
मेरे लिए तीन जयंती है:रामनवमी, रामचरितमानस का प्रागट्य दिन और मेरी मां सावित्री मां का जन्मदिन:बापु
एक ने मुझे जन्म दिया, एक ने जीवन दिया और एक ने मुझे जगजीवन दिया है-ये मेरा आध्यात्मिक त्रिकोण है।
मेरे लिये कच्छ कल्याण मित्र है।।
विश्वास के पांच स्थान है।।
आज विश्वास रूपी सनातन वृक्ष के मूल को डाली बना दी और डलियों को मूल कर दिया है,वह कुछ भी हो लेकिन सनातन नहीं हो सकता।।
अवधि सत्य,वृंदावनी प्रेम और कैलाशी करुणा है तो कुछ भी हो सकता है।।
चैत्र नवरात्र और आज राम नवमी,कथा पंडाल में भी राम जन्म और त्रिभुवन में भी राम जन्मोत्व की तैयारीयां और दिव्य पलों का दिन,रामकथा का छठ्ठा दिन।।
कथा के आरंभ में अखिल ब्रह्मांड के मालिक के जन्मोत्सव की पूरे त्रिभुवन को बधाई देते हुए बापू ने कहा कि मेरे लिए तीन जयंती है:रामनवमी, रामचरितमानस का प्रागट्य दिन और मेरी मां सावित्री मां का जन्मदिन।।एक ने मुझे जन्म दिया, एक ने जीवन दिया और एक ने मुझे जगजीवन दिया है।।
नवमी भोम बार मधुमासा।
अवधपुरी यह चरित प्रकासा।।
मेरा यह आध्यात्मिक त्रिकोण है।
कच्छ के साथ कैसा नाता?
तोहे मोहे नाते अनेक….. कच्छ को में मित्र मानता हूं और बुद्ध के काल का एक शब्द कल्याण मित्र, मेरे लिए कच्छ कल्याण मित्र है।।
एक वह समय था जब ऋषि मुनियों के यज्ञों से निकलते धुंए से पूरा आकाश भर जाता था और आज यह दिन है कि चारों ओर युद्ध से मिसाइल के कारण धुएं से पूरा आकाश भरा है! लेकिन राम कथा का प्रकाश 170 देश में फैल रहा है उनका बहुत आनंद है।।
व्यास पीठ पर सामाजिक,पारिवारिक,राष्ट्रीय, धार्मिक,आध्यात्मिक विषय पर अनेक प्रश्न आते है कल कच्छ के झरपारा गांव में मुलाकात ली वहां डेढ़ सौ साल से रामचरितमानस का अनुष्ठान चल रहा है, सब रामायण गा रहे हैं।। वहां से एक प्रश्न आया था कि बापू! आप मानस दर्पण की बात करते हैं लेकिन इस दर्पण में हमें हमारा ही मुख और हमारा ही मन क्यों दिखाई नहीं देता! उनके कारण कहो।।
बापू ने कहा कि हम हमें ही अपने मन के दर्पण में अच्छी तरह देख दिख नहीं सकते उनके कारण है। पहला कारण है:दर्पण अच्छा हो लेकिन हिलता हुआ हो तो चेहरा अच्छी तरह नहीं देख सकते। हमारे हाथ में कंपन हो या हम बहुत उत्साहित हो जाते हो।। मन चंचल है, अभ्यास से स्थिर हो सकता है ऐसा कृष्ण ने कहा है।। मन को स्थिर करने के लिए क्या उपाय करें? हाथ भले ही कंपन करें लेकिन विश्वास को हिलने नहीं देना।। विशेष प्रकार की आश विश्वास नहीं है,लेकिन विशेष प्रकार के श्वास में जो जीये वही विश्वास है।। पतंजलि भी जहां छोटे पड़े ऐसी श्वास-सांस चलता हो उसी को विश्वास कहते हैं।।मानस मुकुराष्टक के बाद अब आप मानस मुस्कुराहट सिख जाना, स्मित करना सीख जाना।।
बापू ने बताया कि विश्वास के पांच स्थान है: जमीन के अंदर का विश्वास,जमीन के ऊपर दिखता विश्वास तीसरा शिखरस्त-शिखर पर दिखता विश्वास,चौथा आकाश में और पांचवा अपना हाथ।।
रामचरितमानस में संदर्भ भी मिलते हैं।। जमीन के अंदर जो विश्वास है वह है बट विश्वास।। और विश्वास के वट के मूल बहुत गहरे होते हैं।। पंचदेव हो वही सनातन है।लेकिन आज विश्वास रूपी सनातन वृक्ष के मूल को डाली बना दी और डलियों को मूल कर दिया है,वह कुछ भी हो लेकिन सनातन नहीं हो सकता।।
रामचरितमानस में सबसे पहले सनातन का महिमा गान हुआ है। बाद में पंचदेव की बात की है और गुरु महिमा का गान हुआ है। भवन में रहे या वन में, अमेरिका हो या अमरेली, त्रिपुरा हो या तलगाजरडा सनातन को पकड़ के रखना। तीसरा साधु महिमा लिखा है।।चौथा नाम महिमा का गान हुआ है, पांचवा प्रेम महिमा भजन महिमा का गान हुआ है और रामायण में वैराग्य का महिमा गान भी हुआ है। भजन शब्द रामचरितमानस में 24 बार लिखे हैं इसलिए मैं उसे भजनावतार भी कहता हूं।।
दूसरा है पृथ्वी पर अंगद के पेर जैसा पद विश्वास है। कैलाश के शिखर पर भवानी और शंकर बसे हैं ऐसा विश्वास भी होता है और आकाश अनंत अमित और असंग है आकाश जैसे लक्षण का विश्वास। आकाश में अचल ध्रुव है ऐसा विश्वास और पांचवा अपने हाथ का विश्वास।।विश्वास हमारे हाथ में होना हमारे मुट्ठी में होना चाहिए।।
हम अपने आप को दर्पण में नहीं देख सकते उसका दूसरा कारण है दर्पण किसी और ने पकड़ा हो। तीसरा यह भी हो सकता है उल्टा पकड़ा हो यानी कि वाम होते हैं तो स्वरूप बोध नहीं हो सकता।। मन रूपी दर्पण मलिन हुआ होता तो भी हम अपने स्वरूप को देख नहीं सकते।। काम क्रोध और लोभ रूपी विकारों के हाथ में हमारा दर्पण हमें देखने नहीं देता।। दर्पण के पीछे रही कलाई घीस गई होती है तो भी हम नहीं देख सकते।।
कैलास के वेद विदित वट वृक्ष के नीचे भगवान शिव को सहज देखकर भल अवसर पाकर पार्वती जाती है और भगवान राम के बारे में अनेक प्रश्न और संशय उठाती है।। अवधि सत्य,वृंदावनी प्रेम और कैलाशी करुणा है तो कुछ भी हो सकता है।। भगवान शिव ने राम जन्म के पांच कारण बताते हुए कहा कि वैसे एक भी कारण ना हो ईश्वर कार्य कारण से भी ऊपर हो सकते हैं।।और संक्षिप्त में पांच कारण बता कर जब पृथ्वी गाय का रूप लेकर सभी के साथ पुकार करती है, प्रतीक्षा करती है और परमात्मा को देवों ने भी स्तुति की और परमात्मा को आने के लिए दशरथ पुत्र कामेष्टि यज्ञ करते हैं। यज्ञ कुंड से खीर का प्रसाद निकलता है।तीनों रानियां को प्रसाद बांटा जाता है और अवधपुरी में रामनवमी के दिन राजा दशरथ के भवन में, मां कौशल्या की कोख से राम का प्रागट्य होता है तब व्यास पीठ और पूरे जगत में भी रामनवमी के दिन राम जन्मोत्सव की बधाई बापू ने सजल नेत्र और सजल बानी से देते हुए आज की कथा को विराम दिया।।

