
शांति की कसौटी कोई आपको खलेल पहुंचाना चाहे उसका आपको भान हो तब आप शांत नहीं रह पाओगे।।
कोई मुझे अशांत करता है वह भान शांत नहीं होने देगा।।
साधु अवगुण छोड़कर सबके गुण ग्रहण करता है। हमें शांति नहीं क्योंकि हम सब में अवगुण ही देखते हैं।
दोष दर्शन करोगे तो कैसे शांति होगी!
जो शांत है वह विष्णु है।।
जिसकी बुद्धि अनन्य है,अनन्य मति है इसलिए चरणों से गंगा निकली है।।
जो सत्व गुणी है उसका स्वभाव मधुर होता है।।
एक ही जगह जिसका मनोभाव लगा है,जिसका मोह समाप्त हो गया है,नष्ट हो गया है वह विष्णु है।
बीज पंक्तियां:
बिष्नु जो सुर हित नरतनु धारी।
सोउसर्बग्यजथात्रिपुरारी।।
खोजइ सो कि अग्यइव नारी।
ग्यान धाम श्रीपति असुरारी।।
-बालकॉंड दोहा-५०,चौपाइ-१-२
बिष्नुचारि भुज बिधि मुख चारी।
बिकटबेष मुख पंच पुरारी।।
-बालकॉंड दोहा-२१९ चौपाइ-७
रामकथा के आखिरी और विराम के दिन पर इन बीज पंक्तियों का गायन करके जिस बद्री विशाल की भूमि पर उद्धव और कुबेर विराजित है ऐसी कुबेरी भूमि को प्रणाम करके,अलकनंदा और लक्ष्मण गंगा के संगम को प्रणाम करके,दिव्य देव भूमि की समस्त चेतनाओं को प्रणाम करके और मनोरथीकाणकियापरिवार पर अपनी प्रसन्नता और साधुवाद व्यक्त करते हुए उपसंहारक बातें शुरू करते हुए बापू ने कहा की:
कथा का आरंभ शांत शब्द से किया था।बीच में मध्य में तुलसीदास जी का विनय पत्रिका का पद जहां शांत शब्द है और आखिर में भी हम समापन शांत शब्द से करेंगे।।
शांतैहिअनन्यमितिभी: मधुर स्वभाव:
एकत्व निश्चंत मनोभाव: अपैतमौहु
यह मंत्र में सब भगवान विष्णु के लक्षण,स्वाभाविक गुण है।।भगवान विष्णु शांत है।राम शांत है,शाश्वत है,शांति प्रदान करने वाले हैं।।अवतार लीला में कृष्ण,राम आदि रूप है मूलत: यह परब्रह्म है।।
शांति की कसौटी कोई आपको खलेल पहुंचाना चाहे उसका आपको भान हो तब आप शांत नहीं रह पाओगे।।कोई मुझे अशांत करता है वह भान शांत नहीं होने देगा।।
बैल बैठा था और मच्छर गुनगुना रहा था और पूछा गया तो बताया कि मैं कब से आपके सिंह पर बैठा था और आपसे क्षमा मांगने के लिए गुनगुना रहा हुं। तब नंदीश्वर ने कहा कि मुझे पता ही नहीं कि तुम सिंग पर बैठा है!
यहां जापान की बनी घटना जो नगिनबापा (नगीनदाससंघवी) और गुणवंत शाह ने भी बताई की एक गांव में एक बाबा रहते थे।पूरा गांव उसे चाहता था।बच्चों को सब बाबा के पैरों में चरणों में रख देते थे।बड़े प्रिय और पूज्य थे।एक दिन ऐसा हुआ,उसी गांव की एक युवा लड़की ने भूल की और उनके पेट में बच्चा हुआ।मां-बाप और गांव ने पूछा तो अपना पाप छुपाने के लिए और अपने प्रेमी को बचाने के लिए झूठ बोलते हुए युवती ने कहा कि मेरे पेट से जो बच्चा है वह यह बाबा का है! और पूरा गांव खफा हुआ ।सबसे पहले साधु की कुटिया को जला दी और जो बालक पैदा हुआ वह झोपड़ी में फेंक कर आए और बताया कि लौ! आपका पाप! जो हर रोज आरती उतारते थे वही गांव लोग नफरत करने लगे।बाबा बाहर आए तो पूछा क्या है?यह पाप,आप इसके बाप है। बाबा इतना ही बोले: अच्छा! ऐसा है? फिर बच्चों को पाल पोशकर बड़ा किया।।लेकिन एक दिन वह युति को अपनी भूल समझ में आई और बाबा से माफी मांगने आई और कहा कि मैंने झूठ बोला था सभी को सच्चाई बताई तब फिर साधु बोला:अच्छा! ऐसा है?
जो साधु अवगुण छोड़कर सबके गुण ग्रहण करता है।हमें शांति नहीं क्योंकि हम सब में अवगुण ही देखते हैं।दोष दर्शन करोगे तो कैसे शांति होगी! जो शांत है वह विष्णु है।।जिसकी बुद्धि अनन्य है,अनन्य मति है। इसलिए चरणों से गंगा निकली है।।गंगा के ११ स्थान बताएं है।। सबसे पहले विष्णु के नाखून से चरण कमल से निकली।। फिर ब्रह्मा के कमंडल में आई। हर वक्त गंगा का नाम बदलता है। फिर शिव की जटा में आई और फिर भगीरथ के पास भगीरथ नंदिनी आई।।गोमुख से निकली। गंगा गंगोत्री में आई वहां से फिर हरिद्वार की गंगा।प्रयाग में आते-आते फिर गंगासागर की गंगा। पाताल में गई जो पाताल गंगा और स्वर्ग में गई तो सूर गंगा बनी। गंगा का स्त्रोत का गान हुआ।
जय जय भगीरथ नन्दिनी मुनि चय चकोर चन्दिनी
नर-नाग-बिबुधबन्दिनी जय जहु बालिका
विष्णु भगवान के नाखून से निकली है नखनिर्गतंम कही है।।विष्णु शांत है।।अनन्य मति है। मधुर स्वभाव है।।शिवजी समस्त ब्रह्मांड का तमोगुण है। ब्रह्मा रजोगुण प्रधान है और विष्णु सत्व गुण प्रधान है।।जो सत्व गुनी है उसका स्वभाव मधुर होता है।। एक ही जगह जिसका मनोभाव लगा है।।जिसका मोह समाप्त हो गया है,नष्ट हो गया है वह विष्णु है। विष्णु पुराण में लिखा है विष्णु सहस्त्रनाम में से कोई उनका नाम लेंगे उसके हृदय में राग द्वेष का प्रवेश नहीं होगा।।
शेष कथा में प्रवेश करते हुए भगवान राम लक्षमण और सिता जी भरद्वाज के आश्रम में एक दिन रुक कर आगे की यात्रा में वाल्मीकि के आश्रम में आए। वहां रहने के स्थान पूछे। वाल्मीकि जी ने १४ आध्यात्मिक स्थान बताएं। फिर चित्रकूट में जाकर अत्रि और अनसूया से मिले।चित्रकूट में निवास किया।अयोध्या में दशरथ का प्राण त्याग हुआ। और भरत जी को गद्दी सौंपने की बात आई।भरत पुरी अयोध्या को लेकर चित्रकूट की यात्रा पर निकले और राम से पादुका पा कार फिर लौटे।। चित्रकूट में सीता हरण हुआ और सीता के वियोग में राम की लौकिक नर लीला चली।।रास्ते में कबंध का निर्वाण और शबरी को गति देकर किष्किंधा कांड में हनुमान जी का प्रवेश हुआ।।हनुमान जी के माध्यम से सुग्रीव और राम की मैत्री हुई और प्रवर्षणपर्बत पर राम ने चातुर्मासकिया।।हनुमान जी सीता खोज के लिए लंका गये। लंका दहन हुआ और सीता खोज करके लौटे।।संधि का प्रस्ताव विफल रहा।। राम और रावण के बीच भयानक भिषण युद्ध हुआ।। रावण को गति देकर सीता जी को लेकर राम अयोध्या में आए।। राम का राज्याभिषेक वशिष्ठ के हस्तों राम के भाल में राज तिलक हुआ।।
फिर भुसुंडी चरित्र और सात प्रश्न के बाद विधविध घाट पर कथा को विराम मिला।।
बापू ने भी कथा विराम देते हुए पूरे आयोजन पर अपनी प्रसन्नता और साधुवाद व्यक्त करते हुए यह रामकथा का फल यहां की पूरी जनता को समर्पित करके कथा को पूर्ण विराम दिया।।
अगली-९७६ वीं रामकथा शिव संकल्प निमित्त पर श्री लालगिरिबापु गुरु श्री विजयगिरिबापु की प्रेरणा से कैलास टेकरी,सगापरानी धार-पालिताणाजिल्ला-भावनगर(गुजरात) से १८ एप्रिल से २६ एप्रिल के दरमियान गुंजेगी।।
हर वक्त की तरह इस कथा को आस्था टीवी चैनल एवं चित्रकूटधामतलगाजरडायु-ट्युब चैनल के माध्यम से जिवंत रुप से नियत नियमित समय पर देखी जा सकती है।।

