Homeगुजरातमनोरथ पूर्ण पूरा होता तो भी उनकी कृपा है,यदि मनोरथ पूरा नहीं...

मनोरथ पूर्ण पूरा होता तो भी उनकी कृपा है,यदि मनोरथ पूरा नहीं होगा उनकी इच्छा है।।

संकल्प, वचन,प्रण,प्रतिज्ञा हम नहीं निभा पायेंगे।*ईश्वर को प्राप्त करने के लिए मनोरथ जरूरी है।

किसी भी संकल्प में सूक्ष्म अहंकार की उद्घोषणा है,मनोरथ अहंकार मुक्त है।।

शास्त्र को समझने के लिए और एक शास्त्र है जिसे हम मिमांसा कहते हैं।।

अभी तक समाज साधु की परछाई तक ही पहुंचा है मूल साधु तक पहुंचा ही नहीं।।

श्रध्धा से ग्यान,विश्वास से भक्ति और भरोसे से भजन मिलता है।।

तप और साधनाओं की अनेक धाराओं से हरी भरी पालिताणा की भूमि पर चल रही रामकथा के पांचवे दिन संतो महंतों,भगवान जगन्नाथ मंदिर के मंहंत अहमदाबाद से और विधि-विध अखाड़ा के महंतो, आचार्य भगवतो एवं केंद्रीय मंत्री मनसुखमांडविया और अन्य स्थानिक राजकीय आगेवानो सभी को याद करते हुए बापू ने कहा कि मनोरथ और शिव संकल्प में क्या अंतर है?हम जीव हैं,हमारे संकल्प बौद्धिक और स्वार्थ से भरे होते हैं।।

लेकिन वैष्णवी शब्द मनोरथ हमारे लिए अच्छा है। मनोरथ पूर्ण पूरा होता तो भी उनकी कृपा है,यदि मनोरथ पूरा नहीं होगा उनकी इच्छा है।।संकल्प, वचन,प्रण,प्रतिज्ञा हम नहीं निभा पायेंगे।।इस समय मनोरथ करना चाहिए।।सिध्धिओं के लिए संकल्प और बात है।।लेकिन ईश्वर को प्राप्त करने के लिए मनोरथ जरूरी है।।विश्वामित्र राम को प्राप्त करने के लिए संकल्प नहीं मनोरथ किया है।।किसी भी संकल्प में सूक्ष्म अहंकार की उद्घोषणा है,मनोरथ अहंकार मुक्त है।।विश्वामित्र और मनु शतरूपा संकल्प करते हैं कि मुझे राम जैसा पुत्र चाहिए।भरत जी ने भी चित्रकूट यात्रा में बहुत मनोरथकीये है। मूल तत्व ईश्वर तत्व को प्राप्त करना है उसे संकल्प नहीं वैष्णवी दीनता से भरा हुआ मनोरथ करना होगा।।मनोरथ करेंगे तो विघ्न जरूर आएंगे लेकिन क्रमशः सभी विघ्न टूट जाएंगे।।विभीषण राम के पास जाता है तो संकल्प करता है।।संकल्प सिद्ध पुरुषों महापुरुषों लेे।। विभीषण मनोरथ करता है। रामचरितमानस में प्रतिज्ञा,संकल्प,प्रण कितनी बार दिखाई उसकी पूरी यदि तुलसी जी ने लिखी है।। लेकिन सर्वप्रथम संकल्प तुलसी जी ने किया है कि कथा को भाषा बध्ध करना।। शास्त्र को समझने के लिए और एक शास्त्र है जिसे हम मिमांसा कहते हैं। रामचरितमानस को भाषा बध्ध करने का संकल्प किया।।शास्त्र को एझइट इस समझ में नहीं आता फिर शिव संकल्प,सती का संकल्प जन्म-जन्म मुझे शंकर मिले।विष्णु का संकल्प,स्वयंभू मनु का संकल्प गुरु त्याग करने का,विश्वामित्र का संकल्प, जनकपुर की स्त्रियों का संकल्प,सीता जी का संकल्प,अयोध्या वासियों का संकल्प,भरत जी का संकल्प,राम जी का संकल्प पृथ्वी को राक्षस विहीन करनी है।वाली का संकल्प।अंगद का संकल्प इतने संकल्प है।।

यह कोई पुस्तक नहीं है लेकिन तमाम शास्त्रों के निचोड़ से भरा हुआ तुलसी का मस्तक है।।संकल्प शब्द यहां चार बार लिखा है।।

संकल्प तीन के पूरे होते हैं:आयुर्वेद के पूरे ज्ञात हो ऐसे वैद्य का,दूसरा जो वेद स्वरूप है और तीसरा वेद पूरुष से उनका संकल्प पूरा होता है शिव विद्या पुरुष भी है,वैद्य स्वरूप भी है और वेदपुरुष भी है।। इसलिए उनके संकल्प परमात्मा को पूर्ण पूरे करने ही पड़े।।यहां लक्षण दिखाएं वह एक मंत्र बापू ने गान किया:

उरोरधितारखिल वैद्य: विद्य: पियुषपाणि:

कुशल: क्रियाषुगतस्पृहाधैर्यधर: दयालु:

शुध्धोधकारिनिषगीतदश: स्यात

पांडुरंग दादा ने अपने पुस्तक ‘व्यास विचार’ में एक प्रसंग लिखा है:रामपुर के नरेश का गला बैठ गया तब वैद्य ने केवल दवा दिखाकर,नींबू मंगाकर नींबू काटे और पूरा गला खुल गया।। वैसे कथा करना वह नींबू काटने का कर्म है जो हमारी रसग्रंथियों को जाग्रत करती है।।

अभी तक समाज साधु की परछाई तक ही पहुंचा है मूल साधु तक पहुंचा ही नहीं।।

जिसे तमाम विद्या गुरु मुख से गुरु आज्ञा से पाली हो ऐसे विद्याधर का संकल्प सिद्ध होता है।।जिनके हाथ पियूषपाणिहै।अमृतमयी है अपनी क्रिया में जो कुशल है,जिसे कोई स्पृहा अपेक्षा ना हो,जिसमे धीरज हो,कभी जन्मो जन्म की धीरज भी मांग लेती है।।जो दयालु है जो शुद्धाधिकारी है ऐसे लक्षण वाले विद्या पुरुष और वेद पुरुष का संकल्प सिद्ध होता है।।

शरीर को ध्यान में रखकर,मन को मजबूत करके, बुद्धि की स्थिरता और चित् को द्रवी भूत करके संकल्प सिद्ध हो सकते हैं।।

कथा प्रवाह में शिव चरित्र का गान करते हुए शिव और सती कुंभज के आश्रम में कथा श्रवण हेतु जाते हैै।।लौटते वक्त राम की नर लीला में सती को संशय होता है।।अकेली राम की परीक्षा करने जाती है,विफल रहती है।।राम अपना ऐश्वर्य दिखाते हैै।।सती शिव के पास जूठ बोलती है,पकडा जाती है और शिव मन ही मन प्रतिग्या कर के समाधि में बैठ जाते है ये संवाद हुआ।।श्रध्धा से ग्यान,विश्वास से भक्ति और भरोसे से भजन मिलता है।।

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