Homeगुजरातप्रसादी की संपत्ति का आग्रह मुक्त संग्रह चोरी नहीं है।।

प्रसादी की संपत्ति का आग्रह मुक्त संग्रह चोरी नहीं है।।

विचारों का भी संग्रह मत करो।।

हृदय की पांच ग्रंथि अग्नि की उपासना से खुलती है।।

कोई भी मंत्र फेइल नहीं होता,लेकिन फैल जाता है!

ग्रंथ ग्रंथकार और ग्रंथ गायक का अपमान नहीं करना।।

संपत्ति का आग्रह मुक्त संग्रह चोरी नहीं है।

बापू ने कल जो निवेदन किया था उन पर बोलते हुए रामकथा के तीसरे दिन मनोरथीदर्डा परिवार की ओर से प्रश्न आया था कि बापू आप यज्ञ के पास, अग्नि के पास क्यों बैठते हैं-उन पर बोलते हुए बापू ने कहा कि अग्नि कुंड के पास बैठना अच्छा है। क्योंकि यज्ञ अग्नि प्रकाश देता है,ऊर्जा देता है,तेज देता है।।शिष्य को ज्ञान के लिए संक्रामक बनता है अग्नि बहुत जरूरी है।।क्योंकि अग्नि पात्र है। जैसे किसी के पास खाने के लिए पात्र होता है।।किसी के पास लकड़ी का पात्र होता है।लकड़ी में भी अग्नि होता है। किसी के पास पत्तों का पात्र होता है।।मुख का भी पात्र होता है।और हमारे करपात्री जी महाराज जहां केवल कर-हाथ ही पात्र था।।वैसे अग्नि भी एक पात्र है।। अग्नि से अग्नि की ज्योत ज्वाला ज्यादा पावक ज्यादा पवित्र होती है।।नर से नारी ज्यादा सुंदर होती है।।समुद्र से नदी ज्यादा सुंदर होती है।। वेद का पहला शब्द ब्रह्म भी अग्नि आया है।। यह कहते हुए बापू ने कहा कि संपत्ति का आग्रह पूर्वक संग्रह ही चोरी है।।

संपत्ति हमें तीन प्रकार से मिलती है:अपने कर्मों से अपनी पीढ़ी से आई हुई, दूसरी हम ने पाइ,हुई कमाई हुई संपत्ति और तीसरी किसी बुद्धपुरुष की कृपा से मिली हुई संपत्ति।।उसकीप्रसादी के रूप में मिली है।। प्रसादी की संपत्ति का आग्रह मुक्त संग्रह चोरी नहीं है।।

परिग्रह के बारे में भी बापू ने अपने विचार कहे बापू ने कहा कि किसी का संग्रह मत करो।संपत्ति का भी नहीं,व्यक्तियों का भी नहीं,वस्तुओं का भी नहि,विचारों का भी संग्रह मत करो।।

विनोबा जी के पास गांधी जी का पत्र आया तो पढ़ कर विनोबा जी ने फाड़ दिया।पूछा गया कि क्यों फाड़ दिया! विनोबा जी ने कहा कि बापू ने यहां लिखा है आप महात्मा है। तो फिर भी क्यों फाड़ दिया?क्योंकि मेरे लिए यह कोई काम का नहीं, यह सराहना कभी ना कभी मुझे अभिमान प्रदान करेगी आज बापू ने वेद का एक मंत्र गान किया जहां लिखा है हृदय की पांच ग्रंथि अग्नि की उपासना से खुलती है। हृदय में पांच ग्रंथि होती है। महावीर की सब ग्रंथि छूट गई और निर्ग्रंथ बन गए।।

अभी पालीताणा में अगले साल मानस नवकार मंत्र पर भी कथा करनी है।।उपनिषद का मंत्र है:

मन आदिश्वच प्राण आदिश्वच

इच्छा आदिश्वचसत्वादुश्वचपूण्यादिश्वच

यह पांच ग्रंथि है।।

कोई भी मंत्र फेइल नहीं होता,लेकिन फैल जाता है!! ग्रंथ ग्रंथकार और ग्रंथ गायक का अपमान नहीं करना।।

इस मंत्र में कहा है मन सबसे बड़ी ग्रंथि है।।अग्नि की उपासना से मन का आग्रह छूट जाता है।। प्राण भी ग्रंथि है। इच्छा भी ग्रंथि है।। परमात्मा हमारी जरूरत पूरी करता है,इच्छा नहीं।। सत्व आदि गुण भी ग्रंथि है।।गुण का अर्थ ही बंधन है।। पूण्य भी ग्रंथि है।।

रामचरितमानस में 36 बार माता-पिता शब्द आया है।।

एक बार के कुंभ में भरद्वाज जी ने याग्यवल्क्य से राम के बारे में पूछा।।तबयाग्यवल्क्य जी ने पार्वति का अवतरण और नामकरण के बाद कहा कि रामकथा को सुनने से पहले शिवचरित्र सुनो।।

पूरा शिव चरित्र और शिवविवाह का गान हुआ।।

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