
मोम्बासा-केन्या में ९६१वीं रामकथा का सहर्ष आरंभ।।
संपन्न आदमी प्रपंन्न ना बने तब तक प्रसन्न नहीं रह सकता।।
श्रावण का महीना पूरा श्रवण का महीना है।।
मेरा ही भरोसा करके जो सभी आधार छोड़कर मेरा भजन करता है मैं उसकी रक्षा करता हूं:राम
रामकथा पुरुषत्व प्रदान करती है,जीने का हौसला देती है।
जीने के लिए बल कथा ही देती है।।
शब्द ब्रह्म है अशब्द पर ब्रह्म है।।
मौन परब्रह्म है मौन पर ब्रह्म का प्रतीक है।।
मौन व्रत नहीं विभूति है।।
श्रद्धा से ज्ञान मिलेगा,विश्वास से भक्ति मिलेगी और भरोसे से भगवान मिलता है।।
स्वांत: सुख जीसे ना मिले उसका मन स्थिर नहीं होता।।
सुनु मुनि तोहिं कहहुं सहरोसा।
भजहि जे मोहिं तजि सकल भरोसा।।
करउ सदा तिन्ह के रखवारी।
जिमि बालक राखइ महतारी।।
अरण्य कॉंड की ये दो पंक्तियों का गान कर के बापु ने मोम्बासा में खचाखच भारतीय गुजराती साक्षरों,सर्जकों,साहित्य और कलाविदों से भरे हॉल में ९६१वीं रामकथा का आरंभ किया,सब भाव विभोर हो गये।।
कथा के आरंभ के पहले यहां के मनोरथी का जोडा यहां उपस्थित हुआ। संस्कृति स्थापना और स्मृति से भरा-भरा यह देश। 34 वर्षों के बाद फिर बापू यहां आए।।आध्यात्मिक ही नहीं लेकिन भावनात्मक जोडान भी यहां दिखता है।। यहां के कथा के मनोरथी मामा मामी के नाम से जो पहचाने जाते हैं वह अरुण भाई और प्रमिलाबेन सामाणी,40 साल पहले नैरोबी आए।। मूल गुजरात के पोरबंदर के पास राणावाव के और फिर युगांडा आए। यूरोप गए बहुत संघर्ष किया और यहां के चंदाराणा परिवार के साथ जो प्रमिलाबेन जुड़ी हुई है वह भी आई।।
बापू ने सबको याद करते हुए कहा कि यहां हमारे गुजरात के साहित्य और सर्जक और हमारे गुजराती अखबार फूलछाब के मैनेजर नरेंद्र भाई झीबा के साथ अनेक सर्जक कवि भी विशेष रूप से उपस्थित है।।
वह पुरानी बातें याद करते हुए बापू ने कहा की राणावाव में ओ.टी.लाखानी नाम के एक हार्ट स्पेशलिस्ट डॉक्टर थे।। जो पोरबंदर राणावाव में आते जाते रहते थे।।वहां मां आनंदमई मां का आश्रम भी था और सामाणी जी हार्ट स्पेशलिस्ट थे वहां एक बार राणावाव में रामकथा हुई थी।।
बच्चों का आग्रह था कि फिर राणावाव में रामकथा हो लेकिन सब का विशेष आग्रह यहां मोम्बासा का था।
संपन्न आदमी प्रपंन्न ना बने तब तक प्रसन्न नहीं रह सकता।। बापू ने यह उदारता की नोंध और प्रसन्नता करते हुए कहा कि पहले मनुभाई मजेठिया के निवास में ठहरा था। नैरोबी के वनमाली दास बापा और रतिभाई,नटूभाई नाथवानी जिसने शीप बताई थी और दरिया में शीप की कथा का बीज वहीं से उत्पन्न हुआ था।।
हमारे गुजरात के समर्थ साहित्य सर्जक गुणवंत भाई शाह की बेटी और उनके जमाइ भी यहां आए और गुणवंत भाई ने बापू से आग्रह किया कि मोम्बासा की रेती भी लाना! बापू ने बताया कि मुझे ऐसा था कि रमनरेती ही सबसे अच्छी और सॉफ्ट है लेकिन यहां की रेत का भी महत्व है।।
आपने विशेष रूप से संस्कृति कि सेवा की है, सनातन धर्म की और गुजराती भाषा को संभाल के रखा है वो विशेष प्रसन्नता बापू ने व्यक्त की।।
बापू ने चुनी बापा पटनी परिवार को भी याद किया और कहा कि सावन का महीना पूरा श्रवण का महीना है।। एक-एक दिन पर्व है।। और शिवरात्रि महापर्व है।।
पहले विचार था कि सावन मास पर कथा करूं तो सावन शब्द मानस में तीन बार आया।। 34 साल पहले मानस काम दर्शन पर कथा की थी तो एक विचार आया कि मानस रामदर्शन पर कुछ बोलुं! फिर दिमाग में किसी ने दस्तक दी कि आज रक्षाबंधन है तो मानस रामरक्षा विषय पर कथा गान करुं! राम रक्षा करते हैं।। पूरे विश्व को रक्षा की जरूरत है। ऐसे हनुमान जी के चरणों में प्रार्थना करूं।।जहां देखो चारों ओर युद्ध के ब्युगल सालों से बज रहे हैं।। विश्वामित्र ने राम रक्षा स्त्रोत लिखा है। आज सबको रक्षा की जरूरत है।। हमारे मन की रक्षा कौन कर रहा है? हमारे तन की रक्षा,हमारे स्थूल नहीं लेकिन विशिष्ट धन की रक्षा,आंतरिक शत्रु और हमारे बाहरी शत्रुओं से हमारी रक्षा कौन करता है?
झांझीबार में रामरक्षा कथा हुई थी विषय भी वही था। बीज पंक्ति भी वही थी! लेकिन यहां जो पंक्ति उठाई है वह अरण्य कांड में जब सीता खोज के लिए राम प्रसन्न होकर नर लीला कर रहे हैं। अकेले बैठे हैं और नारद जाकर प्रश्न पूछते हैं कि आपने जब अपने माया का विस्तार करके विश्व मोहिनी को प्रेरित किया था तब मुझे विवाह क्यों करने नहीं दिया? तब राम हर्ष सहित उत्तर देते हैं और कहते हैं कि मेरा ही भरोसा करके जो भजन करता है।सभी आधार छोड़कर मेरा भजन करता है मैं उसकी रक्षा करता हूं।जैसे मां अपने बालक की रक्षा करती है।। ज्ञानियों की रक्षा मैं नहीं करता।। और यह चौपाई सुनाई गई। किसी ने इस चौपाई का गलत अर्थ भी किया है लेकिन शास्त्र गुरुमुखी होना चाहिए।।यहां सहरोसा शब्द का अर्थ ऐसे करते हैं कि राम रोष के साथ बोले! लेकिन राम प्रसन्न है और सहर्ष जवाब देते हैं।।राम ने कब कहां-कहां किस रूप में रक्षा की और सब ग्रंथ में लिखा है।।राम रक्षा स्तोत्र जरूर पढ़ना और अपने बच्चों के दफ्तर में रामचरितमानस और गीता जी भी रखना।।
यहां दो विशेष महिमा बताइ:बापू ने कहा कि मुंबई में 100 साल पहले एक घटना घटी थी। जो बिल्कुल सही है।।अयोध्या के विरक्त त्यागी बाबा माधव बाग में कथा करते थे। और हर रोज कथा के पूर्व लाल रंग की गद्दी जो हनुमान जी को बिठाने के लिए होती है वह रखकर आइए हनुमंत विराजीये….. यह ऐसा बोलते थे। इस कथा में एक वकील को यह संशय हुआ।तर्क किया कि ऐसे हनुमान जी कैसे आ सकते हैं? और फिर वकील और उन बाबा जी के बीच में शर्त लगी। बाबा ने कहा कि यदि कल में यह बोलूं और आप यह गद्दी उठाकर दूर कर दे तो यह मैं पूरा भेख उतारकर संसारी हो जाऊंगा।
और ऐसा नहीं कर पाया तो मेरे नौकर बनकर आप रहना।।दूसरे दिन वह वकील आया वैसे तो मैं ऐसी बातों को जल्दी नहीं स्वीकार करता लेकिन हमारे बहुत प्रसिद्ध अर्थशास्त्री नानी पालखीवाला कि जब मुंबई में ब्रेबोन स्टेडियम में एक बार प्रश्नोत्तरी के समय मुझे मिले थे मैंने पूछा था तो पालखा वाला साहब ने कहा कि यह वकील मेरे ही साथ थे और यह प्रसंग सही में बना है।।
दूसरे दिन वह वकील आया गदी को स्पर्श भी नहीं कर पाया और किसी शक्ति ने उसे दूर कर दिया खूब रो पड़ा और महात्मा से बहुत माफी मांगी।।
बापू ने कहा कि हनुमान प्राण तत्व है। प्राण बाल है आत्म बल है। कोई है जो हमें ऊर्जा प्रदान करता है। महाभारत में भी हनुमान जी है।।
ऐसा ही एक प्रसंग काशी नरेश और द्रविड़ देश के सम्राट के बीच दोनों की पत्नी जब सगर्भा थी और एक दूसरे के समधि बनने की बात की थी वहां छल हुआ और तुलसी जी ने राम कथा की और बेटी में से एक को बेटा बनाया।। बापू ने कहा कि शायद ऐसा हम नहीं स्वीकार कर सकते लेकिन इतना अर्थ तो जरूर कर सकते हैं कि रामकथा पुरुषत्व प्रदान करती है। जीने का हौसला देती है। जीने के लिए बल कथा ही देती है।।
फिर ग्रंथ के महत्व में सात सोपान सात मंत्र मंगलाचरण में सात मंत्र और अध्यात्म में सात का महत्व दिखाते हुए कहा कि सात की भूमिका बहुत है।।ज्ञान की भूमिका सात है। सात आकाश है। सात पीताल है।।आकाश और अवकाश अलग है।। तुलसीदास जी कहते हैं नभ शत कोटि अमित अवकाशा- है यानी कि आकाश शत कोटि है लेकिन अवकाश अनंत है।। जैसे इंग्लिश में स्काय और स्पेस अलग शब्द मिलते हैं।।संगीत के सूर सात है सागर भी सात है। सात द्वीप है।राम सातवां अवतार है।।
और प्रथम मंत्र में वंदे वाणी विनायक लिखकर तुलसी ने दूसरी क्रांति की।। आज भी कई लोग तुलसी जी को नारी निंदक बोलते हैं उन्हें यह मंगलाचरण पढ़ना चाहिए पहले भगवती सरस्वती और बाद में गणपति जी का स्थापन तुलसी ने किया है।।
शब्द ब्रह्म है अशब्द पर ब्रह्म है।।मौन परब्रह्म है मौन पर ब्रह्म का प्रतीक है।।मौन व्रत नहीं विभूति है।। श्रवण के बादल शिव का अभिषेक करते हैं।।श्रावण में व्रत आते हैं।। मेले भी श्रवण में लगते हैं।।श्रवण का महिमा गजब है।।श्रवण की आद्रता और भाद्रपद की भद्रता भी बहुत महान है।।श्रद्धा से ज्ञान मिलेगा,विश्वास से भक्ति मिलेगी और भरोसे से भगवान मिलता है।। स्वांत: सुख जीसे ना मिले उसका मन स्थिर नहीं होता।।
फिर पंचदेव की वंदना की गई और व्यक्ति की रक्षा खुद का विवेक करेगा यह कहकर हनुमान जी की वंदना करते हुए बापू ने कहा कि अंधेरा का भी एक उजाला है।। हनुमंत वंदना के बाद पहले दिन की कथा को विराम दिया गया।।

