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लौकिक व्यक्ति की वाणी अर्थ के पीछे दौड़ती है और अलौकिक लोग की वाणी के पीछे अर्थ दौड़ता है।।

इस जगत में किसकी उन्नति होती है?जो विनीत है।।

दर्प अहंकार युक्त मनोदशा त्याज्य है।।

मनुष्य के शरीर में सबसे महत्व की वस्तु कौन है?:आरोग्य।।

किसकी वाणी अमोघ होती है?:जिसकी जुबान में सत्य ही निकलता हो,जो बहुत मौन रहता है और जो भीतर से शांत है।।

जगत सावधान हो कि ना हो साधु को सावधान रहना चाहिए।।

वस्तु,वसु,व्यक्ति और विचारों का भी संग्रह करना वह अधिक परिग्रह है।

रामचरितमानस पारस है,मानस से जो जुड़ जाए वह सोने का बन जाएगा।।

प्रेम परिपक्व होता है तब वैराग्य प्रकट होता है।।

विध-विध देवताओं की चेतनाओं से भरी शृंगीरिषि आश्रम की भूमि लखीसराय में आयोजित रामकथा के आंठवे दिन एक मंत्र से आरंभ करते हुए बताया कि यह मंत्र में कही गई सभी बातें श्रृंगी को लागू पडती हैं।।

श्रृंगी का दर्शन करवाते हुए उत्तर रामचरित में महाकवि भवभूति ने लिखा है: लौकिक व्यक्ति की वाणी अर्थ के पीछे दौड़ती है और अलौकिक लोग की वाणी के पीछे अर्थ दौड़ता है।।आज बड़ों बड़ों की जीभ दो-दो पैसों में बिक जाती है! क्यों हमारे शब्दों में तेज नहीं दिखता! असर नहीं होता! शंकराचार्य को पूछा गया कि इस जगत में किसकी उन्नति होती है?जवाब मिला जो विनीत है।।और दर्प अहंकार युक्त मनोदशा त्याज्य है।। मनुष्य के शरीर में सबसे महत्व की वस्तु कौन है?शंकराचार्य जी कहते हैं:आरोग्य।। किसकी वाणी अमोघ होती है? जवाब मिला जिसकी जुबान में सत्य ही निकलता हो,जो बहुत मौन रहता है और जो भीतर से शांत है वह अमोघ है।।समुद्र बहुत गहराई में कोई तरंग गीत नहीं समुद्र की सतह पर तरंग दिखते हैं।।जो साधु समशिला: यानी की बहुत शांत है वह अमोघ है।। हम आचार में शांत है लेकिन विचार में शांत नहीं। जगत सावधान हो कि ना हो साधु को सावधान रहना चाहिए।।

बापू ने और अपरिग्रह के बारे में अपने प्रवचन को याद करते हुए बताया कि ज्यादा व्यक्तियों से घिरे रहना वो परिग्रह है।। इसलिए भीड़ आदमी की तपस्या को जला देती है।। वस्तु,वसु,व्यक्ति और विचारों का भी संग्रह करना वह अधिक परिग्रह है। मैं तो सात पीढी तक का संग्रह करने के लिए भी कहता हूं।। अलौकिक वाणी के पीछे अर्थ दौड़ता है जो अलौकिक है उनके पीछे समृद्धि दौड़ती है।। श्रृंगी अलौकिक है।।भवभूति कहते हैं श्रृंगी दशरथ का जमाई है शांता दशरथ की बेटी है।। श्रृंगी का देह हिरण का है और हिरण मृग से रामचरितमानस बहुत जुड़ा है।। मारिच को क्यों मृग बनाया? रामचरितमानस पारस है,मानस से जो जुड़ जाए वह सोने का बन जाएगा।।मारिच सोने का मृग बना है मृग की विशेषताओं में हिरण को संगीत बहुत प्रिय है।।मृग की नाभि में कस्तूरी होती है फिर भी वह खोजता है और बापू ने बताया कि मृग कस्तूरी की सुगंध फैलाने के लिए घूमते रहता है।

जो श्लोक वेद से निकाला गया वह:

निष्कलं निष्क्रीयं शांतम् निर्वध्यं निरंजनं

अमृतस्य परंसेतु दग्धइंधनइव अनलं

यह मंत्र के जो सूत्र है वह श्रृंगी का परिचय है। श्रृंगी निष्कल कोई कला नहीं जानते। केवल श्रवण की कला है।। निष्क्रिय है।।शृंगी शांत है और अनिंदित है। कोई निंदा नहीं करते।। बिल्कुल निष्प्रुही है।। अमृत का परम सेतु इसने निर्माण किया है। जो लकड़ी जल चुकी है ऐसे तेजस्वी अग्नि के स्वरूप शृंगी है।वैराग्य का गर्भ प्रेम है,प्रेम परिपक्व होता है तब वैराग्य प्रकट होता है।। प्रेम से परमात्मा भी प्रगट होता है।।

और अरण्य कांड में परमात्मा चित्रकूट से स्थानांतर करके अत्री के आश्रम आए।अनसूया और अत्री को मिलकर सरभंग और सुतीक्ष्ण को मिले। विराध का वध करके कुंभज से मार्गदर्शन पा कर गोदावरी के पास पंचवटी में मुकाम किया।। और फिर अति संक्षिप्त में किष्किंधा कांड सुंदरकांड और लंका कांड के प्रसंग को लेकर लंका के सागर के किनारे सेतु बंध रामेश्वर की राम ने स्थापना की वहां आज कथा को विराम दिया गया।।

कल इस कथा का विराम का दिन है और कथा सुबह 7:00 बजे शुरू होगी।।

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