
साधक में नम्रता,परस्पर प्रेम,ग्रंथ पर दृढ़ भरोसा, जितना हो सके इष्ट का स्मरण,इतनी कथा सुनी या गाई इसका सपने में भी अहंकार मत करना।।
साधक को अपनी विशेषता का अहंकार नहीं आना चाहिए।।
साधक को किसी भी स्थिति में चिंता नहीं करनी चाहिए।।
वक्ता का एक लक्षण यह भी है वक्तृत्व के साथ कर्तृत्व भी होना चाहिए।।
गुरु हमें पांच शिक्षा,पांच दीक्षा और पांच भिक्षा देता है।।
आंध्रप्रदेश की सप्त पहाडीयों पर बिराजित भगवान वेंकटेश तिरुपति जी की छांव में चल रही रामकथानेसांतवे दिन में प्रवेश किया।।
आरंभ में बापू ने ऋग्वेद के एक मंत्र से आरंभ किया
अवस्मायस्यवेषणेस्वेदम्पथिशु
जूहर्तिअभिमहस्वजन्यंभूमाप्रश्ठेवरुरु:
त्रिमूर्ति श्रीपति और रमापति की चर्चा में अब भूदेवी का कुछ दर्शन करवाते हुए बापू ने कहा ऋग्वेद में एक संदर्भ मिलता है।।कोई किसी के बारे में कुछ कहे तो जीसके बारे में कहा गया हो उसे सोचना चाहिए कि यह मेरे लिए नहीं मेरे अंदर विराजित परमात्मा के लिए है और जो कहता है उसे भी सामने वाले के व्यक्ति में नहीं लेकिन व्यक्ति के अंदर बसे परमात्मा के लिए है-ऐसा सोचेंगे तो दोनों दोष से बच जाएंगे।।
मैं श्रोताओं को साधक भी कहता हूं। साधक में विनम्रता होनी चाहिए।।विनोबा जी ने नम्रता के तीन आयाम बताएं: एक विनम्रता सामाजिक होती है। दूसरी वह अपने को दास समझता है और भक्तों की विनम्रता कहता है।।तीसरी सहज नम्रता।।सहज शब्द आता है तब राम,कृष्ण और कबीर दिखते हैं। साधक में नम्रता,परस्पर प्रेम,दृढ़ भरोसा ग्रंथ पर, जितना हो सके इष्ट का स्मरण,इतनी कथा सुनी या गाई इसका सपने में भी अहंकार मत करना।।
साधक को अपनी विशेषता का अहंकार नहीं आना चाहिए।।इसलिए गीता जी में विभूति योग है।
और साधक को किसी भी स्थिति में चिंता नहीं करनी चाहिए।वक्ता का एक लक्षण यह भी है वक्तृत्व के साथ कर्तृत्व भी होना चाहिए।।
बालाजी की बगल में खड़ी है वह भूदेवी है।
समुद्र वसने देवी पर्वतस्तनमंडले।
विष्णु पत्नी नमस्तुभ्यं पाद स्पर्श क्षमस्व में।।
समुद्र का वस्त्र पहने हुइ विष्णु पत्नी है। जब तक मैं जागृत हूं तुझे पद प्रहार करने में ध्यान रखूंगा।।यहभूदेवी का अर्थ है। भू का एक अर्थ पृथ्वी होता है। विनोबा जी दख्खण के थे इसलिए भूदान मांगते थे पृथ्वी सूर्य की केंद्र में घूमती है इसलिए सूर्य भी पृथ्वी का पति है।।कोई देश का राजा भूपति माना जाता है।लेकिन गुरु को भी भूपति कहा है।गुरु हमें 15 वस्तु देता है:पांच शिक्षा,पांच दीक्षा और पांच भिक्षा देता है।।
ऐसे पृथ्वी के मालिक विद्या,विनय,निपुणता,गुण और शील की शिक्षा देता है।।
शब्द दीक्षा,स्पर्श दीक्षा,रूप दीक्षा-स्वरूप बोध करवाता है,रस दीक्षा-निरस को रसिक बनाता है। और गंध दीक्षा देता है।।
और अश्रु की भिक्षा,अभय भिक्षा,अनुभव भिक्षा, अमल-निर्मल भिक्षा और अनत की भिक्षा भी गुरु हमें प्रदान करता है।।
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