
कथा में कोई अनुग्रह लेकर कोई पूर्वग्रह लेकर बैठते हैं।।
शिव अनुग्रह लेकर और सती पूर्वग्रह लेकर बैठी है।
हम लक्ष्मीकांत बनते हैं तब खतरा है,हम लक्ष्मी के संतान है।।
समंदर की तरंगे है जो अनंत तरंग है फिर भी विष्णु शांत है।।
विष्णु का वर्ण ब्राह्मण,क्षत्रिय,वैश्य या सेवक नहीं वह मेघवर्णी है।।
चित् को मल,आवरण और विक्षेप लगते हैं-तीनों से पर है वह विष्णु है,वैष्णव है।।
शांति शाश्वत होनी चाहिए।।
नाभि से कमल निकला यह पद्मनाभ है।।
नाभि नाल से हम जुड़े हैं फिर भी कमल की तरह असंग रहना चाहिए।।
रामचरितमानस केवल महाकाव्य नहीं महामंत्र है।।
“मोरारी बापू को भी आप मेघवर्णी कह सकते हैं!”
हम लाभ के पीछे दौड़ना बंद कर देंगे तब शुभ हमारा पीछा करेगा।।
शुभ की छांया में सब लाभ है।।
देवभूमि उत्तराखंड की पवित्र मीट्टी में स्थित पंच प्रयागों में से एक विष्णु प्रयाग से शनिवार शाम ये बीज पंक्तियों की गुंज के साथ ९७५ वीं रामकथा का मोरारिबापु के पावन पवित्र मुख से आरंभ होने से पहले बालकॉंड की बीज पंक्तियां गुंजी:
बिष्नु जो सुर हित नरतनु धारी।
सोउसर्वग्यजथात्रिपुरारी।।
खोजइ सो कि अग्यइव नारी।
ग्यान धाम श्रीपति असुरारी।।
बिष्नुचारि भुज बिधि मुख चारी।
बिकटबेष मुख पंच पुरारी।।
-बालकॉंड
परमात्मा की अहेतु असीम कृपा से फिर एक बार इस दिव्य देव भूमि पर रामकथा का अनुष्ठान शुरू हो रहा है।पूरी दिव्य भूमि की प्रगट और अप्रकट चेतनाओं,बद्रीनाथ केदारनाथ और जगतगुरु आदि शंकराचार्य की पीठ को प्रणाम करते हुए बापू ने कहा कि पंच प्रयाग में पहली कथा देवप्रयाग में कोरोना के काल में हूइ।बाद में कर्ण प्रयाग,नंद प्रयाग फिर रुद्रप्रयाग और अब यह विष्णु प्रयाग।। यह कथा में आशीर्वाद देने के लिए जगतगुरुसतुआ बाबा भी काशी से पधारे हैं।।
मनोरथी विशेष प्रकार के वैष्णव दिवंगत बाबू भाई काणकिया परिवार के रशेष,रूपल और बेटी नियति जिन्होंने देवप्रयाग और बाद में चंपारण्य मुंबई में भी कथा करवाई है।।
विशेष प्रसन्नता यह है कि गुजरात साहित्य के युवा प्रमुख हर्षद त्रिवेदी भी उपस्थित है।।कंबोडिया में ‘मानस विष्णु भगवान’ पर कथा हुई।भोपाल में ‘मानस विष्णु’ पर फिर ‘मानस ब्रह्मा’,’मानस महेश’ ग्वालियर में हुई और यहां ‘मानस विष्णु प्रयाग’ पर संवाद करेंगे।।यहां ली गई पंक्ति बालकांड में शिव और दक्ष कन्या सती कथा सुनने जाते हैं और सती को संशय होता है,रास्ते में उस वक्त राम की ललित नर लीला चलती है वह पंक्तियां और नगर दर्शन की पंक्ति उठाई है।।
कथा में कोई अनुग्रह लेकर कोई पूर्वग्रह लेकर बैठते हैं।शिव अनुग्रह लेकर और सती पूर्वग्रह लेकर बैठी है भूमिका बिलग है।।जिस स्थान से गुजरे वह दंडक वन संदेह का वन माना गया है।।
विष्णु भगवान का एक श्लोक हम सब जानते हैं वहां से हम विष्णु के बारे में आरंभ करेंगे:
शांताकारम्भुजगशयनम्पद्मनाभमसुरेशम्।
विश्वाधारम् गगन सद्यशममेघवर्णंशुभांगम्।
लक्ष्मीकांतम् कमल नयनम्योगीभीर्ध्यानगम्यम।
वंदे विष्णुंभवभयहरम् सर्व लोकैकनायकम्।।
यहां जो लक्षण दिखाएं वह वर्तमान समय में किसी व्यक्ति में दिखाई दे उसे विष्णु कहने में कोई तकलीफ नहीं है।।आकार शांत है।विचार शांत है। उच्चार शांत है और आचार भी शांत है।।वह सत्व गुण के मालिक है।।ब्रह्मा रजोगुणी और महादेव समष्टि का अहंकार माना गया है।।वर्तमान में वैष्णव मिले तो यह वैष्णव के भी लक्षण है।। शांताकार शब्द के दो अर्थ है लेकिन यहां सर्प के बिछाने पर सोने के बाद शांत रहे,यह विष्णु ही कर सकते हैं। काल की छांया है,लक्ष्मी चरण दबा रही है वैष्णव और विष्णु वह है जो ऐसे में भी शांत रह सके।। हम लक्ष्मीकांत बनते हैं तब खतरा है,हम लक्ष्मी के संतान है।।सोए हैं वह समंदर की तरंगे है जो अनंत तरंग है फिर भी शांत है।।
विष्णु का वर्ण ब्राह्मण,क्षत्रिय,वैश्य या सेवक नहीं वह मेघवर्णी है।।
तुलसी जी की ये कविता कथा सरिता है। कोई दर्शन कोइ स्पर्श, कोई मज्जन और कोई स्नान करता है। कभी तुलसी मीटर में नहीं दिखते वहां व्याकरण से ज्यादा आचरण का ध्यान तुलसी जी ने रखा है।। रामचरितमानस केवल महाकाव्य नहीं महामंत्र है।। चित् को भी विष्णु कहा है।।किसी भी परिस्थिति में वह चलित ना हो चित् को मल,आवरण और विक्षेप लगते हैं-तीनों से पर है वह विष्णु है,वैष्णव है।।वैश्विक बुद्धि का नाम ब्रह्मा, वैश्विक मन का नाम चंद्रमा और वैश्विक चित् का नाम विष्णु है। शांति शाश्वत होनी चाहिए।। नाभि से कमल निकला यह पद्मनाभहै।।नाभि नाल से हम जुड़े हैं फिर भी कमल की तरह असंग रहना चाहिए। सुरेश शब्द इंद्र के लिए है यहां दिव्य गुण के नायक के रूप में विश्व का आधार और आकाश की तरह विशाल और व्यापक है।।विष्णु वर्णाश्रम से पर मेघवर्णी है।। गंगा सती की सरनेम देनी है तो मेघवर्णीकहुंगा। वैसे मोरारी बापू को भी आप मेघवर्णी कह सकते हैं! वैष्णव मेघवर्णी है।।सबकोमेघवर्णी बनना होगा। मेघ वर्णी बरसेगा तो शुद्ध धवल बरसेगा।।
हम लाभ के पीछे दौड़ना बंद कर देंगे तब शुभ हमारा पीछा करेगा।। शुभ की छांया में सब लाभ है फिर ग्रंथ महात्म्य,सात कांड और मंगलाचरण के मंत्र।वंदना प्रकरण में पंचदेवों की वंदना करते हुए गुरु वंदना और आखिर में हनुमंत वंदना का गान करके आज की कथा को विराम दिया गया।।

