोई घर नहीं है, अतः वे रामजी के पास ही रहते हैं। तुलसीदासजी ने लव-कुश के जन्म तक की कथा सुनाकर रामचरित मानस को विराम दिया है। उन्होंने अपवाद और दुर्वाद वाला कोई प्रसंग नहीं उठाया है। उत्तर कांड में कागभूषण्डिजी का चरित्र गरुड़जी के सात प्रश्न और उनका भूषण्डिजी द्वारा दिया गया उत्तर, यही सातों कांड का सार है। मानस के चारों आचार्यों ने अपनी-अपनी पीठ से राम कथा को विराम दिया, और बापू ने वाराणसी की “मानस सिंदूर” कथा को भी विराम दिया। बापू ने कहा कि – “कथा का अमृत ऐसा है कि कभी तृप्तिनहीं होती। भक्ति मार्ग में  निरंतर बढ़ती हुई तृषा ही तृप्ति है! अंत में बापू ने कहा कि राम का स्मरण, राम का गायन और राम कथा का श्रवण ही रामचरित मानस का सार है। राम का स्मरण सत्य है, राम का गान प्रेम है और राम कथा का श्रवण करुणा है।

पूरे आयोजन पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए पूज्य बापू ने कथा को विराम दिया और वाराणसी से प्रस्थान किया।

 

रत्ना कणिका

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– पुष्पक विमान यंत्रमय नहीं, मंत्रमय है।

– परम वह है, जो समाज को जोड़ता है, सेतु बंध करे, कल्याण की स्थापना करे!

– उपनिषदों ने दुनिया को विचार की जो ऊंचाई दी है, वह कहीं और देखने को नहीं मिलती।

– दुनिया में प्रयोग तो बहुत होते हैं, पर प्रयाग नहीं बनता!

– अंकुरित होने से पहले ही कर्मफल को यदि क्षमा की प्रज्वलित अग्नि में जला दिया जाए, तो उसका फल नहीं भोगना पड़ता।

 

बॉक्स आइटम

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– पूज्य बापू ने मानसिंदूर कथा को पहलगाम की घटना में जिन बहनों-बेटियों का सिंदूर नष्ट हो गया है उन्हें और उनके परिवारों को समर्पित किया, साथ ही भारत सरकार और सेना द्वारा किए गए सफल प्रयोग “ऑपरेशन सिंदूर” को भी समर्पित किया।

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