
अपनी आंख कहां देख पाती यहां राधे के सिवा और है क्या!!
प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से रामचरितमानस के सातों सोपनो में गौ माता का दर्शन है।।
हर कांड में गौ माता है।।
गौ माता सोलह कला परिपूर्ण है।।
सुख मूल हमारे शास्त्रों में कहीं होता है।।
चित्रकूट धाम तलगाजरडा के हनुमान जी की प्रसादी के रूप में 5 लाख की सेवा की राशि यहां की गौशाला के लिए अर्पण की गइ।।
गौ सेवा और गौ-वंश की सेवा के मुख्य हेतु को लेकर माताजी गौशाला,की जहां दो गाय में से आज 65000 से ज्यादा गाय का पालन पोषण कर रहे पद्मश्री से अलंकृत परम विरक्त संत श्री रमेश बाबा जी की पावन उपस्थिति के साथ मलूक पीठाधीश राजेंद्र दास जी महाराज एवं बलराम दास जी और रमण रेती से गुरु शरणानंद जी और कथाकार भूपेंद्र भाई पंड्या ने दीप प्रज्वलन के बाद अपने शब्द भाव रखें।।
मनोरथी परिवार के हरेश नटवरलाल संघवी(वीणा डेवलपर्स-मुंबइ) की ओर से गौ सेवा और गौ माता के लिये हम क्या कर सकते है वो बताया।।
कथा में पद्मश्री से अलंकृत परम विरक्त संत श्री रमेश बाबाजी की विशेष उपस्थिति रही।।
वृषभानु नंदिनी श्री राधारानी जी की दिव्य प्रागट्य भूमि बरसाना(मथुरा) से मोरारिबापु ने मानस में से ये पंक्तिओं का गान करते हुए
जेहि जेहि देस धेनु द्वीज पावइ।
नगर गॉंव पुर आगि लगाइ।।
धेनु रूप धरि ह्रदय बिचारी।
गइ तंह जहां सुरमुनि चारि
बताया की राधे जो की परम कृपा से गौ माता की आवाज,व्रज मंडल की प्रगट अप्रकट चेतनाओं की कृपा से बरसाना धाम के इस भूमि पर रमेश बाबा जी के गौ संकल्प से इस कथा का आरंभ हो रहा है।।
सबको प्रणाम करते हुए बापू ने कहा कि सबसे पहले यह कथा के मनोरथी हरेश भाई ने माताजी गौशाला के लिए अपनी ओर से 5 करोड चार लाख रुपए की राशि अर्पण की।। बापू ने साधुवाद देते हुए बताया कि गायों के लिए,यमुना जी के लिए,कभी सोम यज्ञ,कभी अन्य यज्ञ के कार्य में निमित्त बनते रहे हैं।।यमुनाजी,राधे जूं और गौ माता की आप पर कृपा है।आपके घर में सेवा त्रिवेणी बह रही है।।
बापू ने बताया कि सालों पहले जब मैं यहां आया था तो रमेश बाबा जी ने,जो विचरण कर रहे थे,मुझे कहा कि एक विशेष स्थान पर आपको ले चालु लेकिन शर्त है कि हम दो ही हो! तीसरा कोई ना हो कृपा करके वहां ले गए जहां बाबा ने अनुभूति और दर्शन किए हैं ऐसे दो-तीन स्थान दिखाएं।। वह स्थान नीज आंखों से देखें, वहां की रज को शिरोधार्य किया,धन्यता महसूस की।।अपनी आंख कहां देख पाती यहां राधे के सिवा और है क्या!!
यह कथा के पीछे इतना पवित्र वैष्णवी दीनता के साथ संकल्प हुआ है।।
बापू ने कहा कि अथर्ववेद में एक गौसूकत है।।
गत कथा में मानस राधाष्टक का गायन किया था।। अब यह तय किया कि गौसूकत विषय पर कोई अज्ञात चेतना या गौ माता आदेश से यह विषय चुन रहा हूं।।
प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से रामचरितमानस के सातों सोपनो में गौ माता का दर्शन है।। हर कांड में गौ माता है।।
रामकथा को सूर धेनु कहा है।। मानस सूरधेनु पर भी हमने कथा गान किया हुआ है।।
गौ माता के चार चरण,चार आंचल,पूंछ,मुख,आंखें दो कान, दो शिंग सबको मिलाकर गौ माता सोलह कला परिपूर्ण है।।
पाश्चात्य इतिहास कारों के मुताबिक उत्क्रांती वाद के आधार पर मानव जात बंदर से विकसित हुई है।। हमारे सौराष्ट्र गुजरात और महाराष्ट्र प्रदेश में बहुत बड़े महापुरुष पांडुरंग दादा आठवले जी ने उत्क्रांती वाद को दशावतार से जोड़कर बताया है।।
ओशो ने कहा कि बंदर से हम विकसित हुए इसे ज्यादा लगता है कि आदिकाल में हम गौ माता है।। यह भी कहा मानव को आंख गाय की मिली है।। अथर्ववेद के गौसूक्त का संवाद करेंगे।।गाय का देह अन्य रूप में भी १६ वस्तु हमें प्रेरित करती है वह संवाद रखेंगे।।
दोनों पंक्ति बालकांड से उठाई है।।विज्ञान,विचारकों, इतिहासकारों कुछ भी कहे लेकिन आखिर मूल कहां है वेद से लेकर रामचरितमानस तक जाना पड़ेगा।। सुख मूल हमारे शास्त्रों में कहीं होता है।। बापू ने कहा कि जब रावण का शासन चलता था तब गाय और द्विज,कृषि और रिषि के बीच में परम तत्व का मूल पड़ा है वह नष्ट करने के लिए राक्षस वहां के गांव नगर और कूल को आग लगा देते थे और बापू ने फिर परम सदग्रंथ के बारे में महिमा,ग्रंथ परिचय,माहात्म्य रखते हुए मंगलाचरण के मंत्र और प्रथम कांड के सभी मंत्रों का गान करते हुए खास बात कही कि मैं पहेल तो नहीं करता क्योंकि कथाकार भूपेंद्र भाई ने भी कुछ राशि देकर शुरू किया है।। लेकिन आपको भी विनय जरूर करता हूं चित्रकूट धाम तलगाजरडा के हनुमान जी की प्रसादी के रूप में 5 लाख की सेवा की राशि यहां की गौशाला के लिए अर्पण करके सभी को अपनी तरफ से जो भी कुछ गौ सेवा करनी है वह करने को बताया।।
वंदना प्रकरण में अलग-अलग वंदनाओं के बाद गुरु वंदना और हनुमत वंदना के बाद आज की कथा को विराम दिया गया।।

