Homeगुजरातविषयों से विराग नहीं, विषयों के अति विलास से विराग होना चाहिए।।

विषयों से विराग नहीं, विषयों के अति विलास से विराग होना चाहिए।।

उसको जागा हुआ समझना जिसके जीवन में विषयों के विलास के प्रति विराग आ गया हो,विषयों से नहीं।।

कथा एक बार सुन लो,समझ में आए ना आए,फिर भी सुन लो!फिर मैं हूं और आप है!!”

नदी में गोता लगाए तो और कुछ हो ना हो लेकिन कम से कम भीगे तो जरूर होंगे।।

सात दशकों से गा रहा हूं,मुझे कहीं नहीं पहुंचना, केवल आपके मन तक पहुंचना है।।”

मां चाहती है बेटे के मन तक पहुंचे,बाप चाहता है बेटे के स्वभाव तक पहुंचे,लेकिन गुरु चाहता है, शिष्य के आखिरी कोने तक स्पर्श करें।।

पंच प्रयागों में से एक विष्णु प्रयाग की दिव्य देव भूमि पर चल रही रामकथा आज चौथे दिन में प्रवेश कर रही है तब आरंभ में वेदमंत्र का एक भाग का उच्चारण और गान किया जो विष्णु परक अर्थ देता है:

तद् विष्णु परंपदम् सदा पश्यन्ति

सूर्य:दिविचचतुराततम्

इतना भाग संवाद के रूप में ग्रंथ कृपा,गौरी शंकर कृपा और गुरुकृपा से कहते हुए बापू ने कहा जिसके पास चर्म चक्षु-आंख है वह सूर्य का दर्शन कर सकता है।लेकिन जिसके पास परमचक्षु-दिव्य चक्षु है वह इन आंखों से सूर्य के सूर्य को भी देख सकता है।पुराणों में विष्णु का बहुत महिमा गान हुआ है।वेदों में भी है।।परम विष्णु को देखने के लिए दिव्य दृष्टि चाहिए।यह दृष्टि वह दे सकता है जो हर प्रकार से जाग गया है। तुलसी जी लिखते हैं:

जानिअतबहि जीव जब जागा।

जब सब बिषयबिलासबिरागा।।

उसको जगा हुआ समझना जिसके जीवन में विषयों के विलास के प्रति विराग आ गया हो,विषयों से नहीं।।आंख का विषय है-दृष्टि।कान का विषय शब्द है।नाक का गंध,हाथ का स्पर्श और जीह्वा का विषय रस है इसीलिए रसना कहते हैं।।

विषयों से विराग नहीं,विषयों के अति विलास से विराग होना चाहिए।।आंख से जरूर देखें मगर इतना विलास से ना देखें।।

बापू ने यहां उड़िया बाबा की बात बताते हुए कहा कि वह विष्णुपद को पा गए थे। फिर भी विष्णु के कीर्तन में रस से बजाने में लीन हो जाते थे। सबको मंत्र देते थे तब विरोध भी हुआ था।।

उद्धव ने जब पूछा तब कृष्ण ने बताया है उद्धव! तुं भागवत कथा सुन!जो तुझे अव्यभिचारिणी भक्ति में ले जाएगी।। कथा एक बार सुन लो,समझ में आए ना आए,फिर भी सुन लो! फिर मैं हूं और आप है!! नदी में गोता लगाए तो और कुछ हो ना हो लेकिन कम से कम भीगे तो जरूर होंगे।।

भक्ति प्राप्त कैसे हो? मानस में भी भक्ति के साधन दिखाए हैं।।वक्ता श्रोता सहनाववतु,सहनोभुनक्तु,सह विर्यमकरवावहै- हो जाए एक तो एक दूसरे में द्वेष पैदा नहीं होने देंगे।। जब तक परस्पर मन तक नहीं पहुंचे तब तक सब नाकाम है।। जगत को नहीं लेकिन साथ-साथ पुरुषार्थ करके स्वयं को बदलने के लिए पुरुषार्थ करें।।

महाप्रभु जी कहते हैं वैष्णवों को चिंता नहीं करनी चाहिए लेकिन दूसरों की चिंता बढ़ानी भी नहीं चाहिए।।कभी-कभी हम दूसरों को चिंता में डाल देते हैं।।मैं सात दशकों से गा रहा हूं,मुझे कहीं नहीं पहुंचना,लेकिन केवल इतना ही कहता हूं आपके मन तक पहुंचना है।। मेरे श्रोताओं की तरफ मुझे बहुत ममता है इसीलिए बार-बार जन्म लेना है।। आपके घर में जो ठाकोर जी है उनकी नित्य सेवा करो वह भक्ति प्राप्त करने का एक उपाय है। कृष्ण कहते हैं मुझसे ज्यादा वैष्णव का सम्मान करें वह भक्ति प्राप्त करने का उपाय है।।

गुजराती गझल कार ‘गनी’ दहीं वाला की गजल दिवसों जुदाई ना जायछे….. विशेष रूप से बापू ने प्रस्तुत करके संवाद किया।।

मां चाहती है बेटे के मन तक पहुंचे,बाप चाहता है बेटे के स्वभाव तक पहुंचे,लेकिन गुरु चाहता है शिष्य के आखिरी कोने तक स्पर्श करें।। ऐसे परम विष्णु की चर्चा वेद करता है। विष्णुपद से भी गुरु पद ऊंचा है।।ऐसा विष्णु कौन है?तुलसी जी ने एक बिलग परिभाषा करते हुए लिखा है:

नील सरोरुह श्याम तरुण अरुण बारिज नयन।

करहूं सो मम उर धाम सदा छीर सागर सयन।।

यहां विष्णु पद के पांच लक्षण है: श्याम वर्ण नीलकमल की तरह यह विष्णु असंगता- ज्ञान प्रधानता है।।तरुण ताजा है वहां प्रेम प्रधानता है। अरुण-कमल है वह असंगताहै।निष्णु में श्रम प्रधानता है और विष्णु योग प्रधान और ज्ञान प्रधान भी है।।विष्णुपंचधर्मा है।।

तंत्र के बारे में बहूत लंबा प्श्न पूछा गया था वो उठाते हुए सभी तर्कबध्ध संवादी और बहूत लंबे और बिलकूल विवेक पूर्ण संवाद करते हुए बापु ने कंइ बातें बताइ फिर शिव चरित्र की पंक्ति को स्पर्श करने के बाद तुलसी जी ने चार घाटों का रूपक बताया और विधि-विध घाट में रामकथा का गान शुरू हुआ।। कर्म प्रधान घाट जहां याज्ञवल्क्य और भारद्वाज के बीच संवाद हो रहा है।।वहां राम कौन है और दशरथ के वहां जन्मे राम और वेदों में बताए हुए परम राम एक है कि बिलग है वह प्रश्न पूछा गया।।

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