
ब्रह्म के अंश होने के नाते हमें ‘सम’ पर आना ही होगा, बेहोशी हमें समभाव में आने नहीं देती।
जिस मनुष्य के भीतर पलभर का भी विवेक जाग जाता है, वह शाश्वत सत्य को जीत लेता है।
विश्व विजेता भारतीय महिला क्रिकेट टीम को व्यासपीठ से बधाई।
आठ-नौ दिनों की लंबी रेलयात्रा के बाद रामयात्री जब रामेश्वरम् से हवाई और समुद्री मार्ग से श्रीलंका के कोलंबो पहुँचे, तो एक नवीन रोमांच और आनंद का अनुभव हुआ। यह वही भूमि है जहाँ प्रभु श्रीराम ने सेतुबंध की स्थापना की, सीताजी को अशोकवाटिका से मुक्त कराया, और रावण के साथ धर्मयुद्ध किया।
आज कथा का आठवाँ दिवस लंकाकांड की पावन भूमि पर सम्पन्न हुआ। मनोरथी परिवार ने इस भव्य मानस रामयात्रा के आयोजन हेतु जो समर्पण दिखाया, पूज्य मोरारी बापू ने उसकी सराहना की और कहा कि कभी-कभी अधिक सुविधा भी मनुष्य पचा नहीं पाता। महीनों की तपस्या और इतने सारे लोगों की कड़ी मेहनत से सफल हुई यह रामयात्रा आज अपने समापन की ओर अग्रसर है। उन्होंने सिर्फ़ एक दिन बचा होने के दर्द का भी ज़िक्र किया और कहा कि जिसकी शुरुआत होती है, उसका अंत भी होता है।
बापू ने कहा, “हमारे यहाँ एक शब्द है समारोह। ‘समारोह’ का अर्थ है बार-बार ‘सम’ पर आरोहण करना। गीता का मूल शब्द ‘सम’ है। ब्रह्म ‘सम’ है। जब हम ब्रह्म के अंश हैं तो हमें भी समत्व पर पहुँचना ही होगा। बेहोशी हमें ‘सम’ पर नहीं आने देते।”उन्होंनेबतायाकिएकयात्राअयोध्यासे, एक चित्रकूट से, और यह तीसरी यात्रा लंका से अयोध्या की ओर होगी।
बापू ने आगे कहा अयोध्या त्याग की भूमि है।अयोध्या बहुत ही समृद्ध है। यहाँ किसी ने राज्य छोड़ा, किसी ने प्राण, किसी ने सम्मान, किसी ने भाई और किसी ने पत्नी। सबने कुछ न कुछ त्यागा। चित्रकूट में त्याग भी है, ऐश्वर्य भी, वनवास भी, और विहार भी। लंका भोग की भूमि है। यहाँ त्याग नहीं, समर्पण नहीं, बल्कि अपहरण है। अत्यंत समृद्ध होते हुए भी रावण को और पाने की कामना सताती रही।
साधु की दृष्टि विषय पर नहीं, विश्वास पर होती है। भरत ने जब चित्रकूट में प्रभु श्रीराम को वल्कल वस्त्रों में देखा, तो लगा मानो कामदेव और रति मुनिवेश में विचरण कर रहे हों। सन्न्यासी अग्नि को स्पर्श नहीं करता, जबकि विरक्त अग्नि की पूजा करता है। सन्न्यासीगेरुए वस्त्र धारण करता है, जबकि विरक्त प्रायः श्वेत वस्त्र पहनता है।”
बापू बोले, “रामकथा का वक्ता शब्दों से क्षीण नहीं होना चाहिए। उसे बुद्धि से नहीं, हृदय से बोलना चाहिए। जब हृदय में परमात्मा का निवास हो, तब वाणी में वही परमात्मा बोलते हैं। बुद्धि की कथा कालीनेमी ने भी कही थी, पर वह हृदयविहीन थी। जब हनुमानजी ने हृदय से अशोकवाटिका में रामकथा गाई, तो सीताजी का दुख, भय और शोक दूर हुआ। कृष्ण ने हृदय से कहा, अर्जुन ने हृदय से सुना और कहा मैं वैसा ही करूंगा जैसा आप कहेंगे।”
सुनदरकांड के प्रसंग में बापू ने कहा कि मनुष्य को अपने साथ रहना चाहिए। यदि यह संभव न हो, तो साधु, शास्त्र या स्मृति के साथ जीना चाहिए।
आज बापू ने रामकथा के मध्य भारतीय महिला क्रिकेट टीम को वर्ल्ड कप विजेता बनने पर व्यासपीठ से हार्दिक बधाई दी।
हनुमानजी का लंकागमन, सीताजी से मिलन, सेतुबंध, युद्ध और रावण के मोक्ष का वर्णन करते हुए बापू ने कहा कि अब यह कथा लंकारूपी तीर्थ को अर्पित की जाती है। कल पुष्पक विमान द्वारा सभी श्रोता अयोध्या प्रस्थान करेंगे और वहीं रामकथा की पूर्णाहुति सम्पन्न होगी।
उल्लेखनीय है कि इस यात्रा का शुभारंभ 25 अक्टूबर को चित्रकूट स्थित अत्रि मुनि आश्रम से हुआ और इसका समापन कल अयोध्या में होगा। यात्रा पंचवटी, सतना, शबरी आश्रम, ऋषिमुख पर्वत, पर्वर्शन पर्वत, रामेश्वरम, और श्री लंका तक का 8,000 किलोमीटर से भी अधिक का सफर तय कर चुकी है।
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अत्यधिक कामना, इच्छा या तृष्णा बढ़ती है, तो यह वस्तुएं क्षीण होती हैं
कथा के दौरान पूज्य मोरारी बापू ने बताया कि जब मनुष्य में अत्यधिक कामना, इच्छा या तृष्णा बढ़ती है, तो बहुत साड़ी वस्तुएं क्षीण होती हैं। अतितपस्या और अतिभोग से शरीर दुर्बल होता है। अधिक कामनाओं से बुद्धि मंद पड़ती है।भोग हमें भोगता है, आयु घटती है।अत्यधिक इच्छा सत्य से दूर कर देती है, आत्मबल घटता है, स्मृति क्षीण होती है। शरीर में कंपन, वाणी में दुर्बलता और शब्दों में प्रभावहीनता आ जाती है।
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वक्ता के कितने मुख होने चाहिए?
बापू ने कहा ,“वक्ता ब्रह्मा समान हो तो चतुरानन, शंकर समान हो तो पंचानन, गणेश समान हो तो गजानन, कार्तिकेय समान हो तो षडानन। वक्ता अमितानन हो सकता है, प्रसन्नानन हो सकता है, जलकमलानन भी हो सकता है। परंतु वक्ता कभी विकटानन या दशानन नहीं होना चाहिए, न ही रहितानन।”

