
सत्य भगवान राम का प्रभाव है,विरोध करने वाले भी राम को ही पसंद करते हैं।।
प्रेम राम का स्वभाव है और करुणा राम का प्रवाह है।।
सनातन धर्म-जिसे आकाश भी छोटा पड़ता है।।
मानस की मशाल लेकर मैं अकेला निकला हूं,ना कोई नेटवर्क है ना कोई मेरे आगे पीछे है:बापु
कर्म और फल दोनों की विस्मृति हो जाए उसे ध्यान कहते हैं।।
भारत मंडपम् दिल्ही से प्रवाहित रामकथा के दूसरे दिन ओशो के अनुज और दिल्ली विधानसभा के अध्यक्ष भी आए और सबने अपने विचार भी प्रस्तुत किया।।
कथा का आरंभ करते हुए बापू ने कहा जो चार पंक्ति हमने उठाई है इसमें प्रथम पंक्ति भगवान राम के शब्द है। वनवास की पहली रात्रि तमशा के तीर हुई तब यह पंक्ति निकली है कि सत्य के समान कोई धर्म नहीं है।।राम ब्रह्म है फिर भी कहते हैं कि आगम और निगम में भी यह लिखा है।।दूसरी पंक्ति भगवान राम कोल कीरातों को मिलते हैं और कोई बच्चों की बात जैसे बाप सुने ऐसे सबको सुनते हैं क्योंकि राम केवल प्रेम प्यारे हैं।।केवल प्रेम के दूध में केवल ज्ञान शक्कर की तरफ धूल मिल जाता है।। तीसरी पंक्ति परम साधु भरत के मुंह से निकली है।। सत्य भगवान राम का प्रभाव है। विरोध करने वाले भी राम को ही पसंद करते हैं।।प्रेम राम का स्वभाव है और करुणा राम का प्रवाह है।।
वेद विदित परम धर्म अहिंसा है।यह काग भूशुंडी जी का वचन है।।यह चार शब्द सनातन धर्म के स्वभाव में है।।
वेद कालीन सनातन धर्म के लक्षणों के,स्वभाव के बारे में बापू ने कहा और सनातन के अर्थ अमरकोश और भगवदगोमंडल में कितने-कितने अर्थ निकाले हैं वह बात भी कहीं।।
सनातन धर्म-जिसे आकाश भी छोटा पड़ता है।।
बापू ने कहा कि मानस की मशाल लेकर मैं अकेला निकला हूं, ना कोई नेटवर्क है ना कोई मेरे आगे पीछे है।।
दिल्ली का विकास देखकर बापू ने कहा कि यह भारत मंडपम तो देखो कितना अद्भुत है! और मैं यशस्वी बड़ा प्रधान को बधाई देना चाहता हूं।। सनातन के स्वभाव में:एक-सत्य। गांधीजी और सोक्रेटिस इसके सत्य का प्रभाव भी कितना था।
दो रूत- वह सत्य जिनके द्वारा सूरज निकलता है। तीन-यज्ञ आहुति देना। समाज के लिए खुद को आहूत कर देना यह यज्ञ है।।चार- धर्म को कर्म में परिवर्तित करना।। पांच- पूर्व जन्म और पुन:जन्म
छ- ध्यान-कर्म और फल दोनों को विस्मृति हो जाए उसे ध्यान कहते हैं।।सात- वर्णाश्रम यह भेद नहीं लेकिन आवश्यक व्यवस्था है।।
पालीताणा में कथा करनी है मानस नवकार पर,वहां एक-एक धर्म के एक-एक मंत्र को उठाना है।।
मातृ वंदना में मां जानकी की वंदना के बाद राम की और सीता राम की वंदना और भगवान के पावन नाम की वंदना करते हुए बापू ने कहा प्रणव बोलो, राम बोलो कोई भी नाम बोलो क्या फर्क पड़ता है।। और तुलसीदास जी ने ७२ पंक्तियों में रामनाम महिमा का जो वर्णन किया है वह गान करके आज की कथा को विराम दिया गया।।

