Homeगुजरातजो निर्दोष है वह समर्थ है।।

जो निर्दोष है वह समर्थ है।।

पीछडे,दलित,अस्पृश्यों की हालात के प्रती बही बापु की मेघवर्णी करुणा।।

साधु का वर्ण मेघ होता है,ब्राह्मण,क्षत्रिय,वैश्य या सेवक नहीं।।

कोई भी साधु,सद्गुरु,वैष्णव,विष्णु सब मेघवर्णी है।

मेघ साधु है,बादल साधु है,वह भेद नहीं करता।

प्रकृति के मूल तत्व भेद नहीं करते।।

काशी नहीं गया फिर भी मैं पी.एच.डी.(पर्सनल हैप्पीनेसडिस्ट्रीब्यूटर)हूं”

दो हाथ से कमाओ,चार हाथ से बांटो तो विष्णु तत्व,वैष्णव तत्व आएगा।।

हनुमान जी का सौम्य स्वरूप पकडो।।

 

देवभूमि उतराखंड के पवित्र विष्णु प्रयाग के संगम पर बह रही कथागंग धारा आज दूसरे दिन में प्रवेश कर रही है तब आरंभ में दिव्य देवभूमि की सब प्रगट अप्रगटचेतनाओं को प्रणाम करते हुए मेघवर्णी की व्याख्या बताते हुए बापू ने कहा कि साधु का वर्ण मेघ होता है,ब्राह्मण,क्षत्रिय,वैश्य या सेवक नहीं। कोई भी साधु,सद्गुरु,वैष्णव,विष्णु सब मेघवर्णी है शंकराचार्य का स्त्रोत-न मेमृतयु शंका न में जाति भेद….आज के काल में बार-बार डालने कि चेष्टा करता हूं क्योंकि भेद न हो।। व्यवस्था के रूप में अलग बात है।तुलसी जी के शब्दों में मेघ साधु है, बादल साधु है,वह भेद नहीं करता।।प्रकृति के मूल तत्व भेद नहीं करते।।

आज बापू ने एक पंक्ति की-जो गलत अर्थ कर के बार-बार लोग अविवेक बता रहे हैं:

समरथ को नहीं दोष गोंसाई।

रवि,पावक सुरसरि की नाई।।

सब इस पंक्ति का अपराध करते हैं, गलत अर्थ निकालते हैं। मेरे पास त्रिभुवनीय विद्या है,काशी नहीं गया फिर भी मैं पी.एच.डी. हूं!-पर्सनल हैप्पीनेसडिस्ट्रीब्यूटर हूं।। इस पंक्ति का बहुत गलत अर्थ हुआ है। पूर्वा पर संबंध देखे बिना भी अर्थ करते हैं।विवेचकों को भी प्रार्थना करुं कि पूर्वा पर संबंध देखो! रामायण में ‘को’ शब्द है वहां अर्थ है कौन? कंई पंक्ति,चौपाई,छंद में यह हमें दिखाई देता है। यहां समरथ को- मतलब समर्थ कौन है? जो पूर्णतः निर्दोष है। रवि समर्थ है क्योंकि सूर्य में कोई दोष नहीं है।पावक अग्नि का एक अर्थ होता है परम पवित्र। सुरसरि का मतलब गंगा,वह भी मूल में निर्दोष है।।समाज ने बहुत गलत अर्थ चले कि तुलसीदास जी ने समर्थ का पक्ष लिया। यहां समर्थ का पक्ष नहीं लिया है,व्याख्या की है। जो निर्दोष है वह समर्थ है।।

बापू ने और एक बात अपनी सजल आंखों से बताते हुए कहा कि उन दिनों में तलगाजरडा में दलित अस्पृश्य और पिछड़े लोगों के पत्र,पोस्टकार्ड कोई पढ भी नहीं देते थे और वह लोग लिख भी नहीं सकते थे।। लेकिन एक साधु निकला! प्रभुदास बापू (बापू के पिता श्री)।बापू ने कहा अन्यथा ना लेना लेकिन आप तक बात पहुंचे इसलिए मैं अपनी बात डाल रहा हूं। उन दिनों में लोग अस्पृश्य लोगों के खत को पानी छींटक कर फिर पढ़ते थे। प्रभुदास बापू के पास खत पढवाने आते थे तब सावित्री मां कहती थी पहले उनको चाय पी ला फिर बापू खत पढ़ते थे।यह तो पहली बार कह रहा हूं जो आंखों से देखा है, लेकिन हर एक गांव में दलित,पिछड़े अस्पृश्य लोगों के लिए बहुत बुरी हालत थी। उनके पीछे झाड़ू बांधते थे ताकि उनके पद-पैरों के निशान मिट जाए! यह मेरी आत्मकथा नहीं कम से कम यह संदेश आपके तक पहुंच जाए इसलिए कह रहा हूं। एक दलित माताजी-कनू भाभी एक बार गांव से निकली। पीछे झाडू बंधा हुआ था।किसी कारण वश वो छूट गया और बाजार में रह गया। लेकिन कोई उठाने को, झाड़ू को स्पर्श करने को तैयार नहीं था! इस वक्त सावित्री मां पानी भर कर आई और देखा, मुझे बुलाया और कहा कि वह झाड़ू लेकर आ उनके टुकड़े करके चूल्हे में जलाकर तेरे लिए रोटी बना कर खिलाऊंगी। इसे कहते हैं मेघवर्ण।।

गांधीजी,विनोबा जी,रामकृष्ण परमहंस,रमण,गंगा सती सब मेघवर्णीहै।।अब तो हालत सुधरी है। लेकिन आपके घर में कोई सेवा करता हो,रसोई बनाते हो,झाडू पोते करते हो उसके प्रति भेद मत करना।।हां स्नान करके स्वच्छ होकर करें उतना आप कह सकते हैं। प्रयाग का अर्थ होता है समन्वयी। शुभ के साथ जुड़े रहना प्रयाग है। सब विष्णु के अवतार है। लेकिन रामचरितमानस में २५ बार विष्णु शब्द और ११ बार प्रयाग शब्द आया है विष्णु के अवतार तो २४ है और मुख्य १० अवतार है। नव हो गए हैं।। मेरे लिए तो दसवां अवतार अपना सद्गुरु है।। २४ बार विष्णु लेकिन २५ वां हमारा सद्गुरु अवतार है।।

विष्णु के चार हाथ समन्वय का प्रयाग का प्रतीक है ब्रह्मा के चार मुख,महादेव के पंचमुखसबको मिलाकर १३ का अंक होता है वह पकड़ लो तो कोई अपशगुन नहीं होगा।।अध्यात्म जगत में १३ का अंक अद्भुत है:श्री राम जय राम जय जय राम मिलाओ तो वह भी १३ का अंक होता है। एक तरफ अध्यात्म की यात्रा करना और ऐसी छोटी-छोटी बातों से डरना नहीं।।

शंख,चक्र,गदा और पद्म यह विष्णु के हाथों में है शंख सफेद होता है।आकार कुटिल है,खारे सागर से जन्म हुआ है लेकिन शंख एक नाद,वाणी,घोष का प्रतीक है।।व्यक्ति की वाणी श्वेत होनी चाहिए, बनावटी नकली नहीं।।शंख युद्ध और बुध्ध दोनों को निमंत्रण है।।चक्र गति का प्रतीक है। लेकिन गति अपनी होनी चाहिए।।गदा वैसे शस्त्र है। मुझे शस्त्र में रुचि नहीं लेकिन गदा पकड़नी पड़ती है वह आसक्ति का प्रतीक है और पद्म असंगता का प्रतीक है।।

यह चारों का संगम विष्णु में ऐसे बहुत संगम प्रयाग दिखते हैं।। दो हाथ से कमाओ,चार हाथ से बांटो तो विष्णु तत्व,वैष्णव तत्व आएगा।।

अति संग्रह,दूसरों के प्रति अत्यंत द्वेष,अपनी वस्तु पर अत्यंत ज्यादा ममत्व-यह मन और बुद्धि को स्थिर नहीं होने देते।।

हनुमंत वंदना में कहा गया हनुमंत तत्व प्राण तत्व है सतयुग में शिव है। त्रेता युग में राम की सेवा में। द्वापर में अर्जुन की ध्वजा पर बैठकर गीता सुनी है लेकिन कलयुग में कथा में बैठकर सुनते हैं।। तो हनुमान जी का बिल्कुल शुभ स्वरूप पकड़ो।। कभी विकराल बनकर नहीं बैठते।।कितने ही साल सोचकर बना बनाकर फिर हृदय से निकली तस्वीर जो मेरे पीछे लगाता हूं वह हनुमान जी की तस्वीर जो शुभ रूप है,सौम्य स्वरूप का भाव है।।ऐसे सौम्य हनुमान जी का अनुसंधान करो तो प्राण बल, आत्म बल बढ़ेगा।।

वंदना प्रकरण में सीताराम जी की वंदना। राम के सेवकों की वंदना।प्रधान पात्रों की वंदना और फिर रामनाम की वंदना करते हुए संवाद करते हुए बापू ने नाम,जप,सिमरन और संकीर्तन की बात कही और कहा कि रामनाममहामंत्र है।।

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