Homeगुजरातमेरा संबंध नरसिंह के इतिहास के साथ नहीं लेकिन अध्यात्म के साथ...

मेरा संबंध नरसिंह के इतिहास के साथ नहीं लेकिन अध्यात्म के साथ जुड़ा है।।

हमें तो नयन से निरखना और अपनी ऑंख से परखना होगा।।

इतिहास भला और बूरा दोनों प्रकार के होते हैं, अध्यात्म कायम शुद्ध होता है।।

मैं बुद्धि की दृष्टि से नहीं,बुद्ध की आंख से नरसिंह को देखता हूं।।

पुरुष संतों में नरसिंह मेहता सबसे ज्यादा अच्छे लगते हैं।।

जो समाधि में संवेदना नहीं वह खूबसूरत उपाधि है।।

संघर्ष बंद हो जाए तो स्पर्श बहुत बड़ा काम करता है।।

गुजरात के भावनगर के पास आद्य गुजराती कवि और भक्त शिरोमणि नरसिंह महेता की रस और रासेश्वर की भूमि गोपनाथ से प्रवाहित रामकथा के तीसरे दिन के आरंभ में बापु ने यहां की समस्त चेतनाओं और रसभूमि में हुए सभी चेतनाओं को प्रणाम करते हुए बताया की किसी ने पूछा था नरसिंह मेहता के इतिहास के बारे में कुछ कहो।। बापू ने कहा कि मेरा संबंध इतिहास के साथ नहीं लेकिन अध्यात्म के साथ जुड़ा है।।

तीन काल है भूत भविष्य और वर्तमान। भूतकाल की स्मृति होती है यादें होती है।।हर एक काल,हर एक युग और हर एक पल का अपना धर्म होता है।। यदि हमें जीने आए तो! इसीलिए नरसिंह मेहता भी कहते हैं आपणे आपणा धर्म संभाळवा।भविष्य सदैव चिंता करता है और वर्तमान निरंतर चिंतन करवाता है।। मुझे भी नरसिंह का चिंतन होता है। इतिहास ने नरसिंह को प्रकट करने के पवित्र प्रयत्न किए हैं वह स्वागत है,लेकिन कोई एक मत नहीं है। तुलसी जी ने वेद पुराण सब का सार प्रस्तुत किया सबसे पहले ऋग्वेद फिर सामवेद आया बाकी के दो वेद रामायण महाभारत अआये।। हमें तो नयन से निरखना और अपनी ऑंख से परखना होगा।। इतिहास भला और बूरो दोनों प्रकार के होते हैं, अध्यात्म कायम शुद्ध होता है।शरद पूर्णिमा भी दोगे एक रास वालों की एक उंधिया वालों की! दो मत का उर्दू में अर्थ होता है कोई मत नहीं!!

यहां का भावनगर के पास का तलाजा गौरव ले सकता है 30 साल तक एक इतिहास कहता है कि नरसिंह यहां बसे है।।और तालीध्वज गिरी में रहे हैं।। मूल वडनगर के ब्राह्मण और वहां हाटकेश का मंदिर भी है।।हमारे गुजरात के जवाहर बख्शी ने पूरा नरसिंह का वंश वृक्ष दिखा और वहां से शुरू करते हुए अपने तक बक्शी साहब वंश वृक्ष को लाते हैं।।

विद्वानों ने खोज की लेकिन में बुद्धि की दृष्टि से नहीं बुद्ध की आंख से नरसिंह को देखता हूं।। तलाजा में अच्छा नहीं लगा फिर जूनागढ़ निकल पड़े। 600 साल के पहले कौन से वाहन में गए होंगे? शायद पैदल भी गए होंगे तो मेरा गांव तलगाजरडा भी पसार हुए होंगे!!

फर्क इतना है सैयाद कफस और आशियाने में।

यह तेरा दस्तूर है उसे मैंने बनाया है!!

और यहां से निकले तो कोंजली गांव से भी निकले होंगे जीवन दास मेहता तक पहुंचेंगे।। इसीलिए जूनागढ़ में लिखते हैं

तलेटी समीपे मने लाग्या करे छे।

हजी क्यांक करताल वाग्या करे छे।।

जो भी हो नरसिंह बहुत अच्छे लगते हैं।सांप्रत  स्थिति में भजन कार को अनुभव करना सहन करना पड़ता है तब नरसिंह बहुत याद आते हैं।। दुनिया कहते हैं बूरो तो नरसिंह कहते हैं मैं बुरा!

बापू ने नरसिंह का पद जो गुजराती में लिखा है दुनिया कहे भूंडो,करम धरम नी वात छे जेटली

मुझ ने नव भावे रे।। सघळा पदारथ जे थकी पाम्यो।

ते मारा प्रभुनी तोल्ये नव आवे रे।।

नागर ग्याति नहि एक विचारधारा है।।

सघळा संसार मां हुं एक भूंडो,भूंडाथी य भूंडो।

तमारे मन माने ते कहेजो।

मने नेडो लाग्यो बहु उंडो रे।।हळवा करम नो हुं नरसैयो,मुज ने वैष्णव बहु वालां रे।। वैष्णवों की बात अमेरिका तक पहुंचती है।।

25 साल जूनागढ़ में बसे।। पुरुष संतों में नरसिंह मेहता सबसे ज्यादा अच्छे लगते हैं और महाराष्ट्र में तुकाराम,ज्ञानेश्वर,नामदेव,एकनाथ। लेकिन वह हमें दूर पडते हैं।।मध्यकालीन संतों में कबीर बहुत अच्छे लगे।।मातृ शरीर में सबसे पहले मीरा और दूसरी गंगा सती दिखती है।।आज के सोशल मीडिया में जैसे सिख गुरु कहते हैं बोले सो निहाल! लेकिन अब बोले वह बेहाल हो जाता है!!यहां हल्का नहीं लेकिन हळवा शब्द लिखकर यह सर्जक का विवेक है।।हळवा करम नो हुं नरसैयो मुझ ने वैष्णव बहू वाला रे।।

फिर नरसी मेहता गोपनाथ क्यों आए? क्योंकि वैष्णव जन है और गोपनाथ परम वैष्णव है।। हरिजन थी जे अंतर गण से। एना फोगट फेर ठालां रे।

एवा रे एवा अमो तमे कहो छो वली तेवा रे

भक्ति करता भ्रष्ट कहेशो तो करशुं दामोदर नी सेवा रे।

गोपनाथ 7 दिन तक समाधि में रहे और समाधि के आंसू का अभिषेक हुआ।। जो समाधि में संवेदना नहीं वह खूबसूरत उपाधि है।। फूल भी यहां का मूल भी यहां का ।।और फिर खीला।। गोपनाथ ने दर्शन किए और कहा कि मांगो? नरसिंह ने कहा कि आपको जो वल्लभ प्रिय हो वो।।और फिर एक महीना तक रासलीला और हाथ जल गया।।कृष्ण कहते हैं काया ना जले तब तक कृष्ण नहीं मिलता। गोपनाथ और गोपीनाथ दोनों की कृपा से काव्य सृजन शुरू हुआ।। नरसिंह मेहता के पिता का श्राद्ध दलित वास में भजन गाने की बात,हूंडी, कुंवरबाइ का प्रसंग सब विद्वान जन नहीं मानते हैं।। यदि समाज की गुनातीत श्रद्धा को अखंड रखना हो तो ऐसे प्रसंगों को भी हमें रखना चाहिए।।

25 साल जूनागढ़ रहने के बाद अपने ही लोग और आसपास के लोग ने बहुत विरोध किया और विरोध बढ़ता गया।।जब सुना कि विरोध करने में अपने भी है जूनागढ़ छोड़कर निकल गए और किसी ने राजा रा’ मांडलिक के कान तक बात की और वहां नरसिंह का अपमान हुए।।प्रपंच हुआ। यह पर्चा नहीं लेकिन परीक्षा थी।। नरसिंह ने कभी प्रपंच परचे नहीं अपना परिचय दिया है।। फिर हार माला का प्रसंग, केदार राग किसी के वहां रख दिया।। सिर्फ ₹60 के लिए केदार को गिरवी रख दिया।। नरसिंह को यदि हम सिंह कहे तो एक मुख है वेदांत का एक सिद्धांत का है।।संघर्ष बंद हो जाए तो स्पर्श बहुत बड़ा काम करता है।। जूनागढ़ छोड़ा तब दलित समाज,रा’ मांडलिक की माताजी और नागर गृहस्थ बहुत रोए थे।।आखिर के 22 साल नरसिंह मेहता बहुत खराब हालत में रहे पत्नी भी गई और पुत्र शामलशा की भी मृत्यु हुई।।

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