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कोई ग्रंथ,कोई युग,कोई वेद ऐसा नहीं जिसमें गौ माता का वर्णन ना हो।

*कोई ग्रंथ,कोई युग,कोई वेद ऐसा नहीं जिसमें गौ माता का वर्णन ना हो।।*

*गौ माता के अंगों में लक्ष्मी का निवास है।।*

*श्रेष्ठ दान में गोदान है।।*

*यहां ज्यादा मांग मांग मत करना,राधा रानी बैठी है, गायें भी खींचेगी सबको।।*

*कथा साधन नहीं,साध्य है,उपलब्धि है,परिणाम है।।स्वयं कथा गाय है।।*

*गाय चुप रहे तब मुनि है और जब रांभती हो तब ऋषि है।।*

*शिंग है वह मुनि और ऋषि का निवास स्थान है।।*

*यदि आपके आंगन में एक गाय हैं तो एक औषधालय आंगन में खड़ा है।।*

*गाय की पूजा हम करते हैं,लेकिन प्रेम करें।।*

परम आह्लादीनी शक्ति श्री राधे जूं के चरणों में प्रणाम करते हुए,कल से शुरू हो रहे नवरात्र पर पराम्बा भगवती भवानी का स्मरण करते हुए और गौ माता की खूर से उड़ी रज को शिरोधार्य करते हुए बरसाना धाम में दूसरे दिन की रामकथा का आरंभ करते हुए बापू ने अथर्ववेद में लिखा गौ सूक्त का एक मंत्र उच्चरित करवाया

*गो-सूक्त॥*

*माता रुद्राणां दुहिता वसूनां स्वसादित्यानाममृतस्य नाभिः।*

*प्र नु वोचं चिकितुषे जनाय मा गामनागामदितिं वधिष्ट॥१॥*

अथर्ववेद का गौसुक्त कहता है गौ माता रुद्र की मां है।कोई ग्रंथ,कोई युग,कोई वेद ऐसा नहीं जिसमें गौ माता का वर्णन ना हो।।वर्णों में भी जैसी जिसकी वृत्ति गौ माता का वर्णन किया है।। गौ माता व्यापक तत्व का पर्याय है।। गौ माता के अंगों में लक्ष्मी का निवास है।अंग में लक्ष्मी है उनकी खूर में रज उड़ती है तो गौ माता के लिए अपील करने की भी कोई आवश्यकता नहीं।लेकिन देश काल के अनुसार प्रैक्टिकल होकर हम अपील करते हैं। बाबा जी ने तो अपील करने को भी मना किया है।।

बापू ने कहा कि विदेश से भी चिठ्ठियां फोन आ रहे हैं कहां सेवा करनी है और एक करोड रुपए की राशि कल ही किसी ने विदेश से जाहिर की है।।

गाय हमारी माता तो है ही।गौ विचार,गौ अचार हर जगह व्याप्त है।।हरेश भाई संघवी के एक मित्र ने तत्काल 5 करोड रुपए की जाहिरात भी की।। आकाशवाणी सुनाई दी वहां दान की कितनी महिमा है वो सुनाने के लिए नारद जी से विनय किया गया। देवर्षि नारद प्रकट हुए और नारद जी से पूछा गया कि दान का महिमा बताइए। और सही समझाइये। नारद ने कहा तीन प्रकार के दान है:उत्तम मध्य और कनिष्ठ।। उत्तम दानों में भूमिदान,किसी को घर बना देना,स्वर्णदन।।इस यादि में कन्यादान नहीं लिखा क्योंकि हमारे ऋषियों का चिंतन देखिए! कन्या तो समर्पण है।। फिर विद्यादान और आखिर श्रेष्ठ दान में गोदान लिखा है।।

यहां ज्यादा मांग मांग मत करना,राधा रानी बैठी है, गायें भी खींचेगी सबको।।कथा साधन नहीं साध्य है उपलब्धि है,परिणाम है।।स्वयं कथा गाय है।। कोई लक्ष्य भी नहीं बनाना की इतनी राशि इकट्ठा कर लेंगे तुलसी जी ने 50 से अधिक बार गौ का स्मरण भी किया है।।

जो गौ माता रांभती है तो साक्षात परमात्मा को अवतार लेना पड़े उसकी शक्ति का अंदाज कौन लगाएगा! कभी विप्र-धेनु शब्द साथ-साथ लिखा है गाय चुप रहे तब मुनि है और जब रांभती हो तब ऋषि है।। गाय के जो 16 रूप है वहां शिंग है वह मुनि और ऋषि का निवास स्थान है।।

कहीं गौशाला में पांच पांच गाय दत्तक लेकर भी सेवा कर सकते हैं।। एक समय जिस देश का अर्थशास्त्र गाय आधारित था।।भगवान बुद्ध गाय का दूध पीते थे।महापुरुषों ने भी गाय के दूध का सेवन किया है।

बापू ने कहा कि मैं भी विनय करता हूं कि प्रत्येक गांव में यह पांच शाला होनी चाहिए जहां:पाठशाला, व्यायाम शाला,धर्मशाला,भोजनशाला और गौशाला होना चाहिए।।

बर- वरदान साना- सटा हुआ,युक्त,यह भूमि वरदान से युक्त है।।

मध्यम दान में उपवन बगीचा,कूप बावड़ी बना देना कनिष्ठ दान में किसी को जूते देना,छाता ले देना ऐसा नारद जी ने बिताया।।

भगवान शिव भी गौ माता की सेवा का संकेत करते हैं।।प्रत्यक्ष रूप में शिव ने नंदी की सेवा की है। राजा दिलीप ने नंदिनी गाय की सेवा की है।अध्यात्म रामायण में राम भी गाय चराने जाते थे ऐसा लिखा है।

कोई अवतार सिर्फ गाय के लिए आया हो! पृथ्वी भी गाय हैं।।गाय कहां नहीं है? इसीलिए यहां लिखा है गाय वसुओं की पुत्री और आदित्य की बहन है।। अमृत का केंद्र है।।

यदि आपके आंगन में एक गाय हैं तो एक औषधालय आंगन में खड़ा है।।विचारकों को कहा आप भी ध्यान रखें कहीं भी गाय का वध ना हो। वध तो हो ही नहीं लेकिन बध्ध बंधी हुई भी ना हो मुक्त घूमती हो।।

श्रृंगी ऋषि और लोमश मुनि दो शिखरस्त बैठे हैं।। जो दो गाय के शिंग है।।

सभी देश में गाय का दूध ज्यादातर पीते हैं। बीज पंक्ति में नगर गांव पूर्व और सभी देशों में गायें उसे वक्त थी वह दिखता है।।

गाय की पूजा हम करते हैं,लेकिन प्रेम करें।।

कथाक्रम में रामनाम में से रा लेकर धा लगाओ तो राधा हो जाता है! वह कहकर बापू ने रामकाज के लिए जो जो सहयोगी हुए सब की वंदना करते-करते नाम महाराज की,रामनाम महामंत्र की 72 पंक्तियों में वंदना की,वंदना का गायन संवाद किया।।

रामचरित मानस और रामकथा का उद्भव का पूरा इतिहास और तुलसी जी ने रामनवमी के दिन रामचरित मानस का १६३१ अयोध्या में प्रागट्य किया।।

चार घाटों का मान सरोवर का रुपक समजाया।।

 

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