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बिहार की कथा का भावपूर्ण समापन, ९७१वी कथा १७ जनवरी से राजधानी दिल्ही से, विषय रहेगा: मानस सनातन।।

ऋषि के पास वाणी होती है,मुनि के पास मौन होता है।।

नवनिर्मित शृंगी धाम के लिये शृंगी रिषि की प्रतिमा का बापु के शुध्धहस्तों से प्रतितात्मक अनावरण हुआ।।

देश को साधुओं की बहुत जरूरत है।।

युवा साधुओं को गुरु परंपरा निभाते हुए बाध्यता ना बने ऐसे भजन के लिए अपना एक स्वतंत्र स्थान बना लेना चाहिए।।

मुनियों का मौन गहन सागर जैसा है,बोले तो नादब्रह्म छूटे।।

बापु ने धाम की छोटी सी सूत्रात्मक परिभाषा की।।

सृंगीरिषिहिबसिष्ठबोलावा । पुत्रकामसुभजग्यकरावा ॥

भगति सहित मुनि आहुति दीन्हें । प्रगटेअगिनिचरू कर लीन्हें ॥

जो बसिष्ठकछुहृदयँबिचारा । सकल काजु भा सिद्ध तुम्हारा ॥

बालकाण्ड – दोहा १८९

आरंभ में इस पंक्तियों का गायन करने के बाद तपोभूमि को प्रणाम करते हुए समग्र व्यवस्था की और अपनी प्रसन्नता रखते हुए बापू ने उपमुख्यमंत्री, डीएम साहब,यहां की जनता,स्वयंसेवक को पत्रकारों और सभी को साधुवाद दिया और कहा कि कहने को बहुत मन करता है।।

जिन पंक्तियों का आश्रय किया वहां वशिष्ठ ने श्रृंगी को बुलाया।पुत्र कामना यज्ञ करवाया।भक्ति सहित आहुतियां डाली गई और अग्नि देव खीर लेकर प्रसाद लेकर प्रगटे।।

ऋषि के पास वाणी होती है,मुनि के पास मौन होता है।। बहुधा ऋषि गृहस्थी होते हैं।नगर में नहीं थोड़े दूर अपना गुरुकुल बनाकर रहते हैं-जैसे वशिष्ठ रहते हैं।देश को साधुओं की बहुत जरूरत है।।युवा साधुओं को गुरु परंपरा निभाते हुए बाध्यता ना बने ऐसे भजन के लिए अपना एक स्वतंत्र स्थान बना लेना चाहिए।।कोईस्थानक वासी भी न बने संस्थान वासी भी ना बने।।क्योंकि वहां स्वतंत्रता नहीं रहती अपने भजन के लिए,भारतीय संस्कृति की साधना के लिए अपनी व्यवस्था करें।।श्रृंगी ऐसे दूर बैठे हैं वीणा,सितार,तंतु वाद्य,दिलरुबा,वायोलिन,सारंगी सभी के तार मृग के सिंग के अंदर निकलते हुए एक खास प्रकार के पदार्थ के द्वारा ही बजाए जाते हैं।। इसलिए शृंगी संगीत से जुड़ा हुआ है।।जो गुरु बिल्कुल स्वतंत्रता दे उसके नीचे रहकर साधना करें ऋषि की व्याख्या है वैसे मुनियों का मौन गहन सागर जैसा है,बोले तो नादब्रह्म छूटे।। ऋषि ऊर्धवरेता ब्रह्मचारी होता है। लौकिक लोग जो ब्रह्मचर्य की व्याख्या करते हैं उनसे अलग संयम जहां हाथ में कमंडल और दंड होता है।।जिसके जीवन की प्रधानता तप है।चारों ओर से देखो फिर किसी के पैर पकड़ो,और एक बार जब पैर पकड़ो तो सजदे में सर झुकाया तो उठाना हराम है! हनुमान जी ने राम को देखकर परिचय लिया और बाद में पेर पड़े हैं।जल्दी मत करो! हम जल्दी चरण भी पकड़ लेते हैं और अपमान भी करते हैं।।निश्चय पूर्वक संयम निभाता है उसे उर्दव रहता ब्रह्मचारी कहते हैं।।साधना में भोजन की बहुत असर होती है शायद कोई भूल करे तो श्राप भी दे और समर्थ ऐसा है कि श्राप को अनुग्रह में परिवर्तन भी करें,उसे मुनि कहते हैं।। सत्य की जो साधना करता हो।सत्य के ऊपर सद्गुरु है।कबीर कहते हैं सत साहेब। तप करते-करते पाप का अंश भी नहीं रहता है।। वेद और वेदांत का तत्व जो जानता है उसे ऋषि कहते हैं और ऐसे ऋषि श्रृंगी है।।

जब नायब मुख्यमंत्री,डीएम साहब,यहां की जनता अशोक धाम और सब मिलकर श्रृंगी धाम बनाने जा रहे हैं तब धाम की एक परिभाषा बापू ने अपनी ओर से कहते हुए कहा: धाम किस कहे?पांच प्रकार का ध और पांच प्रकार का म हो और बापू ने कहा कि विनय करके जाउं यहां जो धाम बने वह ऐसा बने पांच प्रकार के ध:

१-धान्य हो:दर्शन करने आये उसे रोटी मिलनी चाहिए।२-ध्यान लग जाए।३-धन्यता का बोध होने लगे।४-धारक भूमि हो:यहां सीता को भूमि ने धारण किया है।५-उद्यान हो।।पांच प्रकार के म:

१-मंत्र होना चाहिए:यहां पूरा अथर्ववेद है।।२-मंत्र का मनन हो।।३-मंत्र का मंथन हो:हल चला कर जनक ने मंथन किया है।।४-मौन हो।५-आप कहो तो मारुति की मूर्ति हम भेज देंगे-जहां मारुति हो।। धाम की छोटी सी सूत्रात्मक यह परिभाषा है।।

आज केंद्रीय मंत्री,नायब मुख्यमंत्री,डीएम साहब इस धाम को सुंदर रूप देने जा रहे हैं तब कथा के आखिर में उपमुख्यमंत्री और ट्रस्टी गण के हाथों श्रृंगी ऋषि की मूर्ति का अनावरण बापू के शुद्ध हस्तों से किया गया।।यहांश्रृंगी उत्सव आज से शुरू होता है।जहां सात महोत्सव और पंच उत्सव होता है रामेश्वर की स्थापना में राम का ईश्वर कौन?राम का ईश्वर शिव ही है।।लेकिन राम का पूज्य वह है जो सेतुबंध करें,जो समाज को जोड़े। रामेश्वर की स्थापना के बाद भगवान सहित सेना ने लंका में प्रवेश किया।।सुबेल पर्वत पर डेरा डाला।अंगद की संधि विफल रही।घमासान युद्ध के बाद ३१ बाण चढ़ाकर पहले और आखरी बार राम कहां है कह कर रावण गिरा।रावण का तेज राम में विलीन हुआ पुष्पक आरूढ़ होकर अयोध्या पहुंचे।।वशिष्ठ ने राम के भाल पर राजतिलक किया।।

फिर भूसुंडी चरित्र और गरुड़ के सात प्रश्न के बाद चारों घाट पर कथा को विराम दिया गया।।यहां भी बापू ने कथा को विराम देते हुए सुफलश्रृंगी ऋषि के चरणों में अर्पण किया और मूर्ति का अनावरण करने के बाद कथा को विराम दिया गया।।

अगली-९७१वीं रामकथा जो प्रसिध्धजैनाचार्य लोकेश मुनिजी की अध्यक्षता एवं बहुविध प्रकल्पों से भरी कथा,मानस सनातन विषय पर अगले शनिवार १७ जनवरी से विराट पयमाने पर होने जा रही है।।

इस कथा का जीवंत प्रसारण आस्था टीवी चेनलएवचित्रकूटधामतलगाजरडायु-ट्युब के माध्यम से नियत नियमित समय पर होगा।।

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