
अगली-९६३वीं रामकथा ६ सितंबर से यवतमाल(महाराष्ट्र) से शुरु होगी।।
सबके साथ अपनापन वह मेरा वैराग्य है: मोरारिबापु
वैराग्य गुण नहीं है,वैराग्य साधु का स्वभाव है।।
वैराग्य बाद में नहीं आता कभी-कभी वैराग्य लेकर ही कोई आता है।।
जिसका बोध नित्य हो सतत हो वह बैरागी है।
यहूदीओं की यातना नशंष अमानवीय क्रूरता से ग्रसित भूमि की केटोवीसा-पोलेन्ड से मोरारिबापु द्वारा क्रम में ९६२वीं रामकथा के विराम के दिन ये बीज पंक्तियों का गान हुआ ,
सहज बिराग रूप मनु मोरा।
थकित होतजिमिचंदचकोरा।।
-बालकॉंड दोहा-२१६
कहिअ तात सो परम बिरागी।
तृन सम सिध्धितीनि त्यागी।।
-अरण्य कॉंड दोहा-१५
कथा के उप संहारक सूत्र कहने से पहले जगदगुरुशंकराचार्यजी का ये मंत्र कहा:
किमपिसततबोधंकेवलानंदरुपंनिरुपमंअतिवेलंनित्यमुक्तंनिरिहंनिरवधिगगनाभंनिष्कलंनिर्विकल्पंह्रिदिकलयिति विद्वान ब्राह्म पूर्ण समाधौ
बापू ने कहा के विनोबा जी के एक किताब में से मुझे तीन मंत्र मिले विनोबा।जी स्वयं कहते हैं कि कुछ महापुरुषों ने मुझ पर बहुत प्रभाव डाला है। इसमें शंकराचार्य जी,ज्ञानेश्वर जी,एकनाथ महाराज, नामदेव,तुकाराम,गांधीजी आदि है।।
यहां एक वैराग्य का ध्यान समझाया है।। वैराग्य गुण नहीं है वैराग्य साधु का स्वभाव है।। यह किसी पर प्रभाव डालने के लिए नहीं लेकिन सहज होता है सन्यासी अग्नि को छू नहीं सकते। लेकिन शंकराचार्य जी ने अग्नि को छुआ।मॉं का अग्नि संस्कार भी किया।जल का भी स्पर्श किया। कंचन को छू नहीं सकते लेकिन कंचन मंजरी स्तोत्र-जहां कंचन की वर्षा होती है,रत्न का बारिश होता है वो स्तोत्र की रचना की।कोई परहेज नहीं है। ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या यह कहने वाले कालडी से निकलकर केदारनाथ तक पहुंचे बीच में जितनी नदी आई हर एक नदी के स्त्रोत अष्टक सौंदर्य लहरी में लिखे।। निराकारवादी,अद्वैतवादी फिर भी शिव और पार्वती को पुकारते हैं। कृष्ण को गाते हैं।।वैराग्य बाद में नहीं आता कभी-कभी वैराग्य लेकर ही कोई आता है।। जिसका बोध नित्य हो सतत हो वह बैरागी है। यह सूत्र में शंकराचार्य जी कहते हैं बोध वाला आदमी कभी किसी का विरोध नहीं करेगा।। जो देवलोक आलोक से आते हैं वह कहते हैं जगत असुंदर नहीं है।।
शंकराचार्य जी कहते हैं जो केवल आनंद रूप में रहते हैं वहां सत और चित्त की भी जरूरत नहीं।। निरुपम- उपमा से बाहर रहते हैं।। समुद्र में कोई लहर आए उसे अतिवेलं कहते हैं,इसका कोई गणित नहीं ऐसे समंदर की लहर की तरह मौज से रहते हैं।। नित्य मुक्त सबके साथ रहकर भी एक अंतर रख कर रहते हैं।। निष्कल-सभी कलाओं से मुक्त रहते हैं।निर्विकल्प-अन्य कोई विकल्प नहीं होता। निरिहं- कोई इच्छा से मुक्त रहते हैं।। निरअवधि जो असीम है कोई सीमा नहीं होती।। गगनाभं-चिदाकाशअक बंद और अखंड होता है। ह्रदिकालीयति -हृदयपूर्वक आकलन किया होता है। ऐसा बैरागी होता है।। वह शंकराचार्य जी ने कहा किसी ने प्रश्न पूछा था कि बापू वैराग्य के बारे में आपने कहा।अन्य से मिले सूत्र आपने किसी कई विद्वान किसी साहित्यकार किसी कर्ता को सुनकर गुरु जी से कहीं से पाया है वह सब कुछ कहा लेकिन बैराग्य के बारे में आपका क्या कहना है? आपका मत क्या है?
बापू ने कहा कि आपने पूछा है तो मैं तो मेरे दादा गुरु को देखकर मेरी सावित्री मां को देखकर बोलूं वही मेरा मत समझना।।
तुम कहते हो कागज की लिखी।
मैं कहता हूं निज नयन की देखी।।
तो मैंने जो देखा है। इसमें से एक-बैरागी हो जिसे आधे में प्रसन्नता नहीं होती,पूरा पाना होता है।। थोड़े में राजी नहीं होते वह बैरागी है। या तो पूरा पाओ या पूरा दे दो! लेकिन पूरा तब ही दे पाएंगे जब पूरा पाएंगे।।
बैरागी को कोई व्याधि नहीं। कोई रोग भी नहीं कोई चिंता भी नहीं।।
कोई उपाधि मतलब कोई पद प्रतिष्ठा मान इनाम की जरूरत नहीं होती है।।
बैरागी की गति आबाधि- कोई रोकने वाला ना हो निरंतर गति रहती है।। मैंने यह मेरे दादा गुरु में देखा है।। बैरागी को किसी का भय नहीं लगेगा।।
बापू ने कहा सबके साथ अपनापन वह मेरा वैराग्य है।।
यहां का एक स्थानिक क्रिश्चियन ड्राइवर उसने पत्र लिखा और कहा कि कभी मैं आपका ड्राइवर बनुं! ऐसा कहना है और इस वक्त वह ड्राइवर भी वहां आया और बापू ने व्यास पीठ पर हृदय से लगाकर सम्मान किया और सब की आंखें उसे वक्त भीग गई जब बापू ने यह पूरा काम सब के सामने पहली बार किया।।
शबरी के आश्रम में नवधा भक्ति का गान करके शबरी को गति देकर भगवान पंपा सरोवर आए। नारद से मिले। सीता हरण की योजना बनी और फिर अरण्य कांड के बाद सुंदरकांड में हनुमान जी ने राम जी से सुग्रीव की मैत्री करवाई और सीता जी की खोज के लिए पूरी टूकडी बनी और जामवंत के मार्गदर्शन में अंगद नायक बना और सीता खोज के लिए सब निकले।।लंकादहन,राम रावण युध्ध और राम राजतिलक की कथा का सुंदर गान कर के सभी घटों को कथा विराम देकर मनोरथी परिवार और कथा आयोजन पर अपनी प्रसन्नता और साधुवाद दिया।।
ये कथा यहां के भिषण नर संहार में मारे गये मृतात्माओं को अर्पण की गइ।।
आगामी-९६३वीं रामकथा का गान ६ सितंबर से महाराष्ट्र के यवतमाल से होने जा रहा है।।
इस कथा का जीवंत प्रसारण आस्था टीवी चैनल एवं वैदिक टीवी चैनल और चित्रकूटधामतलगाजरडायु-ट्युबचेनल से होगा।।
जो पहले दिन शनिवार ६ सितंबर को शाम ४ बजे से और बाकी के दिनों में हररोज सुबह १० से १:३० बजे तक देखा जा सकता है।।

