
पहुंचे हुए बुद्ध पुरुष के पदचिन्ह पर चलने से ही परमात्मा का साक्षात्कार होता है।
-परमात्मा साधक का समर्पण, सदाचार और संयम को देखकर प्रसन्न होते हैं।
भक्ति में बालक जैसी निर्मलता आ जाए तो भगवान तुरन्त खिंचे चले आएंगे।
“मानस सिन्दूर” राम कथा के आज के छठे दिन के संवाद के आरंभ में एक श्रोता की जिज्ञासा के उत्तर में पूज्य बापू ने कहा कि मंत्र जप से सिद्धि मिलती है, लेकिन सिद्धि से भी अधिक महत्वपूर्ण शुद्धि है!
जप करते समय यदि आंतरिक ऊर्जा ऊपर उठने लगे तो उस समय सद्गुरु का स्मरण करना चाहिए। क्योंकि गुरु के पास ऊर्जा तत्व की स्विच होती है, जो उर्जा को नियंत्रित कर सकती है! किसी भी मंत्र की साधना के लिए गुरु की आवश्यकता होती है। जप करते समय जब रोमांच पैदा हो, शरीर पुलकित हो जायें, आंखों से आंसू बहने लगें, तो यह साधक के लिए शुभ संकेत है। जब माला हाथ में रुक जाए और देह भान भूल जाएं, तो यह बहुत उच्च अवस्था मानी जाती है। कथा संवाद में आगे बढ़ते हुए पूज्य बापू ने विष्णुगिरि दादाजी के एक सूत्र के संदर्भ में चार बातें समजाई।
एक, किसी व्यक्ति के प्रति असीम मोह हो, तो काम प्रकट होता है।
दो, किसी वस्तु के प्रति मोह बढ़ जाए, तो क्रोध उत्पन्न होता है। तीन, धन के प्रति मोह बढ़ जाए तो लोभ उत्पन्न होता है।
चार, स्थान के प्रति मोह बढ़ने से अहंकार उत्पन्न होता है।
बापू ने सिंदूर-दर्शन के संदर्भ में कबीरजी के पद का अर्थ समझाया। कबीरजी स्वयं को रामजी की दुल्हनियासमजते हुए कहते हैं –
“हे सखियों! मेरे विवाह में मंगल गीत गाओ, क्योंकि राजा राम मेरे पति बनकर आए हैं! भगवान राम मेरे पति बन रहे हैं, इसलिए मैं मदमाती हो गई हूँ। अपने शरीर को रस पूर्ण सरोवर बनाकर मैंने उसे अपनी विवाह वेदी बना लिया है। ब्रह्माजी मंगल मंत्र गा रहे हैं। मैं धन्यभागी हूँ कि राम के साथ मंगल फेरे ले रही हूँ। इस विवाह में तैंतीस करोड़ देवता और अट्ठासी हजार ऋषि बाराती बनकर आए हैं। मेरा विवाह एक अविनाशी पुरुष से हो रहा है!”
कबीरजी के पद के मधुर रसदर्शन के साथ हरिनाम संकीर्तन की महिमा समझाते हुए बापू ने कहा कि
“कलियुग में परमात्मा को पाने का सफल, सहज और सरल साधन हरि नाम है। नाम ही आहार है। इसे खूब खाओ, खूब पियो! पलों का आनंद लो, अवसर आया है, तो इसका आनंद लो। यदि हरि नाम स्मरण का अभ्यास नहीं है, तो अंत में राम नाम नहीं आयेगा। इसलिए अभी से राम का स्मरण करो। कथा के क्रम में प्रवेश करते हुए पूज्य बापू ने जनकपुर में राम और लक्ष्मण की नगरचर्या का विस्तार से वर्णन किया। रामजी का लक्ष्मण के साथ जनकपुर में नगर दर्शन के लिए जाने का कारण बताते हुए बापू ने कहा, “यदि आप जीव की दृष्टि से दुनिया को देखेंगे तो आप उसमें भटके जा सकते हो। लेकिन यदि आप बुद्ध पुरुष की दृष्टि से जगत को देखोगे तो जगत हराभरा दिखने लगता है। जब भक्ति में बच्चे की निर्मलता आ जाती हैं, तब परमात्मा भक्त की ओर खिंचे चले आते हैं। ज्ञान का महत्व अवश्य है, लेकिन परमात्मा का मूल परिचय भक्ति द्वारा अधिक सरलता से हो सकता है।
नगर भ्रमण के बाद राम और लक्ष्मण सांयकाल को अपने निवास पर पहुंचते हैं और रात्रि में विश्राम से पहले गुरु विश्वामित्रजी की चरण सेवा करते हैं।
अगले दिन जनकपुर की पुष्प वाटिका में सीता और राम के पूर्व राग का रसपूर्ण और मर्यादा पूर्ण वर्णन करते हुए पूज्य बापू ने सीता और राम की प्रथम भेंट का शब्द चित्र रचा। इस प्रसंग के संदर्भ में बापू ने कहा,
“परमात्मा के दर्शन किया हो, ऐसा बुद्ध पुरुष ही हमें परमात्मा का साक्षात्कार करा सकता है। शर्त केवल इतनी है कि साधक बुद्धपुरुष के पदचिह्नों पर चले। बापू ने कहा कि सीता के पैरों की पायल, कमर की कटी मेखला और हाथों की चूड़ियां राम को आकर्षित करती हैं। इसका तत्वार्थ समझाते हुए बापू ने कहा,
“नूपुर सदाचरण, कटी मेखला संयम और कंगन समर्पण का प्रतिक हैं। जब भगवान साधक में सदाचार, संयम और समर्पण को देखते हैं, तो वे प्रसन्न होते हैं। किशोरीजी उनके नेत्रों के द्वार से राम के रूप को अंतर में उतारकर ध्यानस्थ हो जाती हैं ,और भगवान राम अपने मन के कैनवास पर किशोरीजी का चित्र अंकित करते हैं। केवल विवाह विधि बाकी रही है, मिलन तो हो चुका है। तत्वत: सीताराम एक हैं – अविभाज्य। यह तो भगवान की लीला है। भगवान का नाम, रूप, लीला और धाम – भक्तिमार्ग में इन चारों की महिमा है।
यह सीताराम का पूर्व राग है, जिसका वर्णन तुलसीदासजी ने रामचरित मानस में किया है। सीताजी यहां प्रकृति के प्रत्येक अंग को माध्यम बनाकर राम को देखती हैं, यह दिव्य दर्शन है। उसके बाद जानकीजी मां भवानी की स्तुति करती हैं। भवानी की मूर्ति बोलती है, मुस्कुराती है और सीताजी को माला पहनाती है। यह घटना भले ही बुद्दिगम्य न लगे, लेकिन आध्यात्मिक दृष्टि से यहां पर सब कुछ संभव है।
राम और सीता के इस दिव्य मिलन के दर्शन के साथ पूज्य बापू ने आज की कथा संवाद को विराम दिया।
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रत्न कणिका
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(१) जो मन से लिया जाता है, वह व्रत है और जो आत्मा से लिया जाता है वह महा व्रत है।
—रमण महर्षि
(2) वेश से साधु होने से बेहतर है, वृत्ति के साधु हो।
— आचार्य चित्रभानुजी
(३) मोह सभी रोगों का मूल है।
—विष्णुदेवानंदगिरि दादाजी
(४) आकांक्षा मत करो, अभीप्सा
करो। — महर्षि अरविंद।
(५) शिष्टाचार से ज्यादा
महत्वपूर्ण ईष्टाचार है।
—- मोरारीबापू
बॉक्स आइटम – 2
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उत्तर रामचरित में भवभूतिजी द्वारा बताए गए साधु के लक्षण:
(१) साधु प्राय: सभी को प्रिय लगता है।
(२) साधु बहुत विनम्र होता है।
(३) साधु मधुरभाषी होता है – वह कटु शब्द नहीं बोलता।
(४) साधु की प्रकृति विश्व कल्याण के लिए होती है।
(५) साधु का रहस्य असीम – अनवधि होता है।
(६)) साधु का जीवन विशुद्ध होता है।

