
श्री हनुमान जी वैराग्य का घनीभूत स्वरूप है।।
जहां बिल्कुल अभिमान ना हो वो ज्ञान है।।
सब में ब्रह्म को समान रूप में देखे वह ज्ञान है।।
बालकांड तप प्रधान,अयोध्या कांड त्याग प्रधान है।
यहूदीओं की यातना और संहार और अमानवीय क्रूरता से ग्रसित भूमि की शाता के लिये केटोवीसा-पोलेन्ड से मोरारिबापु द्वारा क्रम में ९६२वीं रामकथा के आरंभ में लंडन निवासी शितुल जी और रमाबहन पंचमयता परिवार की और बहूत कम शब्दों में लेकिन बहूत दिल के भरे भाव की शालिनता से सब का स्वागत हुआ।।
इन बीज पंक्तियों के गान से बापु ने कथा को आरंभ करते हुए कहा:
सहज बिराग रूप मनु मोरा।
थकित होत जिमि चंद चकोरा।।
-बालकॉंड
कहिअ तात सो परम बिरागी।
तृन सम सिध्धि तीनि त्यागी।।
-अरण्य कॉंड
भगवान आशुतोष अवढरदानी महादेव की असीम कृपा से सावन के समापन के दिन कथा का आरंभ हो रहा है।।इस विषय का निर्णय एरोप्लेन में उड़ रहा था तब मन में आया की वैराग्य को केंद्र बनाकर हम जाएंगे संवाद करेंगे।।वैराग्य शब्द सुनकर घबराना मत! संपन्न देश और संपन्न भूमि में मेरी व्यास पीठ यह गाने के लिए जा रही है। रामचरितमानस में विराग, बिरगा, बिरागी,बिरागु, बैरागी आदि शब्द बहुत बार आया है।
इतना बहुत बोलने के बाद गुरु कृपा से मेरे मन में एक बात पक्की हो चुकी है शब्द ब्रह्म है अशब्द परब्रह्म है।।लेकिन बोलना है तो माध्यम शब्दों का ही लेना पड़ता है।।
रामचरितमानस में जहां वैराग्य की चर्चा हुई है वैराग्य का अर्थ यह नहीं किया कि यह विलासिता से भागना है। गुरु कृपा से भजन करते-करते जीवन को इतनी ऊंचाई पर ले जाना की कोई छिद्र ना बचे की विलासिता प्रवेश कर पाए, हम कहीं भी रहे।। जब कहीं वैराग की बात आती है तो कई महापुरुष पल भर में विलंब किए बिना सब कुछ त्याग करते देखा है।हमें संसार छोड़कर भागना नहीं है। वैराग्य का स्वभाव और स्वरूप की समझ पानी है।।
वैसे शिव विश्वास का प्रतीक है घनीभूत रूप है। राम सत्य का घनीभूत स्वरूप है। भगवान कृष्ण प्रेम का घनीभूत स्वरूप है।। श्री हनुमान जी वैराग्य का घनीभूत स्वरूप है।।
यह दो पंक्ति मैंने उठाई एक पंक्ति बालकांड की दूसरी अरण्य कांड की है। बालकांड में जनक के मुख से यह पंक्ति आई है।।अरण्य कांड में भगवान राम के मुख में आई है।।
और दोनों के बारे में बापू ने विस्तार से एक-एक चौपाई एक-एक पंक्ति का गान और अर्थ दिखाते हुए वह पूरे दोनों प्रसंग में ले जाते हुए कहा की एक प्रसंग की भूमिका यह है:
विश्वामित्र महाराज यज्ञ पूरा करके भगवान राम लक्ष्मण के साथ जनकपुरी की यात्रा करते हैं।
धनुष्य यज्ञ सुनी रघुकुल नाथा।
हरषि चले मुनि बर के साथा।।
यज्ञ के बाद अहल्या उद्धार की यात्रा हुई। आगे गंगा तट पर पूछते हैं यह कौन सी नदी है! विश्वामित्र ने गंगा “की पूरी कथा संक्षेप में सुनाई। फिर जनकपुर पहुंचे वहां जनक के विलास का वर्णन करते हैं। एक-एक पंक्ति में बताते हुए वहां इतना विलास है और यह विलास किसी नगर सर्जन के लिए हमें प्रेरणा देता है ऐसा रमणीय नगर की यहां बात है।। राम की नजर से सब दिखाया है। वहां वाव-बावडी, कूएं, घाट और सरिता सबके आसपास मणी लगाए हैं। समंदर सबसे बड़ा गड्ढा है,अभाव से भरा है।। जनकपुरी में भ्रमर और विहग कुंजारव कर रहे हैं तीन प्रकार के वायु बह रहे हैं। कमल खिल रहे हैं।। नगर की रमणीयता और अवर्णनीय है। प्रत्येक नर नारी सुंदर है,पवित्र है, संत है,धर्मशील है और ज्ञानी भी है।।वहां जनक का महल देखकर देवता भी यह विलास देखकर चकित हो जाते हैं। धवल मकान है रामायण में भी एक व्हाइट हाउस है!वहां सीता शांति भक्ति रहती है।। और सूर सचिव के घर भी राजा के घर के समान है।।
और अब विश्वामित्र की दृष्टि अमराइ में जाती है और अंवराइ में रहने को मन करता है और राम और लक्ष्मण को पूछते हैं कि हम यहां ही निवास करेंगे।। जनक राज को खबर मिलते ही विश्वामित्र मुनि को मिलने के लिए ब्राह्मण सुर,सचिवों के साथ जाते हैं इस वक्त दोनों भाई प्रवेश करते हैं सब खड़े हो जाते हैं।। जनक चकित होकर देख रहे हैं।। जनक का शरीर पुलकित होता है, आंख में आंसू और बानी गदगद हो जाती है।।ऐसी दशा में जनक विश्वामित्र को पूछते हैं यह दोनों बालक कौन है? तब यह पंक्ति विश्वामित्र ने कहा कि जहां तक सृष्टि है सबके यह राजकुमार प्रिय है और यह पहली पंक्ति वहां से आती है।।
दूसरी पंक्ति अरण्य कांड की भूमिका कहते हुए बापू ने कहा भगवान गोदावरी के तट पर पंचवटी में निवास करते हैं। प्रसन्नता से बैठे हैं। लक्ष्मण ने पांच प्रश्न पूछे हैं: ज्ञान क्या है?वैराग्य,माया,भक्ति और ईश्वर और जीव में भेद क्या है?सबके जवाब राम क्रम में नहीं देते हैं। पहले माया के बारे में कहा मैं अरु मोर तोर ते माया।। इतनी सटीक और छोटी व्याख्या आज तक नहीं देखी।। मैं और मेरा, तुं और तेरा यह माया है।।
जहां बिल्कुल अभिमान ना हो वो ज्ञान है। सब में ब्रह्म को समान रूप में देखे वह ज्ञान है। यहां से दूसरी पंक्ति आई और जो तिनके की तरह समस्त सिद्धियां को त्यागता है वह परम विरागी है।। तीनों गुण से जो मुक्त हो जाए वह परम विरागी है।।
बापू ने कहा कि भरूच आश्रम के तदरूपानंद जी ने भतृहरि के वैराग्य शतक पर टिका लिखी है। कभी मन करता है मानस श्रृंगार शतक भी कथा सुनानी है अष्टावक्र ने भी वैराग्य के बारे में बहुत कहा है। त्याग से शांति और वैराग्य से शांतिनाथ-भगवान राम मिलते हैं।।
यहां से केवल 35 किलोमीटर दूर हिटलर ने लाखों यहूदियों की कत्ल की थी वह यह भूमि बापू ने कहा कि हम प्राथना करेंगे की पूरी दुनिया में शांति हो जाए।।
ग्रंथ का परिचय देते हुए सात सोपान और
बालकांड तप प्रधान,अयोध्या कांड त्याग प्रधान, अरणीच्य कांड पतिव्रत धर्म प्रधान है। किष्किंधा कांड तृषा प्रधान, सुंदरकांड तरण प्रधान, लंका कांड तारण प्रधान और उत्तराखंड तृप्ति का कांड है।।
यह कहते हुए पहले कांड की सात श्लोक में वंदना प्रकरण और सभी की वंदना करते हुए सबसे पहले वाणी और विनायक की वंदना और क्रम में वंदना करते हुए गुरु वंदना और हनुमान जी की वंदना तक ले जाते हुए आज की कथा को विराम दिया गया।।

