
– किसी भी विपत्ति को बिना प्रतिकार किये सहन कर लेना तितिक्षा है।
– यदि कोई भक्ति मार्ग में प्रवेश करता है, तो वह जीता है, लेकिन जीना मुश्किल हो जाता है।
– यदि कोई मन, कर्म और वचन में होशियारी का त्याग करता है, तो वह श्री हनुमानजी की कृपा का पात्र बन जाता है।
मानस सिंदूर संवाद के सातवें दिन में प्रवेश करते हुए, बापू ने श्रोता की जिज्ञासा को शांत करने के लिए कहा कि श्री हनुमानजी केवल राम के कार्य के लिए पृथ्वी पर आए हैं। हनुमानजी हमारे जीवन के दुर्गम कार्य नहीं करेंगे।
हनुमानजी केवल राम कार्य करते हैं, हमारा हर कार्य हनुमानजी के अनुग्रह से ही आसान हो जाता है! यदि श्री हनुमानजी का अनुग्रह हो जाय, तो हमारा असंभव कार्य भी सुगम हो जाएगा!। जो साधक मन, कर्म और वाणी की होशियारी को त्याग देता है, वह हनुमानजी की कृपा का पात्र बन जाता है।
इस अवसर पर पूज्य बापू ने एक और प्रसंग सुनाया, जो मानस के गुरुमुखी रहस्य को उजागर करता है।। जब हनुमानजी उग्र हो जाते हैं, तो भगवान राम उन्हें गले लगाते हैं और शांत करते हुए कहते हैं – “हनुमान! तुम्हें प्रकृति के ११ तत्वों को शांत करना है। अंतरिक्ष, स्वर्ग, पृथ्वी, जल, वायु, वनस्पति , ओषधि, सभी देवता, ब्रह्म, सभी स्थान और स्वयं मंत्रजाप करनेवाला – इन ११ तत्वों को शांत करके तुम्हें शांति को भी शांत करना है!”
इन ११ तत्वों के अलावा, हम शांति मंत्र के अंत में भी तीन बार शांति शब्द का उच्चारण करते हैं। इस शांति मंत्र में शांति के लिए कुल १४ तत्व हैं। उन १४ प्रकार की शांति के लिए भगवान राम ने १४ वर्ष का वनवास भोगा!
कथा का महत्व बताते हुए पूज्य बापू ने कहा कि आज कथा विश्व परिवर्तन का एक बहुत सशक्त माध्यम बन रही है। आबाल वृद्ध- हर कोई कथा में रुचि लेते हैं। कथा श्रोता की माँग में सिंदूर भर देती है!
बुद्ध पुरुष का दर्शन, वचन और निषकपट स्मित – आश्रित को सिंदूर दान करते है, उसे सुहागी बनाते है!
जब कोई योगी धूने की भस्म देता है, तो वह सिंदूर दान है! जब कोई जैन मुनि सिर पर वासक्षेप छिड़कता है, तो वह भी सिंदूर दान है!
बापू ने कहा कि शास्त्रों में ब्रह्म के चार अर्थ हैं – परमात्मा, ब्रह्मांड, वेद और प्रकृति। रावण के अत्याचार से ब्रह्म बेचैन है, रावण ने वेदज्ञों को देश से निकाल दिया है, इसीलिए वेद अशांत हैं। माता जानकी प्रकृति हैं। अशोक वाटिका में बैठी जानकी भी अशांत हैं। रावण का पूरे ब्रह्मांड पर नियंत्रण है, इसलिए ब्रह्मांड अशांत है। इस अशांति को शांत करने के लिए भगवान राम प्रकट हुए हैं। कथामृत, वचनामृत, श्रवणामृत से शांति मिलती है।
आज पूज्य बापू ने श्री हनुमानजी और भगवान शिवजी के बीच समानताओं का वर्णन करते हुए एक दर्शन प्रस्तुत किया।
तत्व: शिव ही हनुमान हैं और हनुमान स्वयं शिव हैं। हनुमानजी को “शंकर सुवन” कहा जाता है, लेकिन कुछ संत उन्हें “शंकर स्वयं” कहते हैं!
श्री हनुमानजी अपने शरीर पर सिंदूर लगाते हैं, जबकि भगवान शिव अपने शरीर पर भस्म लगाते हैं। सिंदूर समर्पण का प्रतीक है, भस्म निर्वाण का प्रतीक है।
श्री हनुमानजी और शिवजी में ये अंतर हैं।
(१) हनुमानजी के पास पूंछ (ममता) है, जबकि शिवजी के पास मूंछ (समष्टि का अहंकार) है।
(२) शिवजी के सिर पर राम के चरणों से निकली गंगा है, जबकि हनुमानजी के सिर पर राम का हाथ है।
(३) शिवजी रामकथा के वक्ता है, हनुमानजी रामकथा के श्रोता है।
(४) भगवान शंकर अजन्मे है,
श्री हनुमानजी अजरामर है।
(५) हनुमानजी (संकट) विमोचन है, शिव त्रिलोचन है।
(६) हनुमानजी के पास कक्षा है, शिवजी के पास कैलाश है।
(७) हनुमानजी पशु है, शिवजी पशु पति है।
(८) हनुमानजी राम काम करते है, शिवजी राम नाम जपते है।
(९) हनुमानजी सेवक है,
शिव स्वामी है।
(१०) हनुमानजी साक्षात्कारी है, शिवजी चमत्कारी है।
(११) जहां हनुमानजी होते है, वहां भूतपिशाच नहीं आते, जबकि शिवजी के साथ भूतपिशाच निवास करते है।
सिंदूर और भस्म में अंतर बताते हुए बापू ने कहा-
सिंदूर रक्तवर्णी होता है, भस्म श्वेत वर्णी होता है।
सिंदूर पूर्णता लाता है, भस्म शून्य बनाता है।
सिंदूर मिलन का प्रतीक है, भस्म वियोग का प्रतीक है।
सिंदूर संपदा का प्रतीक है, भस्म विपत्ति का प्रतीक है।
सिंदूर दिव्य है, भस्म सेव्य है।
कथा के क्रम में प्रवेश करते हुए पूज्य बापू ने पुष्प वाटिका के प्रसंग का आध्यात्मिक अर्थ बताते हुए कहा कि पुष्प वाटिका में जाना साधक के लिए संतों की सभा में जाने का रूपक है। जब मां जानकी पुष्प वाटिका में जाती हैं, तो सबसे पहले वे सरोवर में स्नान करती हैं। साधक के लिए सरोवर-स्नान साधु संग- सत्संग है। सत्संग करके साधक को साधु के निर्मल हृदय में स्थान बनाना होता है। फिर सीताजी माता भवानी के पास जाती हैं। अर्थात सत्संग करके पवित्र हुआ साधक ही श्रद्धा के सन्मुख जा सकता है। और फिर यदि वह श्रद्धा की स्तुति करेगा तो उसे गुरु मिलेगा, जो उसे राम के दर्शन करवाएगा।
फिर धनुष्य यज्ञ के प्रसंग में बापू ने सात्विक-तात्त्विक संवाद करते हुए कहा कि धनुष्य अहंकार है। पतन निकट होने पर व्यक्ति विवेक खो देता है। अहंकार टूटने पर ही भक्ति प्राप्त होती है। पूज्य बापू ने धनुष टूटने का प्रसंग रोचक और रसप्रद ढंग से सुनाते हुए श्रोताओं को कथा में लीन कर दिया। भगवान राम ने धनुष तोड़ा, उसके अनेक अर्थ समझाए और माता सीता को भगवान जय माला पहनाई, इस प्रसंग में बापू ने कहा कि जब भगवान भक्ति से हार जाते हैं, वही भगवान की शोभा होती है। फिर परशुरामजी का आगमन, परशुरामजी का लक्ष्मणजी और भगवान राम से संवाद और अंत में पूर्णावतार के आगमन को स्वीकार कर महेंद्रगिरि की ओर प्रस्थान, जनकपुर में जनकराज की चार पुत्रियों के साथ दशरथजी के चारों पुत्रों का विवाह, कन्या विदाई का करुण चित्रण, सभी का अयोध्या वापस लौटना और फिर ऋषि विश्वामित्रजी की विदाई के साथ बालकांड का समापन कर के पूज्य बापू ने आज के कथा संवाद को विराम दिया।
बॉक्स आइटम
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जगतगुरु शंकराचार्यजी का दर्शन प्रस्तुत करते हुए पूज्य बापू ने कहा – “कर्म मार्गी के लिए दो शब्द महत्वपूर्ण हैं – कक्षा औरूव रक्षा। ज्ञान मार्गी के लिए दो शब्द महत्वपूर्ण हैं – समीक्षा और प्ररीक्षा। भक्ति के मार्ग पर चलने वाले के लिए दो शब्द महत्वपूर्ण हैं – तितिक्षा और प्रतीक्षा। जो लोग भक्ति मार्ग (प्रेम मार्ग) में प्रवेश करते हैं, वे जीते तो हैं, पर जीवन कठिन हो जाता है! तितिक्षा भक्ति के मार्ग का एक बहुत ही महत्वपूर्ण तत्व है।
“यदि कोई विपत्ति आती है, तो उसे बिना प्रतिकार किये सहन करना तितिक्षा है।”
दुःख को अतिथि मानकर उसका स्वागत करना। चिंता और विलाप को त्याग देना और विपत्ति को स्वीकार करना, यही तितिक्षा है।
रत्ना कणिका
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– संसार दु:खालय है। सुख और दु:ख सापेक्ष हैं।
– तुम मुझे नव दिन दो, मैं तुम्हें नव जीवन दूंगा।
– उम्र बढने से ऊर्जा कम होती जाती है, लेकिन तुम्हारा उत्साह बढ़ता जाता है।
– किसी भी विकार को कृष्ण के साथ जोड़ देने से विकार दिक्षित हो जायेगा।
– मुक्ति के बाद जन्म नहीं होता, निर्वाण प्राप्त करने वाला जब चाहे जन्म ले सकता है।
– राम का कार्य हनुमानजी स्वयं सक्रिय होकर पूरा करते हैं, हमारा कार्य श्री हनुमानजी के अनुग्रह से पूरा होता है।
– बुद्धपुरुष के दर्शन, वचन और मुस्कान आश्रित को सुहागी बना देते हैं।
– जब पतन निकट होता है, तो विवेक खो जाता है।
– यदि व्यक्ति की वाणी में शील है, तो दूसरा व्यक्ति चाहे कितना भी बलवान क्यों न हो, वह शरणागत हो जाता है।

